सत्ता का शुतुरमुर्गी विमर्श: ‘रोजगार मांगते युवाओं को रिक्शा थमाती राजनीति’

The Ostrich-like Discourse of Power: 'Politics Handing Rickshaws to Youth Demanding Jobs'

अशोक भाटिया

लोकतंत्र में जब व्यवस्था जन-आकांक्षाओं के बोझ तले दबने लगती है, तब अक्सर सत्ता के गलियारों से ऐसे विमर्श फूटते हैं जो न केवल आम नागरिक की बुनियादी समझ को चुनौती देते हैं, बल्कि उनके संघर्षों का उपहास भी उड़ाते हैं। हाल ही में उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक द्वारा लखनऊ में एक कमर्शियल टैक्सी सेवा के उद्घाटन के दौरान दिया गया बयान—”नौकरी के चक्कर में मत पड़ो, अपनी गाड़ी (ई-रिक्शा या टैक्सी) चलाओ, चार घंटे सुबह काम करो, दोपहर में बच्चों के साथ खाना खाओ, आराम करो और शाम को फिर निकल जाओ”—इसी शुतुरमुर्गी विमर्श की नवीनतम कड़ी है। एक ऐसे राज्य में जहाँ लाखों युवा डिग्री हाथ में लेकर, अपनी जवानी के सबसे कीमती साल प्रतियोगी परीक्षाओं के फॉर्म भरने, पेपर लीक के दंश झेलने और लाठियां खाने में गुजार देते हैं, वहाँ सत्ता के शीर्ष पद पर बैठे व्यक्ति द्वारा ‘पराधीन सपनेहुं सुख नाहीं’ जैसी पवित्र चौपाई का इस्तेमाल नौकरी के खिलाफ और मजबूरी के स्वरोजगार के पक्ष में करना एक गहरे नीतिगत खोखलेपन को दर्शाता है। यह केवल एक आकस्मिक या बेतुका बयान नहीं है, बल्कि यह बेरोजगारी जैसी भीषण राष्ट्रीय समस्या के प्रति राजनीतिक नेतृत्व की संवेदनहीनता, शुतुरमुर्गी रवैये और जवाबदेही से भागने की उस प्रवृत्ति का दस्तावेज़ है, जिसका शिकार भारतीय युवा दशकों से हो रहा है।

जब कोई राजनेता किसी युवा से कहता है कि वह पारंपरिक नौकरी की तलाश छोड़कर ई-रिक्शा चलाने लगे, तो वह अनजाने में (या शायद जानबूझकर) उस पूरी सामाजिक और आर्थिक प्रक्रिया का अपमान कर रहा होता है जिसके तहत एक परिवार अपने बच्चे को पढ़ाता-लिखाता है। भारत में शिक्षा केवल साक्षरता का साधन नहीं है; यह सामाजिक गतिशीलता और वर्ग-परिवर्तन का एकमात्र जरिया है। एक किसान, एक मजदूर, या एक छोटा दुकानदार अपने पेट पर पट्टी बांधकर, कर्ज लेकर अपने बच्चों को इस उम्मीद में बी.टेक, एम.टेक, बी.एड या प्रशासनिक सेवाओं की तैयारी करवाता है कि उसकी अगली पीढ़ी उस दलदल से बाहर निकल सके जिसमें वह खुद फंसा रहा।

जब इन उच्च शिक्षित युवाओं को ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘समय की आजादी’ के रोमानी आवरण में लपेटकर रिक्शा चलाने की सलाह दी जाती है, तो राज्य अपनी उस प्राथमिक जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेता है जिसे ‘सम्मानजनक रोजगार सृजन’ कहा जाता है। अर्थशास्त्र की भाषा में इसे ‘अंडरइम्प्लॉयमेंट’ कहा जाता है। जब एक एम.ए. या बी.टेक पास युवा मजबूरी में ई-रिक्शा चलाता है, तो यह देश के मानव संसाधन की भारी बर्बादी है। उप-मुख्यमंत्री का यह तर्क कि “चार घंटे सुबह गाड़ी चलाओ और दोपहर में आराम करो”, जमीनी हकीकत से कोसों दूर है। आज के अत्यधिक प्रतिस्पर्धी और महंगाई के दौर में, ई-रिक्शा या टैक्सी चलाकर परिवार पालने वाले श्रमिक दिन में १२-१४ घंटे हाड़-तोड़ मेहनत करते हैं, तब जाकर उनके घर का चूल्हा जल पाता है। इसमें न तो कोई सामाजिक सुरक्षा होती है, न स्वास्थ्य बीमा, और न ही भविष्य की कोई गारंटी। इसे ‘आजादी’ का नाम देना श्रम के शोषण को उत्सव की तरह पेश करने जैसा है।

