डॉ विजय गर्ग
पृथ्वी पर जीवन का अस्तित्व वनों के बिना संभव नहीं है। वन केवल पेड़ों का समूह नहीं, बल्कि एक जीवंत पारिस्थितिकी तंत्र हैं, जहाँ पेड़-पौधे, पक्षी, वन्यजीव, कीट-पतंगे, कवक और सूक्ष्मजीव एक-दूसरे पर निर्भर रहते हुए प्रकृति का संतुलन बनाए रखते हैं। वे हमें ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं, वर्षा चक्र को प्रभावित करते हैं, मिट्टी का संरक्षण करते हैं और करोड़ों लोगों की आजीविका का आधार हैं। आज जब जलवायु परिवर्तन और जैव विविधता का संकट गहराता जा रहा है, तब एक नया अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिक अध्ययन यह स्पष्ट करता है कि जितनी अधिक प्रजातियाँ किसी वन में होंगी, वह वन उतना ही अधिक मजबूत, उत्पादक और जलवायु परिवर्तन के प्रति लचीला होगा।
लगभग बीस वर्षों तक किए गए वैश्विक अध्ययन में वैज्ञानिकों ने विभिन्न महाद्वीपों के वनों का विश्लेषण किया। शोध से पता चला कि जिन वनों में वृक्षों की प्रजातियों की विविधता अधिक थी, वहाँ प्रकाश संश्लेषण की क्षमता समय के साथ अधिक तेजी से बढ़ी। प्रकाश संश्लेषण वह प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसके माध्यम से पौधे सूर्य के प्रकाश, पानी और कार्बन डाइऑक्साइड की सहायता से अपना भोजन बनाते हैं तथा ऑक्सीजन का उत्सर्जन करते हैं। यही प्रक्रिया पृथ्वी पर जीवन और खाद्य श्रृंखला की आधारशिला है।
अध्ययन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह है कि यदि जैव विविधता का क्षरण इसी गति से जारी रहा, तो वर्ष 2050 तक वनों की प्रकाश संश्लेषण क्षमता में होने वाला सकारात्मक सुधार लगभग 17 प्रतिशत तक कम हो सकता है। इसका अर्थ केवल पेड़ों की धीमी वृद्धि नहीं है, बल्कि वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करने की पृथ्वी की प्राकृतिक क्षमता भी कमजोर पड़ सकती है।
जैव विविधता क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
जैव विविधता का अर्थ केवल विभिन्न प्रकार के वृक्ष नहीं, बल्कि पूरे वन में मौजूद सभी जीवित प्रजातियों की विविधता है। प्रत्येक वृक्ष प्रजाति की अपनी विशेष भूमिका होती है। कुछ वृक्ष तेजी से बढ़ते हैं, कुछ लंबे समय तक जीवित रहते हैं। कुछ की जड़ें गहराई तक जाकर पानी प्राप्त करती हैं, जबकि कुछ मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने में मदद करती हैं। जब अनेक प्रजातियाँ एक साथ रहती हैं, तो वे सूर्य के प्रकाश, पानी और पोषक तत्वों का अधिक कुशलता से उपयोग करती हैं।
विविधता से भरपूर वन प्राकृतिक आपदाओं का सामना भी बेहतर ढंग से करते हैं। यदि किसी रोग, कीट या सूखे से एक प्रजाति प्रभावित होती है, तो अन्य प्रजातियाँ वन की कार्यक्षमता बनाए रखती हैं। इसके विपरीत, केवल एक या दो प्रजातियों वाले वन किसी एक बीमारी या पर्यावरणीय संकट से बड़े पैमाने पर नष्ट हो सकते हैं।
जलवायु परिवर्तन से लड़ने में वनों की भूमिका
वन पृथ्वी के सबसे बड़े कार्बन भंडारों में शामिल हैं। वे वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करके अपने तनों, शाखाओं, जड़ों और मिट्टी में संग्रहित करते हैं। इस कारण वन वैश्विक तापमान को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
