संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2026 -रिश्वत एक अदृश्य कर?

United Nations Sustainable Development Goals Report 2026 – Is Bribery an Invisible Tax

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर आज के डिजिटल युग में भ्रष्टाचार केवल सरकारी फाइलों,बंद कमरों,रिश्वतखोरी या सार्वजनिक धन के दुरुपयोग तक सीमित विषय नहीं रह गया है।अब एक अधूरी सड़क का वीडियो,जर्जरस्कूल की तस्वीर,वर्षों से बंद पड़ा अस्पताल,अधूरा पुल, अनुपयोगी सरकारी भवन या किसी नागरिक की शिकायत कुछ ही घंटों में लाखों लोगों तक पहुंच सकती है। पहले नागरिक भ्रष्टाचार की शिकायत करते थे, फिर मीडिया उसे प्रकाशित करता था,उसके बाद जांच एजेंसियां सक्रिय होती थीं और अंततः राजनीतिक या प्रशासनिक कार्रवाई की उम्मीद की जाती थी। लेकिन डिजिटल युग में नागरिक स्वयं कैमरा,रिपोर्टर, तथ्य-संग्रहकर्ता,जनमत निर्माता और कभी-कभी राजनीतिक प्रतिनिधि भी बन रहा है। सोशल मीडिया ने जनता को आवाज तो दी है, लेकिन इसके साथ एक महत्वपूर्ण प्रश्न भी खड़ा किया है, क्या डिजिटल निगरानी वास्तव में जवाबदेही बढ़ाएगी या केवल वायरल लोकप्रियता की राजनीति को जन्म देगी? इस प्रश्न का उत्तर इस बात पर निर्भर करेगा कि डिजिटल अभियानों को तथ्य, प्रमाण, स्वतंत्र जांच और संस्थागत सुधार से कितना जोड़ा जाता है।

रिश्वत को अदृश्य कर कहना इसलिए उचित है, क्योंकि यह अक्सर कानून द्वारा निर्धारित कर नहीं होती, फिर भी नागरिक को सेवा प्राप्त करने के लिए अतिरिक्त आर्थिक कीमत चुकानी पड़ती है। अंतर यह है कि वैध कर सार्वजनिक बजट में दर्ज होता है और उसके उपयोग पर लोकतांत्रिक निगरानी संभव होती है, जबकि रिश्वत निजी लाभ में चली जाती है और सार्वजनिक व्यवस्था को भीतर से कमजोर करती है।इसका सबसे अधिक प्रभाव गरीब, निम्न-मध्यमवर्गीय और कमजोर वर्गों पर पड़ता है। संपन्न व्यक्ति के लिए एक छोटी अवैध राशि आर्थिक असुविधा हो सकती है, लेकिन सीमित आय वाले परिवार के लिए वही राशि भोजन, शिक्षा, दवा या यात्रा के बजट को प्रभावित कर सकती है। इस प्रकार भ्रष्टाचार केवल आर्थिक अपराध नहीं, बल्कि सामाजिक असमानता को बढ़ाने वाला तंत्र भी बन जाता है।संयुक्त राष्ट्र की द सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल्स रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भ्रष्टाचार और रिश्वतखोरी विकासशील देशों में गरीबों पर अमीर देशों की तुलना में तीन गुना अधिक वित्तीय बोझ डालती है,जिससे 17 प्रतिशत आबादी सीधे प्रभावित हो रही है। रिपोर्ट में कहा गया है कि कड़े कानूनी ढांचे के बावजूद भ्रष्टाचार विरोधी कानूनों के खराब कार्यान्वयन से संस्थागत जवाबदेही कमजोर हो रही है। अब विश्व सहित भारत से यह उम्मीद की जाती है क़ि भ्रष्टाचार कानून का क्रियान्वयन सख़्ती से किया जाएगा? या फिर जंतर मंतर पर ज़ेन ज़ेड के खिलाफ पेपर लीकआंदोलन की तरह भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की रास्ता देखी जाएगी।

