खराब डेटा गुणवत्ता से भारत के कल्याणकारी बजट का 4-7% हिस्सा बर्बाद, AI की योजनाओं पर भी खतरा: TBI रिपोर्ट

4-7% of India's welfare budget wasted due to poor data quality, AI plans also at risk: TBI report

रविवार दिल्ली नेटवर्क

नई दिल्ली: भारत में 1.4 अरब से ज्यादा लोगों का आधार नामांकन हो चुका है और यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (UPI) हर महीने 20 अरब से ज्यादा लेनदेन करता है। दुनिया भर में होने वाले रियल-टाइम पेमेंट में इसकी अनुमानित हिस्सेदारी 49% है। टोनी ब्लेयर इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज (TBI) की आज जारी एक नई स्टडी में बताया गया है कि सरकारी सिस्टम में इस्तेमाल होने वाला डेटा अब भी अलग-अलग विभागों और राज्यों में बंटा हुआ है। इससे भारत के डिजिटल विकास और डेटा की मदद से सही फैसले लेने, बेहतर नीतियां बनाने और सरकारी सेवाओं को लोगों तक प्रभावी तरीके से पहुंचाने के बीच अंतर बना हुआ है।

देश में डेटा की मौजूदा स्थिति का जिक्र करते हुए रिपोर्ट में कहा गया है, “भारतीय राज्य हर दिन बड़ी मात्रा में सरकारी डेटा तैयार करते हैं। इसमें लाभार्थियों की सूची, स्वास्थ्य रिकॉर्ड, जमीन के रिकॉर्ड, स्कूलों में नामांकन और टैक्स से जुड़ी जानकारी शामिल है। हालांकि, यह डेटा एक विभाग की रिपोर्टिंग की जरूरत पूरी करने के लिए इकट्ठा किया जाता है, न कि उन बड़े सवालों के जवाब देने के लिए जो नीतियां बनाने में मदद करते हैं।”

रिपोर्ट के अनुसार, भारत के सामने अगली चुनौती और ज्यादा डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने के बजाय सरकारी डेटा के बिखरे हुए हिस्सों को जोड़ना है। यह AI के सही इस्तेमाल की बुनियाद भी है। इसके लिए रिपोर्ट में सात सुझावों के जरिए एक योजना बताई गई है।

“From Digital Scale to Data Power: A Data Operating Model for India’s States” नाम की यह रिपोर्ट कहती है कि सरकारी डेटा की समस्या केवल प्रशासन से जुड़ी परेशानी नहीं है, बल्कि इससे सरकारी सेवाएं भी प्रभावित होती हैं। इसके कारण सरकारी खर्च में गड़बड़ी, कल्याणकारी योजनाओं से जरूरतमंद लोगों का छूट जाना और जनता का भरोसा कम होना जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। अगर इन समस्याओं को पहले दूर नहीं किया गया, तो भारत की AI से जुड़ी योजनाओं पर भी असर पड़ेगा।

रिपोर्ट में नीति आयोग के 2025 के आकलन का हवाला देते हुए कहा गया है कि खराब गुणवत्ता वाले डेटा के कारण भारत के सालाना कल्याणकारी योजनाओं के खर्च का अनुमानित 4 से 7 प्रतिशत हिस्सा बर्बाद होता है। पहले किए गए सुधारों से भी इस समस्या का पता चलता है। PM-KISAN किसान सहायता योजना से 17.1 मिलियन अपात्र नाम हटाने से अनुमानित ₹90 बिलियन की बचत हुई। 35 मिलियन फर्जी LPG कनेक्शन हटाने से दो साल में ₹210 बिलियन की बचत हुई। वहीं, 16 मिलियन फर्जी राशन कार्ड हटाने से हर साल लगभग ₹100 बिलियन की बचत हो रही है।

यह रिपोर्ट भारत में डेटा को एक समान बनाने और डेटा के आधार पर बेहतर शासन व्यवस्था बनाने के मौजूदा प्रयासों को आगे बढ़ाती है। इन प्रयासों का नेतृत्व सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) कर रहा है। रिपोर्ट में केंद्र सरकार की प्रमुख पहलों का विश्लेषण किया गया है। इनमें NMDS 2.0, SQAF, AI-Readiness Framework, QPR Portal और Model Data Sharing Framework शामिल हैं।

रिपोर्ट में राज्यों के स्तर पर चल रही योजनाओं का भी जिक्र है। इनमें कर्नाटक की कुटुंबा सोशल रजिस्ट्री, ओडिशा का सोशल प्रोटेक्शन डिलीवरी प्लेटफॉर्म और राजस्थान का पहचान पोर्टल शामिल हैं। इसके अलावा आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और तेलंगाना में चल रही पहलों को भी शामिल किया गया है।

टोनी ब्लेयर इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज के कंट्री डायरेक्टर और रिपोर्ट के सह-लेखक विवेक अग्रवाल ने कहा, “हम अक्सर बात करते हैं कि AI सरकार के लिए क्या कर सकता है। लेकिन यह रिपोर्ट पहले एक बुनियादी सवाल पूछती है: क्या डेटा इतना सही और भरोसेमंद है कि AI सिस्टम या कोई सरकारी अधिकारी उसके आधार पर कार्रवाई कर सके? फिलहाल, ज्यादातर राज्यों में इसका जवाब है—अभी नहीं। इसका मतलब यह नहीं है कि AI पर काम धीमा कर दिया जाए, बल्कि यह है कि पहले किन चीजों पर ध्यान देना चाहिए, यह सोच-समझकर तय किया जाए। जो राज्य इस बुनियाद को मजबूत करेंगे, वे न केवल AI के इस्तेमाल के लिए तैयार होंगे, बल्कि बेहतर फैसले ले सकेंगे, नागरिकों को तेजी से सेवाएं दे सकेंगे और समस्याओं को बड़ा होने से पहले पहचान सकेंगे।”

रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत का डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर लगभग किसी भी दूसरे देश की तुलना में तेजी से और बड़े स्तर पर विकसित हुआ है। आधार ने 24.5 बिलियन से ज्यादा ई-KYC लेनदेन में मदद की है और औपचारिक बैंकिंग सेवाओं की पहुंच को 2008 में लगभग 25% से बढ़ाकर 2023 तक 80% से ज्यादा करने में योगदान दिया है। वहीं, डिजिलॉकर ने 685 मिलियन से ज्यादा नागरिकों के लिए लगभग 10 बिलियन दस्तावेज जारी और सत्यापित किए हैं।

हालांकि, रिपोर्ट कहती है कि इन उपलब्धियों का मतलब यह नहीं है कि अलग-अलग विभागों और सरकारी स्तरों के बीच डेटा का आसानी से इस्तेमाल किया जा सकता है। इस समस्या को दूर किए बिना AI का इस्तेमाल करने से मौजूदा कमियां दूर होने के बजाय और बढ़ सकती हैं।

एस्टोनिया के पूर्व सरकारी मुख्य डेटा अधिकारी और रिपोर्ट के सह-लेखक ओट वेल्सबर्ग ने कहा, “भारत की पहली डिजिटल उपलब्धि बड़े स्तर पर सेवाएं पहुंचाने की क्षमता रही है। भारत ने साबित किया कि पहचान, भुगतान और सरकारी सिस्टम को करोड़ों लोगों तक भरोसेमंद तरीके से और तेजी से पहुंचाया जा सकता है। अब अगली चुनौती अलग है। यह इस बात पर निर्भर करती है कि डेटा पर भरोसा किया जा सकता है या नहीं, उसे आपस में जोड़ा जा सकता है या नहीं और बेहतर नतीजों के लिए उसका इस्तेमाल किया जा सकता है या नहीं। रिपोर्ट के अनुसार, भारत ने अभी तक इस क्षमता को अपने डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर जितनी मजबूती और एकरूपता के साथ विकसित नहीं किया है।”

इस समस्या को दूर करने के लिए TBI ने राज्यों के लिए सात सुझाव दिए हैं। ये सुझाव राज्य में डेटा के सही इस्तेमाल और प्रबंधन की व्यवस्था बनाने पर आधारित हैं। इनमें नेतृत्व और जिम्मेदारी तय करना, डेटा का मालिकाना हक और उसकी देखरेख, एक समान मानक बनाना, डेटा साझा करने की सुविधाएं तैयार करना, डेटा की गुणवत्ता की स्वतंत्र जांच, कानूनी और खरीद से जुड़े सुरक्षा उपाय तथा एक State Data Balance Sheet बनाना शामिल है। इससे सरकारी अधिकारी वित्तीय संसाधनों की तरह डेटा से जुड़ी संपत्तियों और जोखिमों का भी प्रबंधन कर सकेंगे।

रिपोर्ट के अनुसार, जो राज्य इस व्यवस्था को सही तरीके से लागू करेंगे, वे केवल बेहतर डैशबोर्ड ही नहीं बना पाएंगे। वे समस्याओं को समय रहते पहचान सकेंगे, जहां वास्तव में जरूरत है वहां संसाधनों का सही इस्तेमाल कर सकेंगे और सरकार द्वारा जारी आंकड़ों पर जनता का भरोसा बढ़ा सकेंगे। भारत में सरकारी कामकाज में AI का इस्तेमाल बढ़ने के साथ, यह बुनियाद तय करेगी कि तकनीक सरकारी सेवाओं को बेहतर बनाएगी या मौजूदा कमियों को और तेजी से बढ़ा देगी।

टोनी ब्लेयर इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज के बारे में
टोनी ब्लेयर इंस्टीट्यूट फॉर ग्लोबल चेंज एक गैर-लाभकारी संगठन है, जो 40 से ज्यादा देशों में राजनीतिक नेताओं और सरकारों के साथ काम करता है। यह डेटा, तकनीक और AI की मदद से शासन व्यवस्था को बेहतर बनाने सहित कई बड़ी वैश्विक चुनौतियों पर नीतिगत सलाह देता है।

लंदन में मुख्यालय वाला यह संस्थान राजनीति, नीतियों और तकनीक से जुड़ी विशेषज्ञता को एक साथ लाकर सरकारों और नेताओं को अधिक प्रभावी और नागरिकों पर केंद्रित व्यवस्था बनाने में मदद करता है। भारत में TBI डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, डेटा गवर्नेंस, AI और शिक्षा, ऊर्जा, पर्यटन सहित अन्य क्षेत्रों में सरकारी सेवाओं को बेहतर बनाने के लिए सरकारों के साथ काम कर रहा है।

हाल ही में शुरू की गई अपनी वैश्विक पहल CentreAI के तहत, यह संस्थान इस दिशा में काम कर रहा है कि AI मौजूदा सरकारी प्रक्रियाओं को कैसे बदल सकता है। इसके साथ ही, यह इस बात पर नए सिरे से विचार करने का अवसर भी देता है कि सरकार कैसे काम करती है, समस्याओं को कैसे समझती है, अलग-अलग संस्थानों के बीच तालमेल कैसे बनाती है और लोगों तक सेवाएं कैसे पहुंचाती है। इसमें राजनीतिक फैसले लेने की जिम्मेदारी इंसानों के पास ही बनी रहती है।