अपना घर

Our home

डॉ वंदना शर्मा

रामप्रसाद अभी-अभी लौटे थे अपनी धर्मपत्नी दुलारी को डॉक्टर से दवाई दिलवाकर। उनकी धर्मपत्नी को कई दिन से धुंधला दिख रहा था। आँखों में दर्द और धुंध की शिकायत कर रही थी। डॉक्टर ने जाँच के बाद गंभीरता से कहा – मोतियाबिंद पक गया है, दोनों आँखों का ऑपरेशन करना होगा।

घर आकर दुलारी ने अपनी बड़ी बेटी विनीता को फोन किया और सारी बात बताई। फोन के दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही। फिर बड़ी बेटी विनीता ने चिंतित और थोड़े अपराध बोध से भरे स्वर में कहा – “माँ, मैं कैसे आ सकती हूँ, बच्चों की परीक्षा चल रही है। आँख बनवाने पर पंद्रह दिन का परहेज बताते हैं डॉक्टर। पन्द्रह दिन तक चूल्हे के पास नहीं जाना चाहिए। धुएं और गर्मी से तकलीफ बढ़ सकती है। पिताजी को भी खाना बनाना नहीं आता। उन्होंने आज तक घर के काम किए ही नहीं। अभी तो माँ भाभी भी नहीं आ पाएंगी। उनके बच्चों की भी परीक्षा चल रही होगी।”

दुलारी ने गहरी साँस ली। उसने बेटी से कहा – “कोई बात नहीं बेटा, तेरे पिताजी खाना बाहर से ले आएंगे। जैसे भी होगा हम कर लेंगे। जब तेरे पिताजी को कोरोना हुआ था। तब भी कोई नहीं आया था खबर लेने, दवाई को पूछने। खुद ही जाते थे दवाई लेने भी। रास्ते में पुलिस वाले पूछते तो यही बताते, कोई नहीं है मेरा, जो दवाई ला सके।”

फोन कट गया। विनीता फोन काटने के बाद कुछ देर के लिए स्तब्ध सी सोफे पर बैठ गई। वह कभी अपने छोटे से किराए के घर की दीवारों को देखती, कभी बाहर खिड़की से। बहुत से विचार उसके मन में तूफान की तरह उमड़ रहे थे। माँ की असहाय आवाज उसके कानों में गूँज रही थी। विनीता का भी दस साल से यही सपना था कि उसका अपना घर हो। एक ऐसा घर जिसकी दीवारों पर उसकी मर्जी का रंग हो। जिसका हर कोना उसकी मर्जी से सजा हो।

विनीता दस साल से किराए के घर में रह रही थी। बार-बार घर बदलना पड़ता। हर बार शिफ्टिंग में बहुत सा सामान टूट जाता और कभी स्पेस की कमी से किसी को देना पड़ता। वह चाहती थी कि उसका एक घर हो, अपना घर। बड़े सपने देखे थे उसने अपने घर के। एक छोटा सा बगीचा, एक रसोई जो उसकी अपनी हो। लेकिन अब वह कुछ और ही सोच रही थी।

वह सोचने लगी – इन्सान पाई-पाई जोड़कर घर बनाता है ताकि उसके बच्चे आराम से रह सकें। उसके बच्चों को घर के लिए संघर्ष न करना पड़े। विनीता भी यही चाहती थी कि वह अपने बेटे के लिए घर जरूर बनवाकर जाएगी इस दुनिया से। लेकिन सब उसका भ्रम था। आजकल बच्चे माँ-बाप के घर में रहते ही कहाँ हैं? बच्चों के बड़े होने तक नया फैशन, नया डिजाइन शुरू हो जाता है। उन्हें माँ-बाप का बनाया हुआ घर पुराना लगता है। वे अपने हिसाब से नई सुविधाओं के साथ नया घर बनाते हैं। और माँ-बाप? माँ-बाप बुढ़ापे में उसी पुराने घर में अकेले रह जाते हैं, एक-एक दीवार को देखते हुए।

एक बात उसकी समझ में नहीं आई – हम जितना प्यार अपने बच्चों से करते हैं उतना अपने माँ-बाप से क्यों नहीं कर पाते? कैसा कलयुग है ये, जहाँ हम अपने बच्चों के लिए सब कुछ करना चाहते हैं और अपने माँ-बाप को अकेला छोड़ देते हैं। यह सोचते-सोचते उसकी आँखें भर आईं।

फिर विनीता सोफे से उठी और रसोई में गई। उसने जल्दी से साफ-सफाई का काम खत्म किया और लैपटॉप खोलकर नेट पर एक विज्ञापन बनाने लगी। उसने लिखा – “एक सहायक की जरूरत है जो चौबीस घंटे बुजुर्ग दंपत्ति के साथ रहे। खाना, रहना फ्री और अच्छा वेतन।” उसने इस विज्ञापन को कई सोशल मीडिया ग्रुप और लोकल जॉब पोर्टल पर पोस्ट कर दिया।

कुछ दिनों बाद उसे एक अनजान नंबर से कॉल आता है। दूसरी तरफ एक दुबली-पतली आवाज थी – “मैम, मैं सोहन बोल रहा हूँ। मुझे जॉब की बहुत जरूरत है, क्या मुझे यह जॉब मिल सकती है? मैं सोलह साल का हूँ।”

