चेहरा ओझल, आवाज़ बुलंद: शेख हसीना की वापसी और दक्षिण एशिया के लोकतंत्र की नई परीक्षा

Face out of sight, voice resounding: Sheikh Hasina's return and a new test for democracy in South Asia

एन जी भट्ट

लगभग दो वर्षों के लंबे अंतराल के बाद जब बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना की आवाज़ दुनिया तक पहुँची, तो सबसे अधिक चर्चा उनके शब्दों की नहीं, बल्कि उनकी अनुपस्थिति की हुई। भाषण प्रसारित हुआ, पर चेहरा दिखाई नहीं दिया। यह दृश्य अपने आप में एक राजनीतिक प्रतीक बन गया। कभी बांग्लादेश की सबसे प्रभावशाली नेता रहीं शेख हसीना अब निर्वासन के जीवन से अपने समर्थकों को संबोधित कर रही हैं और उन्होंने आगामी दिसंबर में स्वदेश लौटने की घोषणा कर दी हैं। यह केवल एक नेता की वापसी का संकेत नहीं, बल्कि पूरे दक्षिण एशिया में लोकतंत्र, न्याय और राजनीतिक सहिष्णुता की नई परीक्षा का आरंभ है।

2024 में बांग्लादेश में हुए नाटकीय राजनीतिक घटनाक्रम के बाद शेख हसीना भारत आ गई थीं। तब से वे सार्वजनिक रूप से लगभग मौन थीं। ऐसे में लगभग दो वर्ष बाद उनका संदेश सामने आना स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि वे दिसंबर में बांग्लादेश लौटेंगी, न्यायिक प्रक्रिया का सामना करेंगी और जनता के बीच फिर खड़ी होंगी। उनके इस वक्तव्य ने बांग्लादेश की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है।

इस पूरे घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पक्ष भारत का रुख भी है। बांग्लादेश की अंतरिम सरकार की ओर से समय-समय पर यह अपेक्षा व्यक्त की गई कि भारत अपनी भूमि से शेख हसीना के राजनीतिक वक्तव्यों पर रोक लगाए। किंतु भारत ने ऐसा करने से इंकार किया। भारत ने संकेत दिया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी व्यक्ति की अभिव्यक्ति पर मनमाना प्रतिबंध लगाना उसके सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होगा। यह निर्णय केवल कूटनीतिक नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के प्रति भारत की घोषित प्रतिबद्धता का भी परिचायक माना गया।

फिर भी एक प्रश्न लगातार बना हुआ है—यदि शेख हसीना सार्वजनिक हुईं, तो उनका चेहरा क्यों नहीं दिखाया गया? इसका कोई आधिकारिक कारण सामने नहीं आया है। संभव है कि सुरक्षा कारणों, तकनीकी निर्णय या राजनीतिक रणनीति के चलते ऐसा किया गया हो। लेकिन राजनीति में प्रतीकों का महत्व बहुत होता है। चेहरा न दिखने से रहस्य, जिज्ञासा और अटकलों का दौर स्वाभाविक रूप से शुरू हो गया। यह घटना बताती है कि आधुनिक राजनीति में दृश्य उपस्थिति भी संदेश का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा होती है जितना कि भाषण की सामग्री।

इसी समय एक और घटना दक्षिण एशिया के लोकतांत्रिक विमर्श को नई दिशा देती है। बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन लगभग उन्नीस वर्षों बाद पुनः कोलकाता लौटी हैं। धार्मिक कट्टरवाद और महिला अधिकारों पर उनके निर्भीक लेखन ने उन्हें पहले अपने देश और फिर कोलकाता से दूर कर दिया था। उनकी वापसी केवल एक लेखिका की वापसी नहीं है; यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, साहित्य और लोकतांत्रिक उदारता की भी परीक्षा है।

यदि इन दोनों घटनाओं को साथ रखकर देखा जाए तो एक रोचक समानता उभरती है। एक ओर निर्वासित राजनीतिक नेता अपने देश लौटने की तैयारी कर रही हैं, दूसरी ओर निर्वासित लेखिका अपने प्रिय शहर में लौट रही हैं। दोनों की यात्राएँ अलग-अलग हैं, लेकिन दोनों लोकतंत्र की उस बुनियादी कसौटी से जुड़ी हैं, जहाँ असहमति को स्थान मिलता है या नहीं।

बांग्लादेश आज राजनीतिक संक्रमण के दौर से गुजर रहा है। ऐसे समय में शेख हसीना की वापसी वहाँ की न्यायपालिका, लोकतांत्रिक संस्थाओं और राजनीतिक परिपक्वता की परीक्षा होगी। यदि उनके विरुद्ध मामलों की सुनवाई निष्पक्ष, पारदर्शी और कानूनसम्मत ढंग से होती है, तो इससे लोकतंत्र मजबूत होगा। लेकिन यदि न्यायिक प्रक्रिया राजनीतिक प्रतिशोध का माध्यम बनती दिखाई देती है, तो इससे लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है।

भारत के सामने भी चुनौती कम नहीं है। एक ओर उसे अपने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी है, दूसरी ओर पड़ोसी देश के साथ संवेदनशील कूटनीतिक संबंध भी बनाए रखने हैं। दोनों देशों के संबंध केवल राजनीति तक सीमित नहीं हैं; वे इतिहास, संस्कृति, सुरक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता से भी जुड़े हैं। इसलिए भारत का हर कदम संतुलित और दूरदर्शी होना आवश्यक है।

तसलीमा नसरीन की वापसी भी भारत के लिए एक अवसर है। यदि उन्हें सुरक्षित वातावरण और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मिलती है, तो यह भारत की लोकतांत्रिक और सांस्कृतिक परंपरा को और मजबूत करेगा। लोकतंत्र की असली पहचान यही है कि वह असहमत विचारों को भी सुनने का साहस रखे।

अंततः शेख हसीना की वह आवाज़, जिसका चेहरा दुनिया ने नहीं देखा, और तसलीमा नसरीन की वह वापसी, जिसकी प्रतीक्षा वर्षों से थी—दोनों मिलकर दक्षिण एशिया के वर्तमान का एक बड़ा चित्र प्रस्तुत करती हैं। यह चित्र केवल दो व्यक्तियों का नहीं, बल्कि लोकतंत्र, न्याय, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राजनीतिक सहिष्णुता के भविष्य का है।

आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि क्या बांग्लादेश लोकतांत्रिक परिपक्वता का नया उदाहरण प्रस्तुत करेगा और क्या भारत अपने उदार लोकतांत्रिक चरित्र को और अधिक सुदृढ़ बनाए रखेगा। फिलहाल इतना निश्चित है कि इतिहास का पहिया फिर एक महत्वपूर्ण मोड़ पर है, जहाँ व्यक्तियों से अधिक लोकतांत्रिक मूल्यों की परीक्षा होने वाली है।