एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं
वैश्विक स्तरपर हर वर्ष 5 सितंबर को भारत शिक्षक दिवस के रूप में मनाता है।यह दिन महान दार्शनिक,शिक्षाविद् और भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती को समर्पित है।इस अवसर पर विद्यार्थी अपने शिक्षकों को शुभकामनाएँ देते हैं,फूल भेंट करते हैं और विद्यालयों में विभिन्न कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। लेकिन शिक्षक दिवस का वास्तविक अर्थ केवल समारोह अभिनंदन और औपचारिक बधाइयों तक सीमित नहीं होना चाहिए। यह वह अवसर है जब पूरा समाज स्वयं से यह प्रश्न पूछे कि जिस शिक्षक को राष्ट्र के भविष्य का निर्माता कहा जाता है,उसकी सामाजिक प्रतिष्ठा,नैतिक जिम्मेदारी और पेशेवर जवाबदेही की स्थिति आज कहाँ खड़ी है। भारतकी प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा में गुरु को केवल पाठ पढ़ाने वाला व्यक्ति नहीं,बल्कि चरित्र संस्कार, विवेक औरजीवन -दृष्टि प्रदान करने वाला मार्गदर्शक माना गया।इसलिए शिक्षक का आचरणकेवल उसका निजी विषय नहीं है;उसका प्रभाव आने वाली पीढ़ियों के व्यक्तित्व और अंततः राष्ट्र के सामाजिक चरित्र पर पड़ता है।डिजिटल युग ने शिक्षा के साधनों को अभूतपूर्व रूप से आधुनिक बनाया है, लेकिन आधुनिक तकनीक के साथ नैतिकता और जवाबदेही की समान गति से मजबूती नहीं हुई तो शिक्षा की आत्मा सटीकता से कमजोर पड़ सकती है।
साथियों, भारत में शिक्षा को संवैधानिक और सामाजिक दृष्टि से लोककल्याण का माध्यम माना गया है।संविधान का अनुच्छेद 21ए और शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009, 6 से 14 वर्ष की आयु के बच्चों के लिए निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार सुनिश्चित करते हैं। विद्यालयों के संचालन, शिक्षकों की नियुक्ति,योग्यता, जिम्मेदारियों और संस्थागत मानकों के लिए केंद्र तथा राज्यों के स्तर पर विभिन्न नियम और विनियम मौजूद हैं। केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड से संबद्ध विद्यालयों के लिए संबद्धता संबंधी उपनियम हैं, जबकि राज्यों में अपने- अपने शिक्षा नियम और सेवा आचरण व्यवस्थाएँ लागू हैं। उच्च शिक्षा में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद जैसी संस्थाएँ नियामक भूमिका निभाती हैं।सर्वोच्च न्यायालय के टी.एम.ए. पाई फाउंडेशन तथा पी.ए. इनामदार जैसे महत्वपूर्ण निर्णयों ने शिक्षा के क्षेत्र में संस्थागत स्वायत्तता के साथ-साथ शिक्षा के गैर- व्यावसायिक और लोक कल्याणकारी चरित्र पर महत्वपूर्ण सिद्धांत स्थापित किए हैं। विभिन्न राज्यों में शुल्क नियंत्रण और कैपिटेशन फीस पर रोक से संबंधित कानून भी बनाए गए हैं। फिर भी चुनौती यह है कि कानूनों और नियमों की संख्या बढ़ाने मात्र से शिक्षा की गुणवत्ता नहीं सुधरती;वास्तविक परिवर्तन तब आता है जब नियमों का निष्पक्ष, पारदर्शी और समान रूप से क्रियान्वयन हो।
साथियों, आज शिक्षा व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह है कि कुछ स्थानों पर शिक्षक के पद की गरिमा और पेशेवर अनुशासन के बीच गंभीर अंतर दिखाई देता है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि ऐसे मामले पूरे शिक्षक समुदाय का प्रतिनिधित्व नहीं करते।