साथियों, संयुक्त राष्ट्र की सतत विकास लक्ष्य रिपोर्ट 2026 के अनुसार, जिन देशों के लिए हालिया और तुलनीय आंकड़े उपलब्ध हैं,वहां सार्वजनिक अधिकारियों से संपर्क करने वाले लगभग 17 प्रतिशत लोगों ने बताया कि पिछले 12 महीनों के दौरान उनसे रिश्वत मांगी गई या सार्वजनिक सेवा प्राप्त करने के लिए उन्हें रिश्वत देनी पड़ी। रिपोर्ट के निष्कर्ष यह संकेत देते हैं कि निम्न-आय वाले देशों में रिश्वतखोरी का प्रभाव उच्च-आय वाले देशों की तुलना में अधिक व्यापक और गंभीर है। मध्य एवं दक्षिण एशिया में भी सार्वजनिक सेवाओं तक पहुंच के दौरान रिश्वत की समस्या चिंता का विषय बनी हुई है। यह स्थिति स्पष्ट करती है कि भ्रष्टाचार केवल प्रशासनिक अनियमितता या आर्थिक अपराध नहीं,बल्कि सामाजिक न्याय, आर्थिक समानता और नागरिक अधिकारों से जुड़ी वैश्विक चुनौती है।जब किसी नागरिक को स्वास्थ्य, शिक्षा पुलिस, भूमि, प्रमाण-पत्र, लाइसेंस या अन्य आवश्यक सरकारी सेवा के लिए वैध शुल्क के अतिरिक्त अवैध भुगतान करना पड़ता है, तो रिश्वत एक प्रकार के “अदृश्य कर” में बदल जाती है। इसका सबसे अधिक बोझ गरीब, निम्न- आय और कमजोर वर्गों पर पड़ता है। इसलिए भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए कठोर कानून के साथ पारदर्शी प्रशासन, डिजिटल जवाबदेही, स्वतंत्र निगरानी, सुरक्षित शिकायत व्यवस्था और सटिका से समयबद्ध कार्रवाई भी आवश्यक है।

साथियों भ्रष्टाचार का एक और अधिक गंभीर पक्ष वह है, जो अक्सर बड़े घोटालों की सुर्खियों में दिखाई नहीं देता, आम नागरिक द्वारा दिया जाने वाला छोटा या मजबूरी का भुगतान।किसी प्रमाणपत्र, लाइसेंस,पुलिस कार्यवाही, भूमि संबंधी सेवा,स्वास्थ्य सुविधा या अन्य सार्वजनिक सेवा के लिए यदि नागरिक से अनुचित धन मांगा जाता है, तो यह केवल व्यक्तिगत आर्थिक नुकसान नहीं होता; यह राज्य और नागरिक के बीच विश्वास को कमजोर करता है। इसी कारण संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्य- 16 में शांति, न्याय और मजबूत संस्थाओं के साथ भ्रष्टाचार एवं रिश्वत को कम करने को विशेष महत्व दिया गया है।एसडीज़ी -16 का उद्देश्य प्रभावी, जवाबदेह और पारदर्शी संस्थाओं का निर्माण करना है, क्योंकि विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब नागरिकों को सेवाएं निष्पक्ष और समान रूप से उपलब्ध हों।