विनीता ने उस लड़के सोहन को मिलने के लिए अपने घर बुलाया। सोहन फटे-पुराने कपड़ों में आया था, आँखों में अजीब सी सच्चाई और डर था। सोहन ने बताया कि उसके माँ-बाप एक साल पहले एक सड़क दुर्घटना में चल बसे। उसके बाद सभी रिश्तेदारों ने धीरे-धीरे उससे किनारा कर लिया। अब उसका कोई नहीं है। गाँव में किसी तरह दूसरों के खेतों में काम करके गुजारा कर रहा था, लेकिन उसे अपनी जीविका के लिए कोई स्थायी काम चाहिए, रहने की जगह चाहिए।

विनीता को उसकी कहानी में सच्चाई लगी, पर वह सतर्क भी थी। उसने सोहन के परिचय-पत्र, आधार कार्ड आदि दस्तावेज लिए और अपने जान-पहचान के एक पुलिस अधिकारी से चेक करवाए। जब पुलिस वेरिफिकेशन में सब ठीक निकला और वह संतुष्ट हो गई, तो वह उसे अपने गृह जनपद अपनी मम्मी-पापा के पास ले गई।

घर पहुँचकर उसने पिताजी से कहा – “पिता जी, यह सोहन है, मेरी ससुराल के परिचय में ही है, आप इस पर भरोसा कर सकते हैं। इसे काम की जरूरत है और आपको सहारे की। आज से यह आपके साथ रहेगा और घर के सारे काम करेगा। आपकी देखभाल करेगा, दवाई लाएगा, खाना बनाएगा। भुगतान मैंने कर दिया है एक वर्ष का। इसका खाता खुलवाकर इसके नाम पैसे जमा कर दिए हैं। अब आप बेफिक्र होकर मम्मी की आँखों का ऑपरेशन कराएं। हर महीने मैं भी आती रहूंगी एक बार निरीक्षण के लिए।”

रामप्रसाद ने पहले तो मना किया, पर बेटी की जिद और सोहन की विनम्रता देखकर मान गए। बोले, “ठीक है बेटा।”

दुलारी का ऑपरेशन सफल रहा। सोहन ने जी-जान से सेवा की। वह बेटे की तरह पैर दबाता, समय पर दवाई देता, रामायण पढ़कर सुनाता। धीरे-धीरे वह घर का सदस्य बन गया।

पर विनीता की चिंता अभी खत्म नहीं हुई थी। उसने अपनी माँ के घर में जो अकेलापन देखा, वह केवल उसके माँ-बाप की कहानी नहीं थी। वह सोचने लगी – यह समस्या तो आज हर दूसरे घर की है। शहरों में बच्चे नौकरी के लिए बाहर चले जाते हैं और गाँव में माँ-बाप अकेले। मुझे कुछ करना चाहिए। घर तो बनाऊँगी लेकिन सिर्फ अपने लिए नहीं, ऐसे सभी माँ-बाप के लिए जो बुढ़ापे में अकेले रहते हैं और जिनका कोई सहारा नहीं।

यह विचार आते ही विनीता ने एक बड़ा फैसला लिया। उसने अपनी सारी FD तुड़वा दी, बैंक से लोन लिया और अपने गहने बेच दिए। शहर के बाहर, जहाँ थोड़ी जमीन सस्ती थी, उसने एक बड़ा सा घर बनवाया। घर में चार बड़े कमरे, एक बड़ा आँगन, रसोई और एक छोटा सा मंदिर। घर के आगे उसने एक छोटा सा बगीचा भी बनवाया। और उस घर के बाहर एक सुंदर सी नेम प्लेट लगवाई, जिस पर लिखा था – “अपना घर”।

शुरुआत उसने अपने परिचित लोगों से की। जो भी वृद्ध, एकाकी थे, जिनके बच्चे विदेश में थे या जो बेघर थे, उनको वह प्यार से उस घर में ले आई और शरण दी। वहाँ आकर वे सब एक-दूसरे का सहारा बन गए। और जिससे वे सब बोर न हों और खुद को उपयोगी समझें, इसके लिए विनीता ने उन्हें बागवानी सिखवाई, क्राफ्ट सिखवाया, कभी-कभी बच्चों को कहानी सुनाने के लिए स्कूल भी ले जाती। वह घर अब वृद्धाश्रम नहीं, एक परिवार बन गया था।

कुछ साल बीत गए। विनीता का बेटा भी बड़ा होकर नौकरी के लिए दूसरे शहर चला गया। पति के जाने के बाद विनीता ने अपना शहर वाला घर हमेशा के लिए बेच दिया और उसी ‘अपना घर’ में जाकर रहने लगी। अब वही उसकी दुनिया थी। वही लोग उसके माँ-बाप, भाई-बहन थे।

वह शाम को सबके साथ आँगन में बैठकर चाय पीती और हँसते हुए कहती – “देखा, आखिरकार मेरा अपना घर बन ही गया।” अब यही उसका अपना परिवार था। उसका सच्चा ‘अपना घर’।