भारत में लाखों शिक्षक अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी ईमानदारी, समर्पण और संवेदनशीलता के साथ बच्चों का भविष्य गढ़ रहे हैं। लेकिन कुछ शिक्षकों के कथित दुराचरण की घटनाएँ इसलिए अधिक गंभीर हो जाती हैं क्योंकि बच्चों के लिए शिक्षक स्वयं एक जीवंत उदाहरण होता है। यदि कोई शिक्षक विद्यालय में नशे की हालत में आता है,परिसर में तंबाकू या अन्य नशीले पदार्थों का सेवन करता है अथवा विद्यार्थियों के सामने अनुशासनहीन व्यवहार करता है, तो वह केवल सेवा नियम का उल्लंघन नहीं करता, बल्कि बच्चों के सामने गलत सामाजिक संदेश भी स्थापित करता है। इसी प्रकार समय पर विद्यालय न पहुँचना, निर्धारित समय से पहले चले जाना, शिक्षण कार्य के प्रति उदासीनता या केवल कागजी खानापूर्ति करना शिक्षा के मूल उद्देश्य को कमजोर करता है। ऐसी प्रवृत्तियों के विरुद्ध कार्रवाई किसी व्यक्ति को अपमानित करने के लिए नहीं, बल्कि विद्यालय और विद्यार्थियों के अधिकारों की रक्षा के लिए आवश्यक है।
साथियों, सबसे गंभीर आरोपों में से एक ‘प्रॉक्सी शिक्षक’ की अवधारणा है,अर्थात नियुक्त शिक्षक का स्वयं विद्यालय में उपस्थित होने के बजाय किसी अन्य व्यक्ति, रिश्तेदार या कम वेतन वाले व्यक्ति से अपना कार्य करवाना। यदि किसी मामले में यह आरोप प्रमाणित होता है,तो यहकेवल अनुशासनहीनता नहीं बल्कि प्रशासनिक, वित्तीय और नैतिक गंभीरता वाला विषय बन जाता है। सरकारी वेतन सार्वजनिक धन से दिया जाता है और उसके बदले शिक्षक से निर्धारित सेवा की अपेक्षा की जाती है। इसलिए किसी अन्य व्यक्ति से अपनी जगह काम करवाना विद्यार्थियों के शिक्षा- अधिकार के साथ-साथ सार्वजनिक संसाधनों के प्रति भी गंभीर जवाबदेही का प्रश्न उठाता है। ऐसे मामलों में विभागीय जांच, सेवा नियमों के तहत दंड और परिस्थितियों के अनुसार आपराधिक कार्रवाई की संभावना को कानूनसम्मत प्रक्रिया के माध्यम से देखा जाना चाहिए। इसी तरह निजी ट्यूशन, विद्यालयी जिम्मेदारियों की उपेक्षा,स्थानीय राजनीति में अत्यधिक संलिप्तता या कक्षा में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण से बचने की प्रवृत्ति भी शिक्षा की मूल भावना को प्रभावित कर सकती है।
साथियों,हालाँकि, समस्या का समाधान केवल कठोर दंड में नहीं है। शिक्षक जवाबदेही और शिक्षक सम्मान,दोनों एक साथ चलने चाहिए। एक ऐसी व्यवस्था आवश्यक है जिसमें ईमानदार और उत्कृष्ट शिक्षक को सम्मान, प्रशिक्षण पदोन्नति और प्रोत्साहन मिले, जबकि प्रमाणित गंभीर कदाचार पर किसी भी स्तर पर संरक्षण न दिया जाए। प्रशासनिक व्यवस्था में सबसे बड़ी कमजोरी अक्सर नियमों की अनुपस्थिति नहीं,बल्कि उनके असमान या कमजोर क्रियान्वयन की होती है। दूरदराज के क्षेत्रों में निरीक्षण की कमी, शिकायतों के निस्तारण में देरी,स्थानीय प्रभाव,प्रशासनिक उदासीनता या किसी भी प्रकार का अनुचित दबाव जवाबदेही की पूरी व्यवस्था को कमजोर कर सकता है। इसलिए शिकायत प्रणाली को स्वतंत्र, समयबद्ध और डिजिटल बनाया जाना चाहिए। किसी शिक्षक के विरुद्ध शिकायत को स्वतः दोष सिद्धि नहीं माना जाना चाहिए; लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष जांच न होना भी उतना ही गंभीर प्रशासनिक दोष है।
साथियों, डिजिटल युग इस चुनौती का एक महत्वपूर्ण समाधान भी प्रस्तुत करता है। बायोमेट्रिक उपस्थिति, स्थान- आधारित उपस्थिति, फेशियल रिकग्निशन,विद्यालयनिरीक्षण के डिजिटल रिकॉर्ड, ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और वास्तविक समय में निगरानी जैसी तकनीकें उपस्थिति तथा प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ाने में सहायक हो सकती हैं। कुछ राज्यों में डिजिटल और चेहरे की पहचान आधारित उपस्थिति जैसी व्यवस्थाओं के प्रयोग की दिशा में कदम उठाए गए हैं। लेकिन तकनीक को दंडात्मक निगरानी तक सीमित नहीं किया जाना चाहिए। उसका उद्देश्य शिक्षक को संदेह की दृष्टि से देखना नहीं, बल्कि विद्यालयी व्यवस्था में पारदर्शिता, नियमितता और जवाबदेही सुनिश्चित करना होना चाहिए। साथ ही ग्रामीण और दूरदराज क्षेत्रों में इंटरनेट, बिजली और तकनीकी सुविधाओं की सीमाओं को ध्यान में रखकर वैकल्पिक व्यवस्थाएँ भी रखनी होंगी।
