दिलीप कुमार पाठक
आजकल हम जब भी कपड़े खरीदने की सोचते हैं, तो सीधे बड़े-बड़े मॉल या नामी ब्रांड्स के शोरूम की तरफ भागते हैं। लेकिन इस चकाचौंध में हम अपने ही देश के गाँवों में रची उस जादुई कला को भूल जाते हैं, जो सिर्फ हाथों के हुनर से कोरे धागों में जान फूंक देती है। हर साल सात अगस्त को मनाया जाने वाला ‘राष्ट्रीय हथकरघा दिवस’ कोई सरकारी रस्म नहीं है। यह दिन हमारे देश के उन लाखों बुनकरों के टैलेंट और मेहनत को सलाम करने का मौका है, जो सदियों से भारत को अपनी कला से सजा रहे हैं। इस दिन का हमारी आज़ादी की लड़ाई से बहुत गहरा नाता है। जब अंग्रेजों ने हमारे देश को बांटने की कोशिश की, तो सात अगस्त के दिन ही कोलकाता से ‘स्वदेशी आंदोलन’ की शुरुआत हुई थी। उस समय विदेशी कपड़ों को जलाकर अपने देश के हाथ से बने कपड़ों को अपनाना अंग्रेजों के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बना था। इसी ऐतिहासिक दिन को याद रखने के लिए सरकार ने करीब एक दशक पहले इस दिवस को मनाने का फैसला किया। तब से यह दिन सिर्फ इतिहास को याद करने का नहीं, बल्कि अपने गाँव की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का जरिया बन गया है।
अगर देश की तरक्की की बात करें, तो यह हथकरघा उद्योग आज भी हमारे गाँवों की असली रीढ़ है। कपड़ा मंत्रालय का रिकॉर्ड बताता है कि खेती के बाद सबसे ज्यादा परिवारों का चूल्हा इसी काम से जलता है। इस काम की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें काम करने वाले कुल लोगों में तीन-चौथाई से भी ज़्यादा महिलाएं हैं। इसका सीधा सा मतलब यह है कि जब आप खादी या हाथ से बुना हुआ कोई भी कपड़ा खरीदते हैं, तो आपकी जेब से निकला पैसा सीधे किसी सुदूर गाँव में बैठी महिला को आत्मनिर्भर बनाता है। आज पूरी दुनिया में भारतीय हथकरघा अपनी पहिचान बना रहा है।
हाल के बरसों के सरकारी आंकड़ों को देखें तो हस्तशिल्प और हथकरघा उत्पादों के विदेशों में बिकने की रफ्तार लगातार बढ़ रही है। आज दुनिया भर में लोग ऐसे कपड़ों की मांग कर रहे हैं जो पर्यावरण को नुकसान न पहुँचाएँ और हमारा हथकरघा इस मामले में सौ फीसदी खरा है। इसे बनाने में न तो बिजली का बड़ा बिल आता है और न ही कैमिकल का इस्तेमाल होता है। यही वजह है कि अमेरिका, दुबई और यूरोप के बड़े बाज़ारों में बनारसी सिल्क, भागलपुरी चादर, तेलंगाना की इकत या ओडिशा की संबलपुरी साड़ी की जबरदस्त मांग है। लेकिन इस चमक के पीछे बुनकरों का एक दर्द भी समाहित है। आज मशीनों से धड़ाधड़ बनने वाले सस्ते कपड़ों की वजह से हाथ के कारीगरों को सही दाम और पहचान के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है। बाजार में मशीनी कपड़ों को असली हथकरघा बताकर बेच दिया जाता है, जिससे बुनकरों का हक मारा जाता है। इस धोखेबाज़ी को रोकने के लिए सरकार ने असली कपड़ों की पहचान के लिए ‘हैंडलूम मार्क’ और ‘जीआई टैग’ जैसी व्यवस्था की है। साथ ही ‘इंडिया हैंडमेड’ जैसी वेबसाइट्स के जरिए बुनकरों को सीधे ग्राहकों से जोड़ा जा रहा है ताकि बीच के दलाल उनकी कमाई न खा सकें। हालांकि हथकरघा से जुड़े लोगों का फ़ायदा केवल सोशल मीडिया पर वाह – वाह करने से नहीं होगा। असली बदलाव तब आएगा जब हम अपनी सोच बदलेंगे। हमें अपनी शादियों, त्योहारों और रोजमर्रा के पहनावे में इन कपड़ों को जगह देनी होगी। जब हमारी युवा पीढ़ी गर्व से हैंडलूम पहनेगी, तभी यह सदियों पुरानी कला बची रहेगी। हम सभी को संकल्प लेना चाहिए, कि अपनी अलमारी में कम से कम एक जोड़ी कपड़ा हाथ से बुना हुआ ज़रूर रखेंगे। इन धागों को बचाना सिर्फ सरकार का काम नहीं, हम सबकी जिम्मेदारी है।