साथियों, बदलती व्यवस्था का एक असाधारण उदाहरण आज 4 अगस्त 2026 को कोलंबिया में सामने आया, जहां भ्रष्टाचार और उपेक्षित सार्वजनिक परियोजनाओं को उजागर करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता लुइस कार्लोस रूआ ने सफेद हाथी की पोशाक पहनकर सीनेटर के रूप में शपथ ली। उन्होंने बिना किसी पारंपरिक और बड़े राजनीतिक प्रचार के लगभग 1,24,000 वोट हासिल किए और सीनेट के लिए चुने गए। उनका इस वेशभूषा में संसद पहुँचना यह दिखाने के लिए था कि वे भ्रष्टाचार के खिलाफ अपनी इस अनोखी निगरानी को अब संसद के भीतर से भी जारी रखेंगे, उनका यह प्रतीक उन महंगी, अधूरी, अनुपयोगी या कुप्रबंधित सार्वजनिक परियोजनाओं का प्रतिनिधित्व करता है, जिन पर जनता का धन खर्च तो होता है, लेकिन उनका अपेक्षित लाभ जनता तक नहीं पहुंचता। सोशल मीडिया पर सड़कों, पुलों, स्कूलों, अस्पतालों और अन्य सार्वजनिक ढांचों की कमियों को सामने लाने वाले उनके अभियानों ने उन्हें लोकप्रिय बनाया और वे लगभग 1.24 लाख मतों के साथ कोलंबिया के प्रमुख निर्वाचित सीनेटरों में शामिल हुए।यह घटना केवल एक व्यक्ति के संसद पहुंचने की कहानी नहीं है; यह दुनिया की राजनीति में उभर रहे सटीकता से एक बड़े परिवर्तन का संकेत है।

साथियों संयुक्त राष्ट्र के भ्रष्टाचार -संबंधी वैश्विक संकेतक भी यह मानते हैं कि रिश्वत की समस्या को केवल दर्ज मामलों से नहीं मापा जा सकता। एसडीज़ी लक्ष्य 16.5 के अंतर्गत यह देखा जाता है कि सार्वजनिक अधिकारी से संपर्क करने वाले कितने लोगों या व्यवसायों ने पिछले 12 महीनों में रिश्वत दी या उनसे रिश्वत मांगी गई। यह व्यवस्था इस तथ्य को स्वीकार करती है कि भ्रष्टाचार का वास्तविक अनुभव अक्सर न्यायालय या पुलिस रिकॉर्ड तक पहुंच ही नहीं पाता।भ्रष्टाचार का प्रभाव विकास की पूरी श्रृंखला पर पड़ता है। यदि सड़क निर्माण में धन का दुरुपयोग होता है, तो सड़क जल्दी टूट सकती है; यदि स्कूल निर्माण में अनियमितता होती है, तो शिक्षा की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है; यदि स्वास्थ्य परियोजना अधूरी रह जाती है, तो नागरिकों को उपचार के लिए दूर जाना पड़ सकता है; यदि जल परियोजना वर्षों तक लंबित रहती है, तो गरीब परिवारों को पानी खरीदना पड़ सकता है। इस प्रकार भ्रष्टाचार का नुकसान केवल सरकारी खजाने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि नागरिकों के समय, आय, स्वास्थ्य, शिक्षा और अवसरों पर भी पड़ता है। कई बार भ्रष्टाचार की सबसे बड़ी कीमत वह व्यक्ति चुकाता है, जिसने सटीकता से किसी गलत निर्णय में भाग भी नहीं लिया होता।

साथियों, इसी संदर्भ में कोलंबिया का सफेद हाथी आंदोलन और रिश्वत का अदृश्य कर, दोनों एक ही समस्या के अलग-अलग रूप हैं। पहला सार्वजनिक धन के बड़े पैमाने पर दुरुपयोग या परियोजनागत विफलता को उजागर करता है, जबकि दूसरा नागरिक की दैनिक जिंदगी में भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष बोझ को सामने लाता है। एक ओर करोड़ों की परियोजना अधूरी रह सकती है, दूसरी ओर आम व्यक्ति को छोटी सेवा के लिए अवैध भुगतान करना पड़ सकता है। दोनों स्थितियों में सबसे बड़ी क्षति सार्वजनिक विश्वास की होती है। जब नागरिक को लगता है कि कर का धन परिणाम नहीं दे रहा और सेवाओं के लिए अलग से रिश्वत देनी पड़ रही है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं की विश्वसनीयता कमजोर होती है।
साथियों, भारत के संदर्भ में यह विषय विशेष महत्व रखता है। भारत ने डिजिटल शासन, ऑनलाइन सेवाओं, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, ई-टेंडरिंग, डिजिटल भुगतान और सार्वजनिक सेवा पोर्टलों के माध्यम से पारदर्शिता बढ़ाने के अनेक प्रयास किए हैं। डिजिटल व्यवस्था ने कई क्षेत्रों में बिचौलियों की भूमिका कम करने और सेवाओं की निगरानी को आसान बनाने की क्षमता दिखाई है। लेकिन तकनीक अपने आप भ्रष्टाचार समाप्त नहीं करती। यदि निर्णय प्रक्रिया अपारदर्शी हो, डेटा सार्वजनिक न हो, शिकायतों का समयबद्ध समाधान न हो या जिम्मेदारी तय न की जाए, तो भ्रष्टाचार का स्वरूप बदल सकता है। इसलिए डिजिटल शासन के साथ डिजिटल जवाबदेही भी आवश्यक है।