ब्रजेश पाठक का यह बयान कोई पहला या अनूठा उदाहरण नहीं है। भारतीय राजनीति का यह एक स्थापित पैटर्न बन चुका है कि जब भी सरकारें रोजगार के मोर्चे पर विफल होती हैं, उनके नीति-निर्माता युवाओं को ऐसी सलाह देने लगते हैं जो हास्यास्पद भी होती हैं और दर्दनाक भी। इतिहास और समकालीन राजनीति ऐसे बयानों से भरी पड़ी है।

साल २०१८ में देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक टेलीविजन इंटरव्यू में बेरोजगारी के सवाल पर कहा था कि अगर कोई व्यक्ति पकौड़े तलकर प्रतिदिन २०० रुपये कमाता है, तो उसे भी रोजगार माना जाना चाहिए। इस बयान ने पूरे देश में एक लंबी बहस को जन्म दिया था। आलोचकों का तर्क था कि यदि देश के सर्वोच्च पद से युवाओं को पकौड़े तलने को ही अंतिम लक्ष्य मान लेने की प्रेरणा दी जाएगी, तो फिर देश में आईआईटी, आईआईएम, और विश्वविद्यालयों की विशाल श्रृंखला खड़ी करने का क्या औचित्य है? यह बयान भी युवाओं की अकादमिक योग्यताओं और उनके सम्मानजनक जीवन जीने के अधिकार को सीमित करने का प्रयास था।

इसी तरह विज्ञान और तकनीक के मोर्चे पर आत्मनिर्भरता का एक अद्भुत और अवैज्ञानिक दावा करते हुए प्रधानमंत्री ने एक जनसभा में कहा था कि एक चायवाले ने गंदे नाले के ऊपर उलटा बर्तन रखकर वहां से निकलने वाली बायोगैस (मीथेन) से चाय बनाई। यह बयान न केवल वैज्ञानिक दृष्टिकोण का मजाक उड़ाता था, बल्कि यह देश के नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं (जैसे स्वच्छ ईंधन और ड्रेनेज सिस्टम) देने में नाकाम रही व्यवस्था को छिपाने का एक लोक-लुभावन तरीका मात्र था।

त्रिपुरा के पूर्व मुख्यमंत्री बिप्लव कुमार देव अपने अजीबोगरीब बयानों के लिए विख्यात रहे हैं। उन्होंने युवाओं को सलाह दी थी कि वे सरकारी नौकरियों के पीछे भागने और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी में सालों बर्बाद करने के बजाय गाय पालें, पान की दुकान खोलें या बकरियां पालें। उन्होंने गणित समझाते हुए कहा था कि एक गाय पालने से युवा कुछ ही सालों में लाखों रुपये कमा सकते हैं। एक मुख्यमंत्री स्तर के व्यक्ति द्वारा युवाओं को आधुनिक तकनीकी युग से पीछे धकेलकर पारंपरिक और असंगठित क्षेत्रों में जबरन धकेलने का यह प्रयास नीतिगत दिवालियेपन का स्पष्ट उदाहरण था।

मध्य प्रदेश और बिहार के कई स्थानीय मंत्रियों और जनप्रशसकों ने समय-समय पर युवाओं को यह कहकर हतोत्साहित किया है कि सरकारी नौकरियां अब बची नहीं हैं, इसलिए विवाह करने या जीवन में बसने के लिए निजी क्षेत्र में मजदूरी या खेती को ही अपना मुख्य आधार बनाएं।ये तमाम बयान एक साझी मानसिकता को दर्शाते हैं—”हमारे पास नीति नहीं है, हमारे पास नौकरियां नहीं हैं, इसलिए आप अपनी व्यवस्था खुद कर लीजिए और हमसे सवाल मत पूछिए।”

