सोमवार को खुलेगा 273 निकाय प्रमुखों के भाग्य का फैसला

The fate of 273 civic body chiefs will be decided on Monday

पार्षदों की एकजुटता और राजनीतिक प्रबंधन की परीक्षा

एन. जी. भट्ट

राजस्थान के नगरीय निकाय चुनाव अब उस निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गए हैं, जहां सोमवार 21 सितंबर को 273 शहरों की नई शहरी सरकारों की तस्वीर काफी हद तक साफ हो जाएगी। नामांकन वापसी के बाद जहां 32 निकायों में मेयर, सभापति और अध्यक्ष निर्विरोध चुने जा चुके हैं, वहीं शेष निकायों में प्रमुख पद के लिए पार्षद मतदान करेंगे। राज्य निर्वाचन आयोग की प्रक्रिया के अनुसार सोमवार को सुबह 10 बजे से मतदान होगा और इसके बाद मतगणना कर परिणाम घोषित किए जाएंगे।

निर्विरोध निर्वाचन ने निकाय चुनाव की राजनीतिक तस्वीर का एक महत्वपूर्ण हिस्सा पहले ही स्पष्ट कर दिया है। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार 32 निकायों में प्रमुख निर्विरोध चुने गए हैं। इनमें भाजपा के उम्मीदवारों की संख्या सबसे अधिक रही है, जबकि कांग्रेस और निर्दलीय उम्मीदवारों को भी सफलता मिली है। यह स्थिति बताती है कि निकाय प्रमुख का चुनाव केवल पार्षदों के संख्याबल का गणित नहीं है, बल्कि स्थानीय समीकरण, गुटबाजी, व्यक्तिगत प्रभाव और राजनीतिक प्रबंधन भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।भरतपुर नगर निगम इसका उल्लेखनीय उदाहरण है। यहां निर्दलीय पार्षदों की संख्या अधिक होने के बावजूद भाजपा की अनुराधा सिंह निर्विरोध महापौर चुनी गईं। दूसरी ओर भीलवाड़ा में भाजपा के पास स्पष्ट बहुमत होने के कारण उसका उम्मीदवार निर्विरोध चुना गया। दोनों घटनाक्रम यह संकेत देते हैं कि सदन में संख्या और उस संख्या को राजनीतिक समर्थन में बदलने की क्षमता—दो अलग-अलग पहलू हैं।

अब सोमवार को होने वाला मतदान इन समीकरणों की वास्तविक परीक्षा होगा। जिन निकायों में मुकाबला बचा है, वहां भाजपा और कांग्रेस के साथ निर्दलीय पार्षद और स्थानीय राजनीतिक समूह निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। नामांकन वापसी के बाद 305 निकायों के लिए 820 उम्मीदवारों में से 197 ने नाम वापस लिए और 592 उम्मीदवार मैदान में रह गए हैं। ऐसे में कई स्थानों पर एक-एक पार्षद का समर्थन भी परिणाम की दिशा बदल सकता है।

यही कारण है कि अगले चरण में राजनीतिक दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल अपने पार्षदों की संख्या नहीं, बल्कि उन्हें एकजुट रखने की होगी। स्थानीय गुटबाजी, बागी पार्षद, निर्दलीय समूह और व्यक्तिगत राजनीतिक समीकरण कई जगह दलों के घोषित गणित को उलट सकते हैं। निर्विरोध चुने गए प्रमुखों ने जहां राजनीतिक बढ़त का संकेत दिया है, वहीं शेष निकायों के परिणाम संगठनात्मक प्रबंधन की असली परीक्षा होंगे।
चार निकाय—जयपुर, जोधपुर और कोटा नगर निगम तथा सुकेत नगरपालिका—पुनर्मतदान से जुड़ी प्रक्रिया के कारण इस चरण से अलग हैं और इनके प्रमुख पदों का फैसला 25 सितंबर को होगा। इसलिए 21 सितंबर का दिन महत्वपूर्ण होने के बावजूद निकाय चुनाव की पूरी तस्वीर 25 सितंबर के बाद ही सामने आएगी।

इन चुनावों को व्यापक राजनीतिक संदर्भ में भी देखा जा रहा है। भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए निकायों में प्रभाव स्थानीय संगठन की स्थिति और आगामी राजनीतिक गतिविधियों के लिए संकेत देगा। हालांकि निर्विरोध निर्वाचन या किसी एक चरण के परिणाम को पूरे प्रदेश के राजनीतिक जनादेश का सीधा प्रतिबिंब मानना सावधानीपूर्ण नहीं होगा।

आखिरकार शहरों की नई सरकारों के सामने राजनीतिक समीकरण से कहीं बड़ी चुनौती नागरिक सुविधाओं की होगी। सफाई, पेयजल, सड़क, यातायात, कचरा प्रबंधन, सीवरेज और नियोजित शहरी विकास जैसे मुद्दे ही इन निकायों के कामकाज की वास्तविक कसौटी बनेंगे। सोमवार को पार्षद भले ही प्रमुखों का चुनाव करेंगे, लेकिन उसके बाद जनता इन नई शहरी सरकारों के काम का मूल्यांकन करेगी। इस अर्थ में 21 सितंबर का फैसला केवल कुर्सियों का फैसला नहीं, बल्कि अगले पांच वर्षों की शहरी राजनीति और प्रशासन की दिशा तय करने वाला महत्वपूर्ण पड़ाव होगा।