यशोभूमि में तीन दिनों की वैश्विक तकनीकी साझेदारी ने भारत को सिलिकॉन से सिस्टम तक ले जाने का रोडमैप दिखाया, करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव और लगभग 1 लाख संभावित रोजगार अवसरों से खुली नई संभावनाएँ
विनोद सिंह ‘तकियावाला’
दिल्ली के यशोभूमि में 17 से 19 सितंबर तक आयोजित सेमीकॉन इंडिया 2026 की गूँज केवल सेमीकंडक्टर उद्योग तक सीमित नहीं रही। तीन दिनों के इस वैश्विक सम्मेलन ने भारत की बदलती तकनीकी और आर्थिक तस्वीर को सामने रखा, जहाँ चिप अब केवल एक इलेक्ट्रॉनिक पुर्जा नहीं, बल्कि भविष्य की अर्थव्यवस्था, रोजगार, तकनीकी आत्मनिर्भरता और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला की आधारभूत शक्ति बन रही है। ‘सिलिकॉन से सिस्टम तक : इकोसिस्टम का निर्माण’ की अवधारणा के साथ आयोजित यह सम्मेलन उस पड़ाव का संकेत बना, जहाँ भारत नीति बनाने वाले देश से आगे बढ़कर डिजाइन, निर्माण, पैकेजिंग, परीक्षण, अनुसंधान, सामग्री, उपकरण और प्रतिभा विकास से जुड़े संपूर्ण सेमीकंडक्टर तंत्र की ओर बढ़ता दिखाई दे रहा है।सेमीकॉन इंडिया 2026 में 600 से अधिक कंपनियों और करीब 300 अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शकों की भागीदारी रही। 52 देशों के प्रतिनिधि, 400 से अधिक अधिकारी और 150 से अधिक वक्ता इसमें शामिल हुए। जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, नीदरलैंड, सिंगापुर और स्वीडन के छह देशीय मंडप तथा 12 राज्यों की भागीदारी ने यह संकेत दिया कि भारत वैश्विक सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में अपनी भूमिका को व्यापक बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों को तेजी से आगे बढ़ा रहा है।
तीन दिनों की इस यात्रा को यदि क्रमवार देखा जाए तो पहला दिन नीति, निवेश और भविष्य की दिशा तय करने वाला रहा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षा के अगले चरण का रोडमैप सामने रखा। सेमीकॉन 2.0 के तहत करीब ₹1.27 लाख करोड़ के कुल परिव्यय और सेमीकंडक्टर मिशन के लिए 13.5 अरब डॉलर के समर्थन ने इस क्षेत्र को दीर्घकालिक राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्थापित किया। डिजाइन, विनिर्माण, उन्नत पैकेजिंग, अनुसंधान एवं विकास और प्रतिभा विकास को एक साथ आगे बढ़ाने पर जोर दिया गया।प्रधानमंत्री ने युवा चिप डिजाइनरों और विद्यार्थियों से संवाद करते हुए उन्हें भारत के सेमीकंडक्टर भविष्य में सक्रिय भूमिका निभाने का आह्वान किया। यही वह बिंदु है जहाँ सेमीकॉन इंडिया 2026 को भारत के युवाओं के भविष्य से जोड़कर देखने की जरूरत है। भारत की युवा आबादी केवल रोजगार खोजने वाली शक्ति नहीं, बल्कि नई तकनीक बनाने वाली प्रतिभा बन सकती है। स्टार्टअप पवेलियन, विद्यार्थी हैकाथॉन और वर्कफोर्स डेवलपमेंट जोन ने इसी दिशा को आगे बढ़ाया।
सरकारी आँकड़ों के अनुसार सेमीकॉन 2.0 के अंतर्गत पूरे सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में करीब ₹1 लाख करोड़ के निवेश प्रस्ताव सामने आए हैं। इन प्रस्तावों से लगभग 1 लाख नए रोजगार अवसर सृजित होने की संभावना है और करीब 1 लाख तकनीशियनों को प्रशिक्षित करने की योजना बनाई गई है। यह आंकड़ा केवल नौकरी की संख्या नहीं है, बल्कि कौशल आधारित अर्थव्यवस्था की उस दिशा का संकेत है जिसमें इंजीनियरिंग, इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप डिजाइन, पैकेजिंग, परीक्षण, मशीन संचालन, अनुसंधान, डेटा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उन्नत विनिर्माण जैसे क्षेत्रों में युवाओं के लिए नए रास्ते खुलेंगे।भारत की चिप डिजाइन क्षमता भी तेजी से बढ़ रही है। सेमीकॉन कार्यक्रम के तहत 24 चिप डिजाइन परियोजनाओं को मंजूरी दी गई है। करीब 70 हजार डिजाइन इंजीनियरों को प्रशिक्षण दिया जा चुका है। 