तीसरे विश्वयुद्ध की आहट और हिरोशिमा का सबक

The Looming Shadow of World War III and the Lesson of Hiroshima

दिलीप कुमार पाठक

इक्यासी साल पहले छह अगस्त उन्नीस सौ पैंतालीस को अमेरिका ने जापान के हिरोशिमा पर जो परमाणु बम गिराया था, वह सिर्फ एक शहर की तबाही नहीं थी। उसने चंद सेकेंड में लाखों लोगों को मार डाला और जो बचे, वे पीढ़ियों तक घिसट-घिसट कर मरने के लिए मजबूर हो गए। आज भी जब हम उस दिन की कल्पना करते हैं तो सबसे बड़ा डर यह है कि दुनिया फिर से उसी रास्ते पर चल पड़ी है। चारों तरफ बस लड़ाई-झगड़े और तनाव का माहौल है। रूस और यूक्रेन के बीच सालों से चल रही जंग रुकने का नाम नहीं ले रही है। उधर पश्चिम एशिया में अमेरिका, इजरायल, हमास, हिजबुल्लाह और ईरान के बीच का झगड़ा लगातार बढ़ता जा रहा है। ऐसा लगता है कि दुनिया के बड़े देश किसी भी दिन एक दूसरे पर परमाणु हमला कर देंगे। मशहूर वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने एक बार बहुत पते की बात कही थी कि मैं यह तो नहीं जानता कि तीसरा विश्वयुद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा, लेकिन चौथा विश्वयुद्ध पत्थरों और लाठियों से लड़ा जाएगा। उनका यह कथन आज की कड़वी सच्चाई है। इस पूरी बर्बादी के पीछे साफ तौर पर अमेरिका की दादागिरी दिखाई देती है। वह अपने फायदे के लिए यूक्रेन के बहाने रूस को घेरने की जिद पर अड़ा है। नाटो सेनाओं का विस्तार करके वह आग में घी डालने का काम कर रहा है।

पश्चिम एशिया के मामले में भी अमेरिकी नीतियां और उसके हथियार शांति लाने के बजाय लड़ाई को और भड़का रहे हैं। आज दुनिया के नौ देशों के पास लगभग बारह हजार परमाणु बम मौजूद हैं। जरा सोचिए, जिस एक बम ने हिरोशिमा को श्मशान बना दिया था, आज के बम उससे हजारों गुना ज्यादा खतरनाक हैं। ऊपर से बड़े देशों के नेता जरा-जरा सी बात पर परमाणु हमले की धमकी देने लगते हैं। रूस के राष्ट्रपति कई बार पश्चिमी देशों को परमाणु हमले का डर दिखा चुके हैं, जो साफ करता है कि इन महाशक्तियों का अहंकार कितना बढ़ चुका है। ऐसे समय में संयुक्त राष्ट्र संघ यानी यूएनओ की भूमिका बिल्कुल बेकार साबित हुई है। इस संस्था को बनाया ही इसलिए गया था ताकि दुनिया में दोबारा कोई बड़ा युद्ध न हो। लेकिन आज यह बड़ी ताकतों के सामने बिल्कुल लाचार और बेबस दिखती है। शक्तिशाली देश इसके नियमों को अपने जूते की नोक पर रखते हैं और अपनी वीटो पावर का इस्तेमाल करके मनमानी करते हैं। यूएनओ न तो रूस और यूक्रेन की लड़ाई रुकवा पाया और न ही पश्चिम एशिया में बेकसूर बच्चों और नागरिकों को मरने से बचा पा रहा है। गाजा में हजारों मासूमों की मौत पर भी यूएनओ कोई ठोस कदम नहीं उठा सका। अंतरराष्ट्रीय कानून सिर्फ कमजोर देशों को डराने के लिए रह गए हैं, जबकि ताकतवर देश खुलेआम नियमों की धज्जियाँ उड़ा रहे हैं।

जब पूरी दुनिया इस तरह आपस में लड़ रही है, तब भारत का नजरिया सबसे अलग और सही है। हमारे देश ने कभी किसी पर अपनी मर्जी थोपने या किसी की जमीन हड़पने की कोशिश नहीं की। भारत ने हमेशा दुनिया को युद्ध नहीं, बल्कि बुद्ध का रास्ता दिखाया है। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था कि हम अपने दोस्त बदल सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं। भारत इसी जिम्मेदारी के साथ आगे बढ़ता है। हम पूरी दुनिया को अपना परिवार मानते हैं। हमारे पास परमाणु हथियार हैं, लेकिन हमारी नीति बिल्कुल साफ है कि हम अपनी तरफ से पहले कभी किसी पर हमला नहीं करेंगे। यह एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी की बात है। भारत ने हमेशा अमेरिका जैसी ताकतों की मनमानी का विरोध किया है और एक ऐसी दुनिया की वकालत की है जहां सब बराबर हों।हिरोशिमा की त्रासदी झेलने वाले रो-रोकर दुनिया से यही कह रहे हैं कि जो उनके साथ हुआ वह दोबारा किसी के साथ न हो। हिरोशिमा दिवस सिर्फ एक पुराना किस्सा याद करने का दिन नहीं है। यह दुनिया के बड़े नेताओं को अपना अहंकार छोड़ने की चेतावनी देने का दिन है। हथियार और जंग कभी किसी मसले का हल नहीं हो सकते। नेताओं की सनक के चक्कर में आम जनता अपनी जान गंवाती है। ट्रम्प, पुतिन, शी जंपिंग जैसे नेताओं को समझना होगा सृष्टि निर्माण पुनः नहीं होगा, बस इसी को सहेजने की दरकार है।