लोकतंत्र शोर से नहीं, मीडिया के सख्त सवालों से होगा परिपक्व

Democracy will mature not through noise, but through tough questions from the media

संजय सक्सेना

समय के साथ लोगों की सोच और नजरिया काफी बदल गया है। खासकर आज की युवा पीढ़ी में काफी बदलाव देखने को मिल रहा है। इस बदलाव की वजह सोशल मीडिया और मोबाइल है, जिसमें सब कुछ खुला हुआ है। डिजिटल क्रांति और 24/7 न्यूज चैनलों ने इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। जिस युग में सुकरात और कौटिल्य जैसे विचारकों को ज्ञान और अनुभव के वर्षों बाद सम्मान मिलता था, आज रील्स और ट्वीट्स के 15 सेकेंड में हर इंसान खुद को महाज्ञानी घोषित कर चुका है। लेकिन इस पूरे तमाशे का सबसे विकृत पहलू यह है कि लोकतंत्र के चौथे स्तंभ (मीडिया) और सोशल मीडिया के दौर ने देश के खारिज किए गए नेताओं को एक ऐसा मुफ्त का लाउडस्पीकर दे दिया है, जो बिना किसी जवाबदेही के दिन-रात बजता रहता है। जनता जिन्हें चुनाव में नकार देती है, जिन्हें जमीन पर दो लोग सुनने को तैयार नहीं होते, वही नेता शाम 8 बजे टीवी स्क्रीन पर आकर देश और दुनिया को नैतिकता और शासन का पाठ पढ़ाते हैं। मीडिया उन्हें रहनुमा की तरह पेश करता है, लंबी-लंबी बाइट्स दिखाता है, लेकिन अफसोस, उनसे एक तीखा या सही सवाल पूछने का साहस कोई पत्रकार नहीं जुटा पाता।

आज का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पत्रकारिता का धर्म निभाने के बजाय पौराणिक नारद मुनि की भूमिका में आ चुका है, लेकिन एक नकारात्मक अर्थ में। मीडिया का काम अब सच उजागर करना नहीं, बल्कि दो नेताओं को स्टूडियो में आमने-सामने बिठाकर उनमें आग लगाना रह गया है। देश में स्वास्थ्य, शिक्षा, बेरोजगारी, कृषि और वैज्ञानिक विकास जैसे बुनियादी मुद्दे अब गौण हो चुके हैं। मीडिया के लिए वही खबर प्राइम टाइम के लायक है, जो समाज में सनसनी फैलाए या नफरत का तड़का लगाए। जब कोई खारिज किया गया नेता स्टूडियो में बैठकर बेतुके दावे करता है, तो एंकर उनसे यह नहीं पूछता कि आपने अपने कार्यकाल में इस समस्या के लिए क्या किया? या जनता ने आपको क्यों हराया? इसके बजाय, एंकर सिर्फ एक पक्ष के नेता का बयान दूसरे के सामने उछालकर बहस को गाली-गलौज का मंच बना देता है।

सोशल मीडिया और न्यूज चैनलों के इस दौर की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि मीडिया का पूरा ध्यान या तो वंशवादी-विरासती राजनीति के राजकुमारों पर रहता है, या फिर रोज बखेड़ा खड़ा करने वाले ट्रोल-नेताओं पर। इस तमाशे के बीच वे नेता पूरी तरह अनदेखा कर दिए जाते हैं, जो किसी राजनीतिक घराने से नहीं आते, बल्कि अपनी शिक्षा, जमीनी संघर्ष और कार्य-योग्यता के बल पर आगे बढ़े हैं। इसके कई उदाहरण मौजूद हैं। डॉ. एस. जयशंकर किसी राजनीतिक परिवार से नहीं आते। वे एक पूर्व नौकरशाह और कूटनीतिज्ञ हैं, जिन्होंने अपनी प्रशासनिक और बौद्धिक क्षमता के बल पर देश की विदेश नीति को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया। जब वैश्विक मंचों पर भारत का रुख तय करने की बात आती है, तो जयशंकर जैसे योग्य नेताओं की नीतिगत बातें 2 मिनट के क्लिप में सिमट जाती हैं। वहीं दूसरी ओर, चुनाव हारे हुए नेता जब विदेश नीति पर कोई बचकाना बयान देते हैं, तो मीडिया उस पर 2 घंटे का प्राइम टाइम डिबेट चलाता है। योग्यता को दरकिनार कर सनसनी को तरजीह दी जाती है।