साथियों, भारत को इस विषय पर अंतरराष्ट्रीय अनुभवों से भी सीखने की आवश्यकता है। यूनेस्को और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा शिक्षकों की स्थिति और पेशेवर मानकों से संबंधित अंतरराष्ट्रीय सिफारिशें इस बात पर बल देती हैं कि शिक्षक की गुणवत्ता केवल शैक्षणिक योग्यता से निर्धारित नहीं होती;उसके पेशेवर अधिकार, कार्य परिस्थितियाँ सामाजिक सम्मान और जिम्मेदारियाँ भी उतनी ही महत्वपूर्ण हैं।दुनिया के विभिन्न देशों में शिक्षक पेशे के लिए स्पष्ट पेशेवर मानक और आचार संबंधी अपेक्षाएँ निर्धारित की गई हैं। भारत को इन वैश्विक अनुभवों का यांत्रिक अनुकरण करने के बजाय अपनी संवैधानिक संरचना, विविध सामाजिक परिस्थितियों और संघीय व्यवस्था के अनुरूप एक प्रभावी राष्ट्रीय शिक्षक जवाबदेही ढाँचा विकसित करना चाहिए।
साथियों,ऐसा ढाँचा चार प्रमुख स्तंभों पर आधारित हो सकता है,पहला,स्पष्ट और समान पेशेवर आचार संहिता; दूसरा, पारदर्शी एवं तकनीक-सक्षम उपस्थिति और निरीक्षण व्यवस्था;तीसरा,शिकायतों की स्वतंत्र और समयबद्ध जांच; और चौथा,उत्कृष्ट शिक्षकों को सम्मान एवं प्रोत्साहन। राष्ट्रीय अध्यापक शिक्षा परिषद द्वारा विकसित पेशेवर नैतिकता संबंधी दिशा-निर्देशों, शिक्षा कानूनों तथा राज्यों की सेवा आचरण नियमावलियों को एक-दूसरे से बेहतर तरीके से जोड़कर ऐसा ढाँचा तैयार किया जा सकता है।आवश्यकता नए कानूनों की भी हो सकती है, लेकिन उससे पहले मौजूदा नियमों के प्रभावी क्रियान्वयन की व्यापक समीक्षा जरूरी है। किसी शिक्षक पर आरोप लगना और आरोप सिद्ध होना दो अलग बातें हैं; इसलिए जवाबदेही की व्यवस्था कठोर होने के साथ न्यायसंगत और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के अनुरूप भी सटीकता से होनी चाहिए।
अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि शिक्षक दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही होना चाहिए कि शिक्षक का सम्मान और शिक्षक की जवाबदेही एक-दूसरे के विरोधी नहीं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं।समाज को अपने शिक्षकों का सम्मान करना चाहिए,सरकार को उन्हें बेहतर कार्य वातावरण और संसाधन देने चाहिए और शिक्षक समुदाय को भी अपने पेशे की असाधारण जिम्मेदारी को समझना चाहिए। जिस प्रकार एक चिकित्सक की गलती किसी व्यक्ति के जीवन को प्रभावित कर सकती है,उसी प्रकार शिक्षक की निरंतर उपेक्षा एक पूरी पीढ़ी की सोच, क्षमता और चरित्र को प्रभावित कर सकती है। इसलिए 5 सितंबर को केवल फूलों और शुभकामनाओं का दिन न बनाकर शिक्षा की आत्मा को पुनर्जीवित करने का संकल्प दिवस बनाना होगा। हमें ऐसा भारत बनाना होगा जहाँ शिक्षक आर्थिक या प्रशासनिक दबाव से नहीं, बल्कि अपने ज्ञान, चरित्र और कर्म की शक्ति से सम्मानित हो;जहाँ गलत आचरण पर संरक्षण नहीं बल्कि निष्पक्ष कार्रवाई हो; और जहाँ तकनीक आधुनिक हो, लेकिन शिक्षा की आत्मा मानवीय और नैतिक बनी रहे। यही डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की विरासत के प्रति वास्तविक श्रद्धांजलि और भारत की आने वाली पीढ़ियों के प्रति हमारी सबसे बड़ी जिम्मेदारी होगी।





