अशोक भाटिया
उत्तर प्रदेश की राजनीति का एक शाश्वत नियम रहा है—यहाँ दिल्ली का रास्ता तो तय होता है, लेकिन प्रांतीय स्वाभिमान और क्षेत्रीय क्षत्रपों की महत्वाकांक्षाओं के टकराव में बड़े-से-बड़े राष्ट्रीय एजेंडे भी ध्वस्त हो जाते हैं। वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में जब समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के गठबंधन ने देश के सबसे बड़े राज्य में राजनीतिक चमत्कार करते हुए भारतीय जनता पार्टी के ‘अजेय रथ’ की रफ्तार पर ब्रेक लगाया, तो देश भर के विपक्षी रणनीतिकारों को लगा कि उन्होंने भाजपा की चुनावी मशीनरी की अचूक काट ढूंढ ली है। राहुल गांधी और अखिलेश यादव की जोड़ी, जिसे ‘यूपी के दो लड़के’ कहकर प्रचारित किया गया, ने पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक के एक नए सामाजिक समीकरण को जन्म दिया। इस समीकरण को जनता का भारी समर्थन मिला और गठबंधन ने राज्य की 80 में से 43 सीटों पर ऐतिहासिक विजय पताका फहराई। परंतु, राजनीति में जीत जितनी सुखद होती है, उसकी विरासत को संभालना और आगामी संघर्षों के लिए उसे अक्षुण्ण रखना उतना ही दुरूह कार्य होता है। आज, 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही, इस सफल गठबंधन की नींव हिलती हुई साफ दिखाई दे रही है। लखनऊ से लेकर दिल्ली के गलियारों तक यह चर्चा आम है कि उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच ‘सब कुछ ठीक नहीं है’। यह दरार अब केवल बंद कमरों की बैठकों तक सीमित नहीं है, बल्कि जमीनी स्तर पर सार्वजनिक मंचों से लेकर सोशल मीडिया के अखाड़े तक खुलकर सामने आ रही है।
इस गहरे अविश्वास, जमीनी अंतर्विरोध और दोनों दलों के बीच जारी वर्चस्व की जंग का सबसे ताजा, ज्वलंत और चिंताजनक उदाहरण हाल ही में सहारनपुर में आयोजित ‘दिशा’ (DISHA) की आधिकारिक बैठक के दौरान देखने को मिला। जिला स्तर पर विकास कार्यों, प्रशासनिक तालमेल और स्थानीय जनसमस्याओं (विशेषकर एक नाले के निर्माण और विकास कार्यों की अनदेखी) की समीक्षा के लिए बुलाई गई इस उच्च स्तरीय बैठक में जो कुछ हुआ, उसने उत्तर प्रदेश में विपक्षी गठबंधन के भविष्य पर एक बहुत बड़ा यक्ष प्रश्न खड़ा कर दिया है। बैठक के दौरान कांग्रेस के कद्दावर सांसद इमरान मसूद और समाजवादी पार्टी के स्थानीय विधायक आशु मलिक के बीच तीखी बहस शुरू हो गई। देखते ही देखते यह बहस विकास कार्यों के दायरे को लांघकर व्यक्तिगत आक्षेपों, सांगठनिक श्रेष्ठता की जंग और “तू-तू मैं-मैं” के अमर्यादित स्तर पर पहुंच गई। दोनों नेताओं के बीच करीब सात से आठ मिनट तक चली इस तीखी जुबानी जंग का वीडियो कैमरे में कैद हो गया और सोशल मीडिया पर जंगल की आग की तरह वायरल हो गया।
