अशोक भाटिया
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका और ईरान के बीच चल रही बेहद संवेदनशील शांति वार्ता की मेज से पाकिस्तान को एक झटके में दूध में से मक्खी की तरह निकालकर बाहर फेंक दिया है। ‘वार्ता ऑन, पाकिस्तान आउट’ का यह सीधा, दोटूक और अपमानजनक संदेश न केवल प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पाकिस्तानी सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की जोड़ी के मुंह पर एक करारा अंतरराष्ट्रीय तमाचा है, बल्कि यह पाकिस्तान की उस परजीवी विदेश नीति की भी खुली अंत्येष्टि है जो हमेशा दूसरों के विवादों में बिचौलिया और दलाल बनकर अपनी तिजोरी भरने की आदी रही है। कूटनीतिक हलकों में खुद को ‘पीस मेकर’ यानी शांतिदूत के रूप में स्थापित करने का जो खोखला और हास्यास्पद स्वांग इस्लामाबाद रच रहा था, डोनाल्ड ट्रंप के एक एकल बयान ने उस समूचे ढोंग की धज्जियां उड़ा दी हैं। शहबाज शरीफ और जनरल आसिम मुनीर की यह जोड़ी वैश्विक मंच पर खुद को एक महान रणनीतिक खिलाड़ी साबित करने के चक्कर में किस कदर औंधे मुंह गिरी है, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पाकिस्तानी मीडिया और वहां के बिकाऊ रणनीतिकार तो इस कथित मध्यस्थता के लिए मुनीर और शहबाज को नोबेल शांति पुरस्कार तक दिलाने के ख्याली पुलाव पका रहे थे। लेकिन ट्रंप ने कूटनीति के क्रूर यथार्थ से पाकिस्तान का सामना करवाते हुए उसे उसकी असली औकात और हैसियत याद दिला दी है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों का एक बेहद सीधा और अपरिवर्तनीय कूटनीतिक नियम है कि साख हमेशा अपनी आंतरिक ताकत, आर्थिक संप्रभुता और राष्ट्रीय चरित्र से कमाई जाती है; इसे दुनिया के सामने कटोरा लेकर भीख मांगकर या बयानों की बैसाखियों के सहारे कभी हासिल नहीं किया जा सकता। पाकिस्तान की आज की सबसे बड़ी त्रासदी यही है कि वह एक ऐसी बदहाल, खोखली और दिवालिया अर्थव्यवस्था बन चुका है जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के टुकड़ों, चीनी कर्जों और सऊदी अरब की खैरात के सहारे वेंटिलेटर पर अपनी आखिरी सांसें गिन रही है। जब आपके देश के भीतर आटा, बिजली और पेट्रोल के लिए दंगे हो रहे हों, जब आपकी अवाम दाने-दाने को मोहताज हो, और जब आपकी पूरी हुकूमत केवल विदेशी कर्ज का ब्याज चुकाने के लिए नए कर्जे तलाशने के उद्देश्य से दुनिया भर के चक्कर काट रही हो, तब आप वैश्विक मंच पर दो परमाणु शक्तियों और महाशक्तियों के बीच सुलह कराने का हास्यास्पद नाटक कैसे कर सकते हैं? शहबाज शरीफ और आसिम मुनीर की जोड़ी दरअसल पाकिस्तान की आंतरिक बदहाली, बेकाबू महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और जनता के भयंकर आक्रोश से ध्यान भटकाने के लिए इस कथित वैश्विक मध्यस्थता का एक फर्जी गुब्बारा फुला रही थी। डोनाल्ड ट्रंप ने इस गुब्बारे में सुई चुभोकर इसके चिथड़े-चिथड़े कर दिए हैं, और पूरी दुनिया के सामने पाकिस्तान के कूटनीतिक दिवालियापन को पूरी तरह नंगा कर दिया है।
