डॉ. प्रियंका सौरभ
भारत के शहर हर मानसून में एक ही कहानी दोहराते दिखाई देते हैं—कुछ घंटों की तेज बारिश, सड़कों पर जमा पानी, जाम में फँसी गाड़ियाँ, डूबते अंडरपास, घरों और दुकानों में घुसता पानी और प्रशासन की ओर से राहत एवं निकासी की कवायद। दिल्ली-एनसीआर और गुरुग्राम जैसे तेजी से विकसित होते महानगरीय क्षेत्र इसका उदाहरण हैं। सवाल यह है कि क्या इन शहरों में बाढ़ केवल अत्यधिक बारिश का परिणाम है? जवाब है—नहीं। शहरी बाढ़ प्राकृतिक वर्षा और मानवीय अव्यवस्था के बीच पैदा हुआ संकट है। बदलते मौसम ने खतरा जरूर बढ़ाया है, लेकिन खराब शहरी नियोजन और कमजोर शासन व्यवस्था ने उसे आपदा में बदलने का काम किया है।
शहरी बाढ़ उस स्थिति को कहा जाता है जब वर्षा का पानी शहर की जल निकासी, जमीन में पानी के रिसाव और प्राकृतिक अथवा कृत्रिम जल-संग्रहण क्षमता से अधिक हो जाता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पानी को खेतों, तालाबों और प्राकृतिक नालों के माध्यम से फैलने और जमीन में समाने की जगह मिल जाती है, लेकिन शहरों में बढ़ता कंक्रीटीकरण पानी के प्राकृतिक रास्ते बंद कर देता है। परिणामस्वरूप थोड़ी अवधि में हुई अत्यधिक बारिश भी व्यापक जलभराव पैदा कर देती है।
भारत के शहरों के बाढ़-प्रवण होने का पहला बड़ा कारण बदलते वर्षा पैटर्न हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण कई क्षेत्रों में कम समय में बहुत अधिक बारिश होने की घटनाएँ बढ़ रही हैं। पुराने समय के औसत वर्षा आंकड़ों के आधार पर तैयार की गई जल निकासी प्रणालियाँ ऐसी तीव्र बारिश को संभालने में सक्षम नहीं हैं। दिल्ली-एनसीआर में तीव्र मानसूनी बारिश इसका उदाहरण है। समस्या केवल कुल वर्षा की मात्रा की नहीं, बल्कि बारिश के कम समय में अत्यधिक केंद्रित हो जाने की भी है।
दूसरा बड़ा कारण तेजी से बढ़ता कंक्रीटीकरण है। गुरुग्राम जैसे शहरों में पिछले कुछ दशकों में आवासीय कॉलोनियों, ऊँची इमारतों, व्यावसायिक परिसरों और सड़कों का तेजी से विस्तार हुआ है। पहले जो जमीन बारिश के पानी को सोखती थी, वह अब सीमेंट और डामर से ढकी है। इससे भूजल पुनर्भरण घटता है और सतही बहाव बढ़ जाता है। जब बड़ी मात्रा में पानी एक साथ सड़कों और नालियों की ओर आता है, तो जल निकासी तंत्र जल्दी ही जवाब दे देता है।
प्राकृतिक नालों और जल-मार्गों पर अतिक्रमण भी शहरी बाढ़ को गंभीर बनाता है। शहरों का विकास अक्सर इस तथ्य को नजरअंदाज कर देता है कि हर जलधारा का अपना प्राकृतिक प्रवाह क्षेत्र होता है। नालों को संकरा करना, उन्हें ढक देना या उनके किनारे निर्माण करना पानी के बहाव में बाधा डालता है। इसी तरह तालाबों, झीलों और आर्द्रभूमियों का खत्म होना शहरों से प्राकृतिक जल-संग्रहण क्षेत्र छीन लेता है। दिल्ली-एनसीआर में आर्द्रभूमियों और जल निकायों का क्षरण इसी समस्या की ओर संकेत करता है।
कमजोर और असंगठित स्टॉर्म-वॉटर ड्रेनेज व्यवस्था समस्या को और बढ़ाती है। अनेक शहरों में नालियों की क्षमता स्थानीय जरूरतों और वर्तमान वर्षा परिस्थितियों के अनुरूप नहीं बढ़ाई गई है। कई स्थानों पर सीवर और वर्षा जल निकासी की प्रणालियाँ आपस में जुड़ी हुई हैं, जिससे भारी बारिश के दौरान दोनों व्यवस्थाएँ प्रभावित होती हैं। इसके अतिरिक्त प्लास्टिक और अन्य ठोस कचरा नालियों को अवरुद्ध कर देता है। यानी बारिश जितनी बड़ी समस्या है, उतनी ही बड़ी समस्या वह कचरा भी है जिसे हम स्वयं जल निकासी तंत्र में पहुँचा देते हैं।
