अमित कुमार अम्बष्ट ” आमिली “
NEET परीक्षा पेपर लीक मामले में कॉकरोच जनता पार्टी तकरीबन 36 दिन के आंदोलन के बाद , केन्द्र सरकार के शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दे दिया है । सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी की सारी मांगें मान ली है और कॉकरोच जनता पार्टी ने आंदोलन समाप्ति की घोषणा कर दी है , ऐसे में पूरे प्रकरण का एक बारीक विश्लेषण करते है, क्योंकि आंदोलन के समापन के बाद अब भी कई सवाल सोशल मीडिया और आम देशवासियों के मन में तैर रहे हैं l सवाल है कि क्या यह सिर्फ एक छात्र आंदोलन था ? Cjp के मुख्य नेतागण के पीछे भी कोई दल या दिमाग काम कर रहा था? आंदोलनकारी बिटचैट क्या होता है और इसका इस्तेमाल आंदोलनकारी क्यों कर रहे थे ? आंदोलन स्थल पर इनको भोजन पहुचाने वाले कौन लोग थे? उनके पास इतना फंड कहाँ से आ रहा था? वो कौन लोग थे जो स्वीगी और जोमेटो का इस्तेमाल कर बांग्लादेश, दोहा,दुबई जैसे देशों से बेनाम खाना पहुचा रहे थे ? कौन लाठीचार्ज के बाद विदेशों से सोशल मीडिया में अफवाह फैला रहा था ? सोनम वांगचुक क्या सिर्फ छात्रों के लिए अनशन पर थे या कोई अपना भी एजेंडा था? सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी की शतप्रतिशत मांगों को मान लिया तो क्या ऐसा समझा जाए कि आंदोलनकारियों के सामने झुक गई सरकार ? उपरोक्त सभी प्रश्नों को समझने हेतु आंदोलन की पूरी रूपरेखा और क्रमवार घटनाक्रम का अवलोकन करते हैं l
सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान 15 मई 2026 को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ने कथित तौर पर युवा बेरोजगारों को कॉकरोच कह कर संबोधित किया । इस बयान के बाद 16 मई 2026 को अभिजीत दीपके जो अमेरिका में बैठे थे, उन्होंने कॉकरोच जनता पार्टी के नाम से एक ऑनलाइन अभियान शुरू किया। इसके साथ वेबसाइट, सोशल मीडिया अकाउंट और एक घोषणापत्र जारी किया गया। अभिजीत दीपके के अनुसार उन्होंने इसकी शुरुआत मज़ाक में की थी लेकिन इसके बाद यह अभियान तेजी से सोशल मीडिया पर वायरल हुआ और तकरीबन 20 मिलियन इसके फॉलोअर्स हो गए l
सीजेपी के फाउंडर.अभिजीत ने जून में तीन प्रवक्ताओं की घोषणा की सौरव दास ( मुख्य प्रवक्ता ), विजेता दहिया ( प्रवक्ता) एवं आशुतोष रांका , अभिजीत ने जनसंपर्क में अपनी पढ़ाई की है और 2023 में अमेरिका चले गए l सौरव दस खोजी पत्रकार है, जिन्होंने कानूनी, न्यायिक और सामाजिक मुद्दों पर काम किया है। आशुतोष रांका IIT के पूर्व छात्र हैं और पहले McKinsey & Company में सलाहकार के रूप में कार्य कर चुके हैं। विजेता दहिया सार्वजनिक राजनीतिक शोधकर्ता, लेखक और फिल्मकार रहे हैं। वे यूट्यूबर ध्रुव राठी की रिसर्च/स्क्रिप्ट टीम से भी जुड़े हैंl
अब सवाल उठता है कि ये चारों आपस में कैसे मिले? इनका एक दूसरे से क्या जुडाव है ? या क्या है इनका ” आप ” कनेक्शन ?