400 इंजीनियरिंग कॉलेजों और 105 स्टार्टअप को उद्योग स्तर के ईडीए डिजाइन उपकरणों तक पहुँच मिली है। यह संकेत देता है कि भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में केवल उत्पादन इकाइयाँ स्थापित करने तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि डिजाइन और नवाचार की पूरी क्षमता देश में विकसित करना चाहता है।महिलाओं के लिए भी सेमीकंडक्टर उद्योग एक व्यापक अवसर क्षेत्र बन सकता है। सम्मेलन में महिला नेतृत्व और तकनीकी क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी पर विशेष चर्चा हुई। चिप डिजाइन, अनुसंधान, गुणवत्ता नियंत्रण, सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन, पैकेजिंग, प्रबंधन, आपूर्ति श्रृंखला, शिक्षा और स्टार्टअप जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाई जा सकती है। कौशल विकास, प्रशिक्षण, वित्तीय सहायता और उद्यमिता को संस्थागत समर्थन मिले तो महिला इंजीनियर, शोधकर्ता और उद्यमी इस उभरते तकनीकी क्षेत्र की महत्वपूर्ण शक्ति बन सकती हैं।दूसरे दिन सम्मेलन का केंद्र राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों पर रहा। सेमीकंडक्टर विनिर्माण, सामग्री, लॉजिस्टिक्स, चिप डिजाइन, उन्नत पैकेजिंग, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स और कार्यबल विकास से जुड़े 25 महत्वपूर्ण समझौते और सहयोग सामने आए। भारत सेमीकंडक्टर मिशन और निप्पॉन एक्सप्रेस के बीच समझौता सेमीकंडक्टर लॉजिस्टिक्स, भंडारण, सीमा शुल्क और आपूर्ति श्रृंखला को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की विभिन्न तकनीकी साझेदारियों तथा टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स और एलएंडटी सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजीज के बीच रणनीतिक सहयोग ने विनिर्माण और उत्पाद विकास की संभावनाओं को विस्तार दिया।
अंतरराष्ट्रीय सहयोग की तस्वीर भी महत्वपूर्ण रही। भारत-अमेरिका सेमीकंडक्टर एवं इलेक्ट्रॉनिक्स इकोसिस्टम राउंडटेबल में 64 भारतीय कंपनियों और 52 अंतरराष्ट्रीय संगठनों ने भाग लिया। वाणिज्यिक साझेदारी, संयुक्त उपक्रम, अनुसंधान एवं विकास, आपूर्ति श्रृंखला और कौशल विकास जैसे विषयों पर चर्चा हुई। भारत-जापान सेमीकंडक्टर राउंडटेबल में जापान की उपकरण, सामग्री और प्रिसिजन मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को भारत की मांग, डिजाइन प्रतिभा और बढ़ते विनिर्माण आधार से जोड़ने पर जोर दिया गया।सिंगापुर के साथ कौशल और शिक्षा के क्षेत्र में सहयोग की दिशा भी सामने आई। एनआईईएलआईटी और सिंगापुर पॉलीटेक्निक इंटरनेशनल के बीच सेमीकंडक्टर शिक्षा, प्रशिक्षण और कौशल विकास को मजबूत करने का समझौता हुआ। एनआईईएलआईटी और टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स के बीच उद्योग के अनुरूप एटीएमपी कार्यबल तैयार करने तथा एनआईईएलआईटी और सेमी यूनिवर्सिटी के बीच प्रशिक्षण, प्रमाणन और संकाय विकास को आगे बढ़ाने की पहल हुई।
सेमीकंडक्टर उद्योग के विस्तार के साथ प्रशिक्षित मानव संसाधन की मांग बढ़ने वाली है और इसलिए कौशल विकास इस पूरी यात्रा का निर्णायक आधार बनने जा रहा है।तीसरे दिन सम्मेलन में स्वदेशी तकनीक, डीप-टेक निवेश और भविष्य के मानव संसाधन पर विशेष ध्यान दिखाई दिया। इंडीसेमिकॉन और सी-डैक द्वारा विकसित देश के पहले स्वदेशी सिस्टम-ऑन-मॉड्यूल आईएससी-वेगा-एसओएम का प्रदर्शन भारत की डिजाइन क्षमता का महत्वपूर्ण उदाहरण रहा। इसमें सी-डैक का वेगा तेजस32 प्रोसेसर और इंडीसेमिकॉन का लोरावायरलेस आरएफ मॉड्यूल एकीकृत है। यह उपलब्धि बताती है कि भारत में चिप डिजाइन अब केवल प्रयोगशाला तक सीमित नहीं है, बल्कि उत्पाद निर्माण की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है।
