रविवार दिल्ली नेटवर्क
चेन्नई में पिनाकिन एचपीएफसी समेत स्वदेशी ऊर्जा प्लेटफॉर्मों का व्यावसायिक शुभारंभ, पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने किया अवलोकन
चेन्नई। हाइड्रोजन से बिजली उत्पादन की दिशा में भारत ने एक महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। चेन्नई स्थित सेंटर फॉर ग्लोबल चैलेंजेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री अश्विनी चौबे ने भारत में विकसित तीन ऊर्जा प्लेटफॉर्म—आर-पिनाकिन फ्यूल सेल, आर-रुद्र एसएमआर (स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर) और कॉम्पैक्ट आर-पिनाकिन मिनी—का अवलोकन कर उनके व्यावसायिक शुभारंभ में भाग लिया। कार्यक्रम का आयोजन वाई-कैपिटा ग्रुप एवं एंटिटी टू एनर्जी स्टोरेज की टीम द्वारा किया गया।
अश्विनी चौबे ने कहा कि हाइड्रोजन से चलने वाले इन ऊर्जा उपकरणों के माध्यम से कम लागत में बिजली उपलब्ध कराने की चुनौती का समाधान संभव है। उन्होंने कहा कि “3 रुपए प्रति यूनिट की ईंधन लागत वाला हाइड्रोजन पावर सिस्टम भारत के लिए नई ऊर्जा क्रांति का परिचायक है।” उनके अनुसार हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक आत्मनिर्भर भारत को मजबूती देने की क्षमता रखती है।
कंपनी के अनुसार पिनाकिन एचपीएफसी वर्तमान में 33 किलोवाट और 1 मेगावाट विन्यास में उपलब्ध है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल हाइड्रोजन को विद्युत-रासायनिक प्रक्रिया के जरिए सीधे बिजली में परिवर्तित करता है। इसके संचालन के दौरान प्रत्यक्ष वायु-उत्सर्जन नहीं होता और जलवाष्प उप-उत्पाद के रूप में प्राप्त होती है।
बिहार के औद्योगिक विकास में भी उपयोगी
अश्विनी चौबे ने कहा कि छोटे उद्योगपति और व्यवसायी यदि अपने परिसरों में विश्वसनीय ऊर्जा व्यवस्था विकसित कर सकें तो इससे कारोबार को नई गति मिल सकती है। एमएसएमई एवं लघु औद्योगिक इकाइयां मॉड्यूलर प्रणाली को अपने परिसर में स्थापित कर अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक हिस्से के लिए स्थानीय उत्पादन की दिशा में आगे बढ़ सकती हैं। प्रेस विज्ञप्ति में पिनाकिन एचपीएफसी के लिए कैप्टिव हाइड्रोजन ईंधन लागत लगभग ₹3 प्रति किलोवाट-घंटा बताई गई है।
स्थानीय स्तर पर बिजली उत्पादन से ग्रिड संबंधी व्यवधानों के प्रभाव को कम करने की संभावना है। विशेष रूप से उन उद्योगों के लिए यह व्यवस्था उपयोगी हो सकती है, जहां निरंतर बिजली आपूर्ति जरूरी है। चौबे ने बिहार के औद्योगिक विकास में हाइड्रोजन से बिजली पैदा करने वाले पिनाकिन फ्यूल सेल को महत्वपूर्ण और सहायक बताया।
गांव से अस्पताल और सीमावर्ती क्षेत्रों तक संभावनाएं
कार्यक्रम में हाइड्रोजन आधारित ऊर्जा प्रणालियों के संभावित उपयोग के तौर पर सुदूर गांवों, अस्पतालों, कृषि क्षेत्र, सीमावर्ती इलाकों और शहरी क्षेत्रों को चिन्हित किया गया। अस्पतालों में निर्बाध बिजली आपूर्ति, कृषि में सिंचाई एवं उत्पादन तथा सीमावर्ती क्षेत्रों में विश्वसनीय ऊर्जा उपलब्धता के लिए ऐसी प्रणालियां उपयोगी हो सकती हैं।
चौबे ने कहा कि भारत के सामने ऊर्जा की समस्या जितनी बड़ी नहीं है, उससे बड़ी चुनौती ऊर्जा को सही स्थान तक पहुंचाने की है। उनके अनुसार यही चुनौती विकेंद्रीकृत और मॉड्यूलर ऊर्जा प्रणालियों के महत्व को सामने लाती है।
उन्होंने कहा कि भारत का ऊर्जा भविष्य स्वच्छ, विश्वसनीय और आत्मनिर्भर होना चाहिए। वर्ष 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए अनुसंधान, नवाचार, भारतीय प्रतिभा और भारतीय तकनीक की जरूरत होगी। उन्होंने डॉ. कौशिक पालिछा और उनकी टीम से इन तकनीकों के ग्रामीण क्षेत्रों में भी पायलट प्रयोग की संभावनाएं तलाशने का आग्रह किया।
चौबे ने टीम को बधाई देते हुए कहा कि यह पहल केवल एक उपकरण विकसित करने का प्रयास नहीं है, बल्कि यह विश्वास भी स्थापित करती है कि भारत अपनी ऊर्जा चुनौतियों के लिए स्वदेशी समाधान विकसित कर सकता है।