अभिजीत दीपके 2020–2023 के बीच आम आदमी पार्टी के सोशल मीडिया/डिजिटल कैंपेन टीम में स्वयंसेवक के रूप में जुड़े थे। आशुतोष रांका आम आदमी पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय प्रवक्ता रहे हैं l सौरव दास आम आदमी पार्टी से निकट संबंध रहे हैं ,विजेता दहिया भी आम आदमी पार्टी में किसी आधिकारिक पद पर नहीं रहें हैं l हालाकि उनके भी आम आदमी पार्टी से अंतरंग संबंध रहे हैं l बहुत स्पष्ट है कि कॉकरोच पार्टी का उसी सोच की उपज है जिसमें अरविंद केजरीवाल बार-बार अपने सोशल प्लेटफॉर्म पर जेन – जी से तख्ता पलटने की गुहार लगाते रहे हैं l ऐसे में इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि अरविंद केजरीवाल ने ही पर्दे के पीछे से इस आंदोलन की नीब रखी है l इसे सिर्फ एक छात्र आंदोलन समझना भूल होगी l
अभिजीत दीपके 6 जून 2026 की सुबह विदेश से दिल्ली पहुँचे,दीपके ने पहले कहा था कि वे दिल्ली पहुँचकर पार्लियामेंट स्ट्रीट पुलिस स्टेशन जाकर अनुमति माँगेंगे , लेकिन, दिल्ली पहुँचने के बाद दिल्ली पुलिस ने उन्हें जंतर-मंतर पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन की अनुमति एयरपोर्ट पर ही दे दी । इसके बाद सीजेपी समर्थक को सीधे जंतर-मंतर आने को कहा। हालाकि शुरुआति दौर में आंदोलन को कोई खास सफलता नहीं मिली , 20 मिलियन फॉलोअर्स वाली कॉकरोच जनता पार्टी जब जमीन पर उतरी तो जंतर-मंतर पर कई सेलिब्रिटी के मंच साझा करने के वाबजूद दो से तीन हजार लोग ही जुटा पायी, लेकिन इस आंदोलन को जब सामाजिक कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने न सिर्फ अपना समर्थन दिया अपितु अनशन पर भी बैठ गए, यहाँ से इस आंदोलन को देशवासियों और केंद्र सरकार ने थोड़ी गंभीरता से लेना शुरू किया l लेकिन सवाल उठता है कि आखिर सोनम वांगचुक ने क्यों आंदोलन को समर्थन दिया ?सोनम वांगचुक और केंद्र सरकार के बीच टकराव उनके NGO Students’ Educational and Cultural Movement of Ladakh (SECMOL) जिसकी स्थापना 1988 में सोनम वांगचुक और उनके साथियों ने लद्दाख में शिक्षा सुधार और युवाओं के सशक्तिकरण के उद्देश्य से की थी से हुई, उसको 2025 में केंद्र सरकार के FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) के तहत लाइसेंस रद्द करने से हुई। सरकार ने FCRA नियमों के कथित उल्लंघन का हवाला दिया, जबकि संगठन ने इन आरोपों से असहमति जताई। इससे पहले 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन के बाद लद्दाख की संवैधानिक और प्रशासनिक स्थिति को लेकर टकराव शुरू हुआ था। 2019 में अनुच्छेद 370 हटने के बाद लद्दाख को बिना विधानसभा वाला केंद्रशासित प्रदेश बना दिया गया। आंदोलनकारियों का कहना था कि इससे स्थानीय लोगों की राजनीतिक भागीदारी कम हो गई, इसलिए लद्दाख को राज्य का दर्जा या कम से कम निर्वाचित विधानसभा मिलनी चाहिए। 24 सितंबर 2025 को लेह में राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची की मांग को लेकर हुए प्रदर्शन हिंसक हो गए।हिंसा में कई लोगों की मौत और अनेक लोग घायल हुए।सरकार ने आरोप लगाया कि सोनम वांगचुक के बयानों से कानून-व्यवस्था बिगड़ी और उन्हें 26 सितंबर 2025 को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA) के तहत. हिरासत में लिया गया था l जेल से निकलने के बाद सोनम वांगचुक के पास केंद्र सरकार के तीव्र विरोध का यह शानदार मौका था और उन्होंने इसे भुनाया l जंतर-मंतर पर छात्रों के आंदोलन के समर्थन में अनशन पर बैठ गए l आंदोलन को थोड़ी विश्वसनीयता मिली, आम आदमी पार्टी के नेता खुलकर जंतर-मंतर आने लगे, विपक्षी, दलों को महसूस होने लगा की आम आदमी पार्टी अकेले नहीं बाजी मार ले इसलिए बारी बारी समाजवादी पार्टी , वामपंथी नेता, किसान आंदोलन वाले नेता पहुचें, 20 जुलाई को संसद का नया सत्र शुरू होने वाला था इसके मद्देनजर कॉकरोच जनता पार्टी ने संसद मार्च का एलान कर दिया l लगातार गिरती सेहत के कारण न्यायालय ने सरकार से सोनम वांगचुक की देखभाल को कहा और सरकार 19 जुलाई को सोनम वांगचुक को जबरदस्ती जंतर-मंतर से उठा कर पुलिस में सफदरजंग अस्पताल में भर्ती कर दिया l