इसलिए शहरी बाढ़ को केवल प्राकृतिक आपदा मानना उचित नहीं है। यह शासन की विफलता भी है। शहरों में सड़क, भवन निर्माण, जल निकासी, भूमि उपयोग, पर्यावरण और आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारियाँ अक्सर अलग-अलग एजेंसियों में बँटी होती हैं। जब किसी क्षेत्र में जलभराव होता है तो जिम्मेदारी तय करना मुश्किल हो जाता है। समन्वय के अभाव में एक विभाग सड़क बनाता है, दूसरा नाला बनाता है और तीसरा भूमि उपयोग की अनुमति देता है, लेकिन पूरे जलग्रहण क्षेत्र को एक इकाई मानकर योजना नहीं बनाई जाती।
शहरों के मास्टर प्लान में भी बाढ़ जोखिम और जलग्रहण क्षेत्रों को पर्याप्त महत्व नहीं मिलता। निचले इलाकों, बाढ़ के प्राकृतिक मैदानों और जल निकायों के आसपास निर्माण को नियंत्रित करने के नियम मौजूद होने के बावजूद उनका प्रभावी पालन नहीं हो पाता। अनधिकृत निर्माण और अतिक्रमण धीरे-धीरे प्राकृतिक जल मार्गों को खत्म करते जाते हैं। आपदा आने के बाद राहत और बचाव पर जोर देने के बजाय आपदा से पहले जोखिम कम करना प्राथमिकता होनी चाहिए।
जलवायु-लचीले शहरों के निर्माण के लिए सबसे पहले शहर को केवल इमारतों और सड़कों का समूह नहीं, बल्कि एक प्राकृतिक जलग्रहण क्षेत्र मानना होगा। इसके लिए ‘स्पंज सिटी’ की अवधारणा उपयोगी हो सकती है। इसका उद्देश्य बारिश के पानी को तेजी से बाहर निकालने के बजाय उसे शहर के भीतर रोकना, सोखना और पुनः उपयोग करना है। पार्किंग क्षेत्रों, फुटपाथों और अन्य उपयुक्त स्थानों पर पारगम्य सतहें, वर्षा उद्यान, रेनवॉटर हार्वेस्टिंग और स्थानीय जल-संग्रहण संरचनाएँ विकसित की जा सकती हैं।
इसी के साथ ‘ब्लू-ग्रीन इन्फ्रास्ट्रक्चर’ को शहरी नियोजन का हिस्सा बनाना होगा। तालाब, झीलें, आर्द्रभूमियाँ, नदियाँ, नाले, शहरी वन और हरित क्षेत्र केवल सौंदर्य के साधन नहीं हैं; वे शहर की प्राकृतिक बाढ़-रोधी प्रणाली हैं। इनके संरक्षण और पुनर्जीवन से पानी को रोकने, जमीन में उतारने और तापमान नियंत्रित करने में मदद मिलती है।
भविष्य की जलवायु परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्टॉर्म-वॉटर ड्रेनेज की डिजाइन क्षमता भी बदलनी होगी। पुराने वर्षा आंकड़ों पर निर्भर रहने के बजाय अद्यतन जलवायु मॉडल और चरम वर्षा अनुमानों को योजना में शामिल करना आवश्यक है। GIS आधारित बाढ़-जोखिम मानचित्र तैयार करके यह निर्धारित किया जा सकता है कि किन क्षेत्रों में निर्माण सीमित होना चाहिए और कहाँ अतिरिक्त जल-संग्रहण क्षमता विकसित करने की जरूरत है।
स्थानीय निकायों को वित्तीय संसाधन, तकनीकी विशेषज्ञता और निर्णय लेने की पर्याप्त शक्ति देना भी जरूरी है। प्रत्येक शहर के लिए व्यापक Urban Flood Risk Management Plan तैयार होना चाहिए, जिसमें जल निकासी, भूमि उपयोग, जल निकायों, कचरा प्रबंधन और आपदा प्रबंधन को एकीकृत किया जाए। नगर निकायों और संबंधित एजेंसियों के बीच स्पष्ट जवाबदेही तय होनी चाहिए।
अंततः, अत्यधिक बारिश को पूरी तरह रोका नहीं जा सकता, लेकिन उसे शहरी आपदा बनने से काफी हद तक रोका जा सकता है। इसके लिए मौसम विज्ञान और जलवायु विज्ञान को शहरी नियोजन से जोड़ना होगा। प्राकृतिक जल निकायों को बचाना होगा, कंक्रीटीकरण को संतुलित करना होगा और प्रशासनिक जवाबदेही मजबूत करनी होगी। शहरों को केवल बारिश के बाद पानी निकालने वाले नहीं, बल्कि बारिश के पानी को समझदारी से संभालने वाले शहर बनाना होगा। जलवायु परिवर्तन के दौर में शहरी बाढ़ से लड़ने का रास्ता अधिक पंप और अधिक राहत नहीं, बल्कि बेहतर नियोजन, मजबूत स्थानीय शासन और प्रकृति के साथ चलने वाली शहरी व्यवस्था है।