साथियों, सोशल मीडिया की भूमिका भी इसी संतुलन में समझनी होगी। नागरिक पत्रकारिता सार्वजनिक समस्याओं को सामने ला सकती है, लेकिन हर वायरल वीडियो सत्य का अंतिम प्रमाण नहीं होता। अधूरी जानकारी,संपादित वीडियो, राजनीतिक प्रचार,व्यक्तिगत प्रतिशोध और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से निर्मित भ्रामक सामग्री भी जनमत को प्रभावित कर सकती है। इसलिए वायरल और विश्वसनीय को एक मान लेना खतरनाक होगा। नागरिकों द्वारा उठाए गए मुद्दों की स्वतंत्र जांच,दस्तावेजी प्रमाण, प्रशासनिक उत्तर और सार्वजनिक रिपोर्टिंग आवश्यक है। डिजिटल प्लेटफॉर्म को शिकायतों का मंच बनना चाहिए, लेकिन न्याय का विकल्प नहीं।भ्रष्टाचार के विरुद्ध प्रभावी संघर्ष के लिए केवल कठोर कानून पर्याप्त नहीं हैं। कानून के साथ पारदर्शी खरीद व्यवस्था, खुला बजट डेटा,स्वतंत्र लेखा-परीक्षा, समयबद्ध जांच व्हिसलब्लोअर संरक्षण मजबूत लोक शिकायत प्रणाली और सार्वजनिक परियोजनाओं की सामाजिक ऑडिट व्यवस्था आवश्यक है। संयुक्त राष्ट्र भी प्रभावी शासन के लिए पारदर्शिता, ईमानदारी और स्वतंत्र निगरानी को महत्वपूर्ण मानता है।

साथियों इस दिशा में सामाजिक लेखा-परीक्षा एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। किसी परियोजना का बजट,समयसीमा, ठेकेदार, कार्य की स्थिति और गुणवत्ता यदि स्थानीय नागरिकों के लिए आसानी से उपलब्ध हो, तो जनता केवल चुनाव के समय नहीं, बल्कि पूरे कार्यकाल में निगरानी कर सकती है। स्थानीय समुदाय, पत्रकार, वकील, सामाजिक संगठन, तकनीकी विशेषज्ञ और नागरिक समूह मिलकर सार्वजनिक परियोजनाओं की वास्तविक स्थिति का मूल्यांकन कर सकते हैं। इससे भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमाण-आधारित जन- जवाबदेही में बदला जा सकता है।कोलंबिया के सफेद हाथी की कहानी यह भी बताती है कि जनता अब पारंपरिक राजनीति से अधिक प्रत्यक्ष जवाबदेही की अपेक्षा कर रही है। फिर भी किसी सामाजिक कार्यकर्ता का राजनीतिक सत्ता तक पहुंचना भ्रष्टाचार के अंत की गारंटी नहीं है। सत्ता में आने के बाद वही व्यक्ति कानून-निर्माण, बजट, राजनीतिक समझौते और प्रशासनिक दबावों का हिस्सा बनता है। इसलिए जनप्रतिनिधि की वास्तविक परीक्षा चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है। रूआ के सामने भी यही चुनौती है कि वे जिन सार्वजनिक परियोजनाओं की जवाबदेही मांगते रहे, क्या अब उनके लिए प्रभावी और पारदर्शी संस्थागत समाधान तैयार कर पाएंगे?