यद्यपि, राजनीति के तयशुदा व्याकरण के अनुसार, घटना के अगले ही दिन दोनों नेताओं और दोनों पार्टियों के प्रवक्ताओं ने भारी डैमेज कंट्रोल की कोशिशें शुरू कर दीं। यह बयान जारी किए गए कि “यह महज जनप्रतिनिधियों के बीच स्थानीय विकास कार्यों को लेकर हुई एक सामान्य प्रशासनिक बहस थी और इसे राजनीतिक गठबंधन के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।” लेकिन राजनीतिक विश्लेषक और जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ता अच्छी तरह जानते हैं कि सियासत में इस तरह के सार्वजनिक और तीखे टकराव कभी भी महज प्रशासनिक मतभेद नहीं होते। यह वाकया उस ज्वालामुखी का एक छोटा सा विस्फोट है जो पिछले कई महीनों से दोनों पार्टियों के प्रांतीय नेताओं और कार्यकर्ताओं के दिलों में सुलग रहा था। यह साफ तौर पर दर्शाता है कि लोकसभा चुनाव में शीर्ष स्तर पर जो सामंजस्य और आपसी समझ दिखाई दे रही थी, वह जमीन पर जिला, ब्लॉक और बूथ स्तर तक कभी पहुंची ही नहीं। सहारनपुर की यह घटना इस बात का प्रामाणिक दस्तावेज़ है कि दोनों दलों के नेता एक-दूसरे को सहयोगी कम और अपनी राजनीतिक जमीन का अतिक्रमण करने वाला प्रतिद्वंद्वी ज्यादा मान रहे हैं।
इस रार और अविश्वास की जड़ें केवल स्थानीय मुद्दों या किसी नाले के निर्माण तक सीमित नहीं हैं। इसकी असली वजह 2027 की चुनावी बिसात पर अपनी-अपनी ताकत दिखाने और भविष्य की सरकार में अपनी हिस्सेदारी तय करने की एक सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। 2024 की सफलता के बाद उत्तर प्रदेश कांग्रेस के भीतर एक नए आत्मविश्वास का संचार हुआ है। पार्टी के रणनीतिकार, नए सांगठनिक प्रभारी और प्रांतीय नेता अब राज्य में खुद को समाजवादी पार्टी के ‘जूनियर पार्टनर’ या ‘पिछलग्गू’ के रूप में देखने को कतई तैयार नहीं हैं। कांग्रेस के भीतर से लगातार यह मांग उठ रही है और सार्वजनिक मंचों से यह बयान दिए जा रहे हैं कि पार्टी आगामी विधानसभा चुनाव में सम्मानजनक और बराबरी की हिस्सेदारी से कम पर कोई समझौता नहीं करेगी। पार्टी के भीतर एक बड़ा धड़ा साफ तौर पर कम से कम 150 सीटों पर अपनी मजबूत दावेदारी ठोक रहा है। कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की राष्ट्रीय स्तर पर हुई वापसी, राहुल गांधी की ‘भारत जोड़ो यात्रा’ और उनके द्वारा तैयार किए गए नैरेटिव के बिना उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को अकेले दम पर 37 सीटें मिलना किसी भी सूरत में संभव नहीं था। कांग्रेस का मानना है कि मुस्लिम और दलित मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा राहुल गांधी के चेहरे और कांग्रेस की धर्मनिरपेक्ष साख को देखकर इस गठबंधन की ओर आकर्षित हुआ था। इसलिए, विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को उसका वाजिब हक मिलना ही चाहिए, क्योंकि उनके बिना राज्य में भाजपा-विरोधी कोई भी सरकार नहीं बन सकती।
इसके विपरीत, समाजवादी पार्टी खुद को उत्तर प्रदेश में भाजपा-विरोधी और धर्मनिरपेक्ष राजनीति का ‘बड़ा भाई’ और एकमात्र वास्तविक विकल्प मानती है। अखिलेश यादव और उनके रणनीतिकारों का स्पष्ट मानना है कि उत्तर प्रदेश की जमीन पर वास्तविक संगठन, समर्पित कैडर, बूथ मैनेजमेंट और सांगठनिक मशीनरी केवल और केवल समाजवादी पार्टी के पास है। कांग्रेस का सांगठनिक ढांचा आज भी राज्य के अधिकांश जिलों में ब्लॉक और बूथ स्तर पर बेहद कमजोर, निष्क्रिय या लगभग गायब है। ऐसे में, सपा नेतृत्व कांग्रेस को 60 से 70 से अधिक सीटें देने के मूड में नहीं है। समाजवादी पार्टी के भीतर एक बहुत बड़ा और मुखर धड़ा यह मानता है कि कांग्रेस को उसकी सांगठनिक क्षमता से अधिक सीटें देने का सीधा मतलब भारतीय जनता पार्टी को ‘वॉकओवर’ देना होगा। सपा नेता पिछले विधानसभा चुनावों (विशेषकर 2017 के सपा-कांग्रेस गठबंधन) के कड़वे अनुभवों का हवाला देते हैं, जहां कांग्रेस को 100 से अधिक सीटें दी गई थीं, लेकिन उसका स्ट्राइक रेट बेहद निराशाजनक रहा था और गठबंधन औंधे मुंह गिर गया था। सपा के रणनीतिकार इस बात को लेकर भी अत्यधिक सतर्क हैं कि राष्ट्रीय राजनीति में मजबूती पाने की आड़ में कहीं कांग्रेस उनके पारंपरिक और कोर वोट बैंक (मुस्लिम और यादव) में एक स्थायी सेंधमारी न कर दे।
वोटो के इस आंतरिक ध्रुवीकरण और वर्चस्व की मूक जंग में सबसे बड़ा पेंच मुस्लिम और दलित मतदाताओं की भविष्य की प्राथमिकताओं को लेकर फंसा हुआ है। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस वर्ग ने बिना किसी दुविधा के, बेहद समझदारी से भाजपा को हराने के लिए एकमुश्त इस गठबंधन के पक्ष में मतदान किया था। परंतु अब, कांग्रेस को यह साफ दिखाई दे रहा है कि अल्पसंख्यक समुदाय और गैर-जाटव दलित मतदाता दोबारा अपने पुराने और पारंपरिक घर यानी कांग्रेस की तरफ आकर्षित हो रहे हैं। कांग्रेस उत्तर प्रदेश में इसी मुस्लिम-दलित-सवर्ण गठजोड़ के पुराने फॉर्मूले को पुनर्जीवित कर अपने खोए हुए राजनीतिक साम्राज्य को बहाल करना चाहती है। इसके उलट, समाजवादी पार्टी अपने इस मुख्य आधार—जिसके दम पर वह राज्य की मुख्य विपक्षी पार्टी बनी हुई है—को किसी भी कीमत पर अपने हाथ से खिसकने नहीं देना चाहती। सपा को डर है कि यदि मुस्लिम मतदाता पूरी तरह से कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो गया, तो उसका क्षेत्रीय क्षत्रप और राज्य की राजनीति का मुख्य ध्रुव होने का दर्जा हमेशा के लिए खतरे में पड़ जाएगा। सहारनपुर की घटना और उसके बाद इमरान मसूद जैसे नेताओं के तीखे बयान इसी वोट बैंक पर अपने-अपने प्रभाव को साबित करने की एक अघोषित और आक्रामक जंग का हिस्सा हैं।
यह बात को प्रमुखता से रेखांकित होती है कि शीर्ष स्तर पर राहुल गांधी और अखिलेश यादव की आपसी केमिस्ट्री चाहे जितनी भी मजबूत, सौहार्दपूर्ण और परिपक्व दिखाई दे, जमीन पर व्यावहारिक राजनीति केवल व्यक्तिगत दोस्ती या मुस्कुराती हुई तस्वीरों से संचालित नहीं होती। व्यावहारिक राजनीति हमेशा कार्यकर्ताओं की महत्वाकांक्षाओं, स्थानीय नेताओं के अस्तित्व के संकट और क्षेत्रीय सामाजिक समीकरणों से संचालित होती है। शीर्ष स्तर के नेता भले ही दिल्ली या लखनऊ में बैठकर बंद कमरों में कोई समझौता कर लें, लेकिन जब तक बूथ स्तर पर दोनों पार्टियों के कार्यकर्ताओं का दिल नहीं मिलेगा और वोटों का ट्रांसफर पूरी ईमानदारी के साथ एक-दूसरे के पक्ष में नहीं होगा, तब तक किसी भी गठबंधन की सफलता केवल एक किताबी कल्पना ही रहेगी।