जैव विविधता से समृद्ध वन अधिक स्वस्थ रहते हैं और लंबे समय तक कार्बन का भंडारण करने में सक्षम होते हैं। यही कारण है कि वैज्ञानिक जैव विविधता को जलवायु परिवर्तन के विरुद्ध प्रकृति की सबसे प्रभावी रक्षा प्रणाली मानते हैं।
केवल पेड़ ही नहीं, पूरा पारिस्थितिकी तंत्र महत्वपूर्ण
वनों की शक्ति केवल पेड़ों में नहीं होती। पक्षी बीजों का प्रसार करते हैं, मधुमक्खियाँ और तितलियाँ परागण में सहायता करती हैं, कवक मिट्टी में पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं, जबकि सूक्ष्मजीव पौधों की वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। इन सभी जीवों के बीच एक जटिल लेकिन संतुलित संबंध होता है।
यदि इनमें से किसी एक समूह की संख्या कम होती है, तो उसका प्रभाव पूरे वन तंत्र पर पड़ सकता है। इसलिए जैव विविधता का संरक्षण केवल दुर्लभ प्रजातियों को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की सुरक्षा है।
जैव विविधता के सामने बढ़ते खतरे
आज मानव गतिविधियाँ जैव विविधता के लिए सबसे बड़ा खतरा बन चुकी हैं। वनों की कटाई, अनियंत्रित शहरीकरण, प्रदूषण, अवैध लकड़ी कटाई, खनन और जलवायु परिवर्तन प्राकृतिक वनों को लगातार नुकसान पहुँचा रहे हैं। अनेक स्थानों पर विविध प्राकृतिक वनों की जगह केवल एक ही प्रजाति के वृक्षों के बड़े-बड़े बाग लगाए जा रहे हैं। यद्यपि ये आर्थिक दृष्टि से उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन वे प्राकृतिक वनों जैसी पारिस्थितिक सेवाएँ और जैव विविधता प्रदान नहीं कर सकते।
समाधान क्या है?
वनों की रक्षा के लिए केवल पेड़ लगाना पर्याप्त नहीं है। आवश्यक है कि स्थानीय और देशज प्रजातियों को प्राथमिकता दी जाए। प्राकृतिक वनों का संरक्षण, क्षतिग्रस्त वनों का पुनर्स्थापन, अवैध कटाई पर सख्त नियंत्रण तथा टिकाऊ वन प्रबंधन को बढ़ावा देना समय की मांग है।
स्थानीय समुदायों और आदिवासी समाजों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। सदियों से वे प्रकृति के साथ संतुलित जीवन जीते आए हैं और वनों के संरक्षण में उनका अनुभव अमूल्य है। इसके साथ ही पर्यावरण शिक्षा, जनजागरूकता और वैज्ञानिक अनुसंधान को भी बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
बीस वर्षों के वैज्ञानिक अध्ययन ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया है कि प्रकृति की वास्तविक शक्ति उसकी विविधता में निहित है। जिस प्रकार विविध विचारों वाला समाज अधिक सशक्त होता है, उसी प्रकार अनेक प्रजातियों से समृद्ध वन अधिक स्वस्थ, उत्पादक और टिकाऊ होते हैं।
जैव विविधता का संरक्षण केवल वन्यजीवों या पेड़ों को बचाने का प्रयास नहीं, बल्कि मानव सभ्यता के भविष्य को सुरक्षित रखने का संकल्प है। यदि हम आज अपने वनों की विविधता की रक्षा करेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वायु, संतुलित जलवायु, समृद्ध प्राकृतिक संसाधन और एक स्वस्थ पृथ्वी विरासत में मिलेगी। अधिक प्रजातियाँ वास्तव में अधिक मजबूत वनों की आधारशिला हैं, और यही संदेश दो दशकों के वैज्ञानिक प्रमाण हमें स्पष्ट रूप से देते हैं।