इस पूरे घटनाक्रम की पृष्ठभूमि पाकिस्तान के उस चिरपरिचित ‘डबल गेम’ और धोखेबाज़ी के डीएनए को उजागर करती है, जिससे पूरी दुनिया अब पूरी तरह वाकिफ और आजिज आ चुकी है। पिछले कुछ महीनों से जब अमेरिका और ईरान के बीच मध्य पूर्व में तनाव अपने चरम पर था, तब इस्लामाबाद से यह बड़े-बड़े दावे किए जा रहे थे कि पाकिस्तान दोनों पक्षों को एक मेज पर लाने की कूटनीतिक क्षमता रखता है। पाकिस्तानी जनरलों और हुक्मरानों को लग रहा था कि वे एक तरफ ईरान को अपनी सीमा और धार्मिक संबंधों की दुहाई देकर साध लेंगे, और दूसरी तरफ अमेरिका के सामने संकटमोचक और ‘फ्रंटलाइन स्टेट’ बनने का ढोंग रचकर वाशिंगटन से एक बहुत बड़ा वित्तीय और सैन्य पैकेज ऐंठ लेंगे। पाकिस्तान का इतिहास हमेशा से आतंकवाद और कूटनीति दोनों मोर्चों पर दोहरी चालें चलने का रहा है। एक तरफ वह अमेरिका से डॉलर लेता था, तो दूसरी तरफ ओसामा बिन लादेन जैसे खूंखार आतंकियों को अपनी सैन्य छावनियों के बगल में पनाह देता था। कूटनीति की मेज पर भी वह यही घिनौना खेल खेल रहा था। अमेरिकी रक्षा मंत्रालय के शीर्ष रणनीतिकारों और सेवानिवृत्त जनरल जैक कीन जैसे दिग्गजों ने बहुत पहले ही वाशिंगटन को आगाह कर दिया था कि पाकिस्तान मध्यस्थता के नाम पर एक निष्पक्ष दूत की भूमिका निभाने के बजाय अंदरूनी तौर पर ईरान के हितों की वकालत कर रहा है और अमेरिकी खुफिया जानकारियों को लीक करने का जोखिम पैदा कर रहा है। ट्रंप प्रशासन ने इस धोखेबाज़ी को समय रहते भांप लिया और पाकिस्तान की पीठ में छुरा घोंपने की इस पुरानी आदत को कड़ा जवाब देते हुए उसे वार्ता के कमरे से धक्के मारकर बाहर निकाल दिया।
डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस से जारी अपने बयान में बेहद क्रूर और साफ शब्दों में कहा कि ईरान के अनुरोध पर दोनों देशों के बीच बातचीत का सिलसिला दोबारा पूरी तत्परता के साथ शुरू हो चुका है, लेकिन इस बेहद महत्वपूर्ण प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाने में उन्होंने केवल खाड़ी के जिम्मेदार और आर्थिक रूप से सुदृढ़ देशों—सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और कतर की भूमिका को सराहा और उन्हें ही इस वार्ता का वास्तविक आधार स्तंभ माना। इस पूरी फेहरिस्त से पाकिस्तान का नाम पूरी तरह गायब होना कोई अनजानी भूल या कूटनीतिक चूक नहीं है, बल्कि यह पाकिस्तान का एक सोचा-समझा, रणनीतिक और बेहद अपमानजनक कूटनीतिक बहिष्कार है। इससे भी बड़ी और ऐतिहासिक फजीहत पाकिस्तान की तब हुई जब ट्रंप ने यह साफ कर दिया कि यदि दोनों देशों के बीच कोई ऐतिहासिक समझौता या संघर्षविराम होता है, तो उसका आधिकारिक हस्ताक्षर समारोह इस्लामाबाद या पाकिस्तान की धरती पर आयोजित करने का सवाल ही पैदा नहीं होता; यह भव्य कार्यक्रम यूरोप के किसी प्रतिष्ठित और विश्वसनीय शहर में आयोजित किया जाएगा। इस एक फैसले ने पाकिस्तान को उस वैश्विक मंच पर पूरी तरह अछूत और हाशिए पर धकेल दिया, जहां वह मुख्य नायक बनने का स्वांग रच रहा था और कूटनीतिक माइलेज लेने की फिराक में था।