डीप-टेक क्षेत्र में इंडिया डीप टेक एलायंस ने 56 भारतीय डीप-टेक कंपनियों में 263 मिलियन अमेरिकी डॉलर के निवेश की जानकारी दी। वहीं सेमी और इंडिया डीप टेक एलायंस के बीच इंडिया सेमीकंडक्टर अकादमी विकसित करने की साझेदारी का उद्देश्य उद्योग आधारित कौशल मंच तैयार करना है। कैडेंस, सीजी सेमी, डिक्सन टेक्नोलॉजीज, माइक्रोन, सिनॉप्सिस और अन्य संस्थानों की भागीदारी उद्योग तथा शिक्षा के बीच संबंधों को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण है।
भारत की इस यात्रा की आधारभूमि सेमीकॉन 1.0 ने तैयार की है। सेमीकॉन इंडिया कार्यक्रम के प्रारंभिक चरण में ₹76 हजार करोड़ का परिव्यय निर्धारित किया गया था। इसके तहत 12 सेमीकंडक्टर विनिर्माण इकाइयों को मंजूरी मिली, जिनमें कुल निवेश ₹1.64 लाख करोड़ से अधिक है। इनमें एक सिलिकॉन फैब, एक सिलिकॉन कार्बाइड फैब, एक गैलियम नाइट्राइड माइक्रो-एलईडी डिस्प्ले फैब और नौ एटीएमपी तथा ओएसएटी इकाइयाँ शामिल हैं। इनमें से पाँच इकाइयों ने वाणिज्यिक उत्पादन शुरू कर दिया है। यह भारत के लिए केवल घोषणा से उत्पादन की ओर बढ़ने का महत्वपूर्ण संकेत है।
अब सेमीकॉन 2.0 इस यात्रा को अगले चरण में ले जा रहा है। इसका उद्देश्य डिजाइन से लेकर निर्माण, उन्नत पैकेजिंग, अनुसंधान एवं विकास, मशीनरी, सामग्री और प्रतिभा विकास तक पूरी मूल्य श्रृंखला को मजबूत करना है। भारत की रणनीति स्पष्ट दिखाई देती है कि देश को केवल चिप असेंबली या बड़े बाजार के रूप में नहीं, बल्कि वैश्विक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित किया जाए।
सेमीकंडक्टर आज मोबाइल फोन, कंप्यूटर, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, इलेक्ट्रिक वाहन, अंतरिक्ष, रक्षा, चिकित्सा उपकरण, दूरसंचार, ऊर्जा और स्मार्ट बुनियादी ढाँचे की रीढ़ बन चुका है। इसलिए जिस देश के पास चिप की डिजाइन और निर्माण क्षमता होगी, वह भविष्य की तकनीकी अर्थव्यवस्था में अधिक महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकेगा। इसी कारण सेमीकॉन इंडिया 2026 में सामने आई साझेदारियाँ भारत की आर्थिक और तकनीकी सुरक्षा से भी जुड़ती हैं।वर्ष 2047 के विकसित भारत की कल्पना को यदि रोजगार, नवाचार, आत्मनिर्भरता और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के चार आधारों पर देखा जाए तो सेमीकंडक्टर क्षेत्र इन सभी को एक साथ जोड़ता है। विदेशी कंपनियों और तकनीकी संस्थानों के साथ साझेदारी भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला से जोड़ती है, जबकि स्वदेशी डिजाइन, सामग्री, पैकेजिंग और विनिर्माण क्षमता देश की आंतरिक तकनीकी शक्ति को मजबूत करती है। युवाओं को कौशल, शोध और उद्यमिता से जोड़कर तथा महिलाओं को तकनीकी नेतृत्व और रोजगार के अवसर देकर यह क्षेत्र भारत की मानव पूंजी को नई दिशा दे सकता है।यशोभूमि में तीन दिनों तक चली सेमीकॉन इंडिया 2026 की वास्तविक सफलता अब इस बात से तय होगी कि सम्मेलन में हुई घोषणाएँ कितनी तेजी से जमीन पर उतरती हैं। निवेश से कारखाने स्थापित हों, भारतीय डिजाइन वैश्विक उत्पादों में दिखाई दे, स्टार्टअप बाजार तक पहुँचें, प्रशिक्षित तकनीशियनों को रोजगार मिले और युवा तथा महिलाएँ इस नई औद्योगिक क्रांति की सक्रिय भागीदार बनें, तभी इस आयोजन की व्यापक उपलब्धि सामने आएगी।
सेमीकॉन इंडिया 2026 ने भारत के सामने संभावनाओं का एक बड़ा द्वार खोल दिया है। पहले दिन नीति और निवेश की दिशा तय हुई, दूसरे दिन राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों का विस्तार हुआ और तीसरे दिन स्वदेशी तकनीक, कौशल तथा मानव संसाधन की भूमिका सामने आई।अब चुनौती इन संभावनाओं को उत्पादन, कौशल, रोजगार, अनुसंधान और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में बदलने की है। यदि नीति, पूँजी, तकनीक, उद्योग, शिक्षा और प्रतिभा का यह संगम निरंतर गति बनाए रखता है तो सिलिकॉन से सिस्टम तक की यह यात्रा केवल सेमीकंडक्टर उद्योग की कहानी नहीं रहेगी, बल्कि 2047 के विकसित भारत की तकनीकी और आर्थिक पहचान गढ़ने वाली महत्वपूर्ण यात्रा बन सकती है।