तमिलनाडु की राजनीति में के. अन्नामलाई एक ऐसा नाम हैं, जो बिना किसी राजनीतिक विरासत के आगे आए। वे एक पूर्व आईपीएस अधिकारी हैं, जिन्होंने आईआईएम से पढ़ाई की और बाद में अपनी प्रशासनिक नौकरी छोड़कर जमीन पर राजनीति शुरू की। मीडिया अक्सर ऐसे नेताओं के विजन, उनकी प्रशासनिक सोच या उनके द्वारा उठाए गए बुनियादी मुद्दों पर गहराई से रिपोर्टिंग नहीं करता। इसके बजाय, अगर कोई वंशवादी नेता अन्नामलाई पर कोई निजी टिप्पणी कर दे, तो मीडिया उस विवाद को 24 घंटे चलाएगा, लेकिन अन्नामलाई की शैक्षणिक या प्रशासनिक पृष्ठभूमि से निकले विचारों पर कोई बहस नहीं होगी।इसी प्रकार पूर्वोत्तर भारत में सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत विश्वा शर्मा जैसे नेताओं ने बिना किसी बड़े राजनीतिक घराने के ठप्पे के, छात्र राजनीति और जमीनी संघर्षों से अपनी पहचान बनाई। मीडिया को पूर्वोत्तर के इन नेताओं के विकास मॉडल या उनकी योग्यता से ज्यादा दिलचस्पी इस बात में रहती है कि वे किसी प्रतिद्वंद्वी के खिलाफ क्या तीखा बयान दे रहे हैं। मीडिया उनकी योग्यता को तब तक तवज्जो नहीं देता, जब तक वे टीवी की टीआरपी के हिसाब से मसालेदार बयान न दें।

जो नेता अपनी नीतियों और नफरत भरी राजनीति के कारण जनता द्वारा पूरी तरह ठुकरा दिए गए हैं, उनके लिए सोशल मीडिया एक संजीवनी बूटी बन चुका है। सोशल मीडिया पर हर नेता ने अपनी एक ट्रोल आर्मी और समर्थकों का एक छोटा समूह बना लिया है। यहां वे खुद को पीड़ित और देश का सबसे बड़ा रहनुमा साबित करते हैं। पहले नेता को अपनी बात जनता तक पहुंचाने के लिए काम करना पड़ता था। आज एक ट्वीट या फेसबुक लाइव करके कोई भी पूर्व-नेता खुद को ज्ञान का भंडार घोषित कर देता है। टीवी चैनल अब खुद से खबरें ढूंढने के बजाय नेताओं के इन्हीं ट्वीट्स और रील्स पर ब्रेकिंग न्यूज चला रहे हैं। यानी जनता द्वारा खारिज नेता ही अब मीडिया का कंटेंट तय कर रहे हैं। जब मीडिया और सोशल मीडिया का केंद्र बिंदु योग्यता के बजाय सनसनी और खारिज किए गए नेताओं का आलाप बन जाता है, तो इसके गंभीर परिणाम पूरे देश को भुगतने पड़ते हैं।

स्वास्थ्य, बेरोजगारी, शिक्षा और बुनियादी ढांचे जैसे मुद्दों पर से जनता का ध्यान भटक जाता है। देश का युवा यह देखता है कि योग्यता, पढ़ाई और जमीनी काम करने वालों की जगह टीवी पर बहस करने और नफरत फैलाने वाले ही दिख रहे हैं, जिससे राजनीति का स्तर गिरता है। जब मीडिया सवाल पूछना बंद कर देता है, तो सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही जनता के प्रति लापरवाह हो जाते हैं। कुल मिलाकर, आज का मीडिया और वायरल संस्कृति भले ही जनता के ठुकराए गए नेताओं को मसीहा बनाकर पेश कर रही हो, लेकिन यह स्थिति लंबे समय तक लोकतंत्र के हित में नहीं है। टीवी स्टूडियोज में योग्य, पढ़े-लिखे और जमीनी संघर्ष से आए नेताओं (चाहे वे किसी भी दल के हों) को जगह देनी होगी। खारिज किए गए नेताओं की लंबी बाइट्स दिखाने के बजाय उनसे कड़े और तथ्यात्मक सवाल पूछने का साहस दिखाना होगा। जब तक मीडिया टीआरपी की हवस छोड़कर योग्यता को तरजीह नहीं देगा और जनता के असली मुद्दों पर सवाल नहीं पूछेगा, तब तक सोशल मीडिया के ये स्वघोषित ज्ञानी और ठुकराए गए नेता देश के विकास की दौड़ में अड़ंगा लगाते रहेंगे। लोकतंत्र की असली मजबूती शोर में नहीं, बल्कि सही सवाल में छिपी है।