सवाल यह उठता है कि आखिर महाशक्ति अमेरिका और वैश्विक बिरादरी अब पाकिस्तान की छाया से भी परहेज क्यों कर रहे हैं? इसका कारण यह है कि वैश्विक राजनीति अब केवल यथार्थवाद और आर्थिक साख के सिद्धांतों पर चलती है। आज सऊदी अरब, यूएई और कतर जैसे देश केवल तेल संपन्न देश नहीं हैं, बल्कि उनके पास ठोस कूटनीतिक विश्वसनीयता, स्थिर सरकारें, मजबूत नेतृत्व और अरबों डॉलर का निवेश प्रभाव है, जिसके बल पर वे वैश्विक फैसलों को प्रभावित कर सकते हैं। इसके विपरीत, पाकिस्तान की साख एक अंतरराष्ट्रीय भिखारी और आतंकवाद की नर्सरी से ज्यादा कुछ नहीं रह गई है। एक ऐसा देश जहां आज भी टीटीपी (तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान) और बलूच विद्रोही चीनी इंजीनियरों और पाकिस्तानी फौजियों को उनके बैरकों में घुसकर मार रहे हैं, जहां आंतरिक सुरक्षा पूरी तरह ध्वस्त हो चुकी है, वह देश दुनिया को सुरक्षा और शांति की गारंटी देने चला था। पाकिस्तानी फौज के मुखिया जनरल आसिम मुनीर, जो देश के भीतर अपनी अलोकप्रियता को छिपाने के लिए और न्यायपालिका से लेकर चुनाव तक की संस्थाओं को अपने बूटों तले रौंदने के लिए कुख्यात हैं, उन्हें लग रहा था कि वे इस वैश्विक संकट के मसीहा बनकर अपनी गिरती साख को बचा लेंगे। लेकिन ट्रंप के इस करारे चांटे ने मुनीर के उस अहंकार को चकनाचूर कर दिया है जो वे पाकिस्तानी जनता पर गोलियां चलवाकर अर्जित करते हैं।
इस कूटनीतिक पराजय के बाद अब इस्लामाबाद के गलियारों में मातम, हताशा और गहरी छटपटाहट का माहौल साफ देखा जा सकता है। अपनी जाहिल और त्रस्त जनता के सामने चेहरा बचाने के लिए शहबाज सरकार के मंत्री और आईएसपीआर के प्रोपेगैंडा बाज अब भी यह खोखला तर्क देने की कोशिश कर रहे हैं कि ईरान और उनके बीच अब भी संपर्क बना हुआ है और पाकिस्तान पर्दे के पीछे से भूमिका निभा रहा है। लेकिन कड़वा और नंगा सच यह है कि अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति में बिना अमेरिकी सहमति और मुहर के किसी भी मध्यस्थ की हैसियत पूरी तरह शून्य होती है। पाकिस्तान इस वार्ता से पूरी तरह ‘आउट’ हो चुका है और उसकी स्थिति उस बिन बुलाए मेहमान जैसी हो गई है जिसे शादी के मंडप से बेइज्जत करके बाहर निकाल दिया गया हो। यह मुनीर-शहबाज की उस हाइब्रिड हुकूमत के ताबूत में आखिरी कील है, जिसने पाकिस्तान को पूरी दुनिया में एक मज़ाक और कूटनीतिक विदूषक बनाकर छोड़ दिया है।
अंततः, ‘ठेंगा दिखाने’ और इस अपमानजनक कूटनीतिक बहिष्कार की यह घटना पाकिस्तान के लिए एक अंतिम चेतावनी है। इस्लामाबाद के हुक्मरानों को यह समझ लेना चाहिए कि भू-राजनीति में मुफ्त की वाहवाही, दोहरी चालबाजी और ब्लैकमेलिंग के दिन अब हमेशा के लिए लद चुके हैं। जब तक कोई देश आंतरिक रूप से मजबूत, आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर और अपनी नीतियों में ईमानदार नहीं होता, तब तक महाशक्तियां उसे केवल एक ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ वाले टिशू पेपर से ज्यादा अहमियत नहीं देतीं। डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को बाहर का रास्ता दिखाकर वैश्विक कूटनीति की एक नई और कठोर रेखा खींच दी है। इस्लामाबाद के लिए बेहतर होगा कि वह नोबेल पुरस्कारों के ख्याली पुलाव पकाना और दुनिया के विवादों में दलाली करना बंद करे, और अपनी घरेलू बदहाली, भुखमरी और आतंकवाद के कैंसर को सुधारने पर ध्यान केंद्रित करे। अन्यथा वह दिन दूर नहीं जब वैश्विक बिरादरी पाकिस्तान को पूरी तरह प्रतिबंधित कर एक अंतरराष्ट्रीय अछूत घोषित कर देगी, और शहबाज-मुनीर की जोड़ी इतिहास के पन्नों में पाकिस्तान की बर्बादी के सबसे बड़े गुनहगारों के रूप में दर्ज की जाएगी।