20 मार्च को जब आंदोलनकारी छात्र जब जंतर-मंतर से चले तो संख्या हजारों में थी लेकिन संसद भवन पहुचने के पहले तमाम राजनीतिक दलों के कार्यकर्ता और अपराधी तत्व भी इसका हिस्सा हो गए, धारा 163 सरकार द्वारा लगाने के बावजूद पुलिस को पीटने और और संसद भवन में घुसने की कोशिश होने लगी, पत्थर चलाए गए, बैरिकेडिंग तोड़ दिए गए, फिर पुलिस को वाटर कनाल, आँसू गैस और लाठीचार्ज करना पड़ा l कुछ छात्राओं- छात्राओं को लाठी खानी पड़ी, जिसका वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, पाकिस्तान से भी सोशल मीडिया पर खूब अफवाह फैलाने की कोशिश की गई जिससे छात्र आंदोलन को संजीवनी मिल गई, लेकिन एक सच्चाई ये भी रही कि लाठीचार्ज के दौरान सभी नेता छुपे रहे, रील्स के दीवाने जेन- जी , रील बनाकर सरकार का व्यंगात्मक विरोध के साथ निम्न स्तरीय गली और नारों से जंतर-मंतर पट गया l सरकार ने इन्टरनेट बंद किया तो आंदोलनकारियों ने बिटचैट का इस्तेमाल शुरू किया जिसका इस्तेमाल ज्यादातर अपराधी अपने अपराध छुपाने के लिए करते हैं, जंतर-मंतर पर विदेशों से इतने पीजा, कोल्ड ड्रिंक और पानी भेजे गए कि खाना फेंकना पड़ रहा था, डिलेवरी मैन बस इतना बता पा रहा था कि खाने का समान आमुख देश से आया है, भेजने वाले ने अपने नाम का खुलासा नहीं किया l बहुत स्पष्ट था कि आंदोलन को हवा देने में विदेशी ताकतें लगी थी ,जिसका लिंक कॉकरोच जनता पार्टी से जुड़ा है l सरकार को भी इसकी जानकारी मिल ही रही थी, सरकार ने सबसे पहले सोनम वांगचुक का अनशन उनकी मांगों को मानकर तोड़वा दिया, लेकिन शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे का मुद्दा दरकिनार कर दिया गए, तभी अभिजीत दीपके ने एलान किया कि आंदोलन इस्तीफा के पहले खत्म नहीं होगा l सरकार ने कॉकरोच जनता पार्टी के प्रवक्ताओं को बातचीत के लिए बुलाया और दो दौर की बातचीत में सरकार ने सभी चार मांग मांग जिसमें केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा ,परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार ,प्रदर्शनकारियों पर दर्ज मामलों को वापस लेने की सहमति और पेपर लीक से प्रभावित होकर आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने की शर्त सरकार ने मान लिया ऐसे में ये मान लिया जाए कि सरकार छात्रों, विपक्षी दलों, अपराधियों और अराजक तत्वों के सामने झुक गई ? या यह एक कूटनीतिक निर्णय है ? सरकार ने धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा लेकर न सिर्फ आंदोलन के विस्तार को रोक लिया अपितु एक बार फिर विपक्षी दलों से हाथ में आया मुद्दा छीन गया l सरकार पर तानाशाही का आरोप लगता रहता है , इस निर्णय से देशवासियों में सरकार के प्रति नजरिया बदला , कुछ वर्षो में वोट का अधिकार पाने वाले जेन- जी में सरकार की साख बनी, इंस्टा पर प्रधान मंत्री जी का वीडियो ने व्यूज के मामले में रिकार्ड तोड़ा और नरेंद्र मोदी ने साबित कर दिया कि वो जेन- जी में भी लोकप्रिय हैं इतना ही नहीं इस आंदोलन के कारण विपक्ष संसद सत्र चलने नहीं दे रहा था जिसमें विदेशी फंड पाने वाले NGOs के नियमों में बदलाव और निगरानी बिल, राष्ट्रीय सम्मान से जुड़े कानून में संशोधन बिल, आयकर कानून मे संशोधन बिल , संपत्ति और दस्तावेजों के पंजीकरण कानून ,कंपनी कानूनों में संशोधन पर चर्चा होनी है, विपक्षी दलों के समर्थन वाले लोग जो खुद को समाज सेवी कहते हैं इनका विदेशों से फंड आता है ,सोनम वांगचुक भी उनमें से एक है l अगर यह बिल आता है तो विपक्षी दलों को जो फंड आता है उसकी निगरानी सरकार कर सकेगी और उसपर नियंत्रण हो जाएगा l संपति और दस्तावेज के पंजीयन वाले बिल से आय से अधिक सम्पत्ति में विपक्ष के कई नेता उलझेगे ऐसे में प्रथम दृष्टया यह केंद्र सरकार की हार लगती है या ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार झुक गयी लेकिन वास्तव में सरकार ने बेहद सटीक कूटनीतिक फैसला लिया है जिसका लाभ भविष्य में सरकार को जरूर होगा l