आधुनिक दौर में सरकारों ने अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भाषा विज्ञान का सहारा लेना शुरू कर दिया है। ‘मजबूरी की बेरोजगारी’ को अब ‘उद्यमिता’ , ‘स्टार्टअप कल्चर’, और ‘गिग इकोनॉमी’ जैसे भारी-भरकम और चकाचौंध भरे शब्दों के पीछे छिपाया जा रहा है। जब एक मंत्री डिलीवरी बॉय, जोमैटो-स्विगी के राइडर्स, या ई-रिक्शा चालकों को ‘आत्मनिर्भर उद्यमी’ बताते हैं, तो वे उस कड़वे सच को कालीन के नीचे सरका रहे होते हैं जिसमें ये युवा बिना किसी पीएफ , ग्रैच्युटी, या तय न्यूनतम मजदूरी के कॉर्पोरेट और बाजार के रहमों-करम पर जीने को मजबूर हैं।

क्या ई-रिक्शा चलाना गलत है? बिल्कुल नहीं। श्रम की अपनी गरिमा है और कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता। लेकिन सवाल प्राथमिकता और राज्य के कर्तव्य का है। यदि किसी देश या राज्य का युवा अपनी मर्जी से, व्यावसायिक लाभ के लिए परिवहन क्षेत्र में उतरता है, तो वह उसकी पसंद है। लेकिन जब एक युवा प्रशासनिक सेवा, शिक्षक भर्ती, या पुलिस भर्ती की परीक्षा की तैयारी करते-करते थक जाता है, जब परीक्षाएं बार-बार लीक हो जाती हैं, जब अदालतों में भर्तियां सालों-साल लटकी रहती हैं, और तब थक-हारकर जब वह रिक्शा का हैंडल थामता है—तो वह ‘आत्मनिर्भरता’ नहीं बल्कि व्यवस्था द्वारा की गई ‘आर्थिक हत्या’ होती है।

भारत इस समय जनसांख्यिकीय लाभांश के स्वर्णिम काल से गुजर रहा है। हमारे पास दुनिया की सबसे युवा आबादी है। इस युवा आबादी की ऊर्जा का उपयोग देश को अनुसंधान, अंतरिक्ष, तकनीक, बुनियादी ढांचे और विनिर्माण के क्षेत्र में वैश्विक महाशक्ति बनाने के लिए किया जाना चाहिए था। लेकिन जब सत्ता का शीर्ष नेतृत्व इस ऊर्जा को ई-रिक्शा के पहियों में खपाने की बात करता है, तो यह देश के भविष्य के विजन को बौना कर देता है।मंत्रियों और नीति-निर्माताओं को यह समझना होगा कि युवा उनसे कोई मुफ्त की खैरात या ‘मुफ्त राशन’ की अंतहीन कतारों में खड़े होने का अधिकार नहीं मांग रहे हैं; वे केवल एक पारदर्शी परीक्षा प्रणाली, समय पर नियुक्तियां और सम्मानजनक रोजगार के अवसर मांग रहे हैं। बेतुके बयान देकर, मुहावरों और चौपाइयों की आड़ में युवाओं के घावों पर नमक छिड़कने की इस राजनीतिक संस्कृति को अब बंद होना चाहिए। यदि लोकतंत्र में जनता के प्रति जवाबदेही का कोई भी अंश बचा है, तो राजनेताओं को अपनी भाषा में संवेदनशीलता और नीतियों में दूरदर्शिता लानी होगी। अन्यथा, रिक्शा चलाने की सलाह देने वाले नीति-निर्माताओं को यह नहीं भूलना चाहिए कि यही युवा जब अपने मतों के अधिकार का इस्तेमाल करता है, तो वह बड़ी से बड़ी सत्ता की गाड़ी को भी पटरी से उतारने का माद्दा रखता है।