अशोक भाटिया
भारत में त्योहारों का आगमन केवल सांस्कृतिक उल्लास का प्रतीक नहीं होता, बल्कि यह देश की अर्थव्यवस्था, विशेषकर घरेलू उपभोग और खुदरा बाजार के लिए सबसे महत्वपूर्ण समय होता है। रक्षाबंधन से लेकर दुर्गा पूजा, दिवाली और छठ पूजा तक चलने वाला यह लंबा त्योहारी सीजन देश के आर्थिक चक्र को गति देता है। लेकिन पिछले कुछ समय से इस त्योहारी उल्लास पर कड़वी महंगाई का साया मंडरा रहा है। आम आदमी की रसोई से लेकर हलवाइयों और बड़े खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों तक, हर जगह एक ही सवाल गूंज रहा है— चीनी के बढ़ते दामों पर कब और कैसे लगाम लगेगी?
पिछले कुछ हफ्तों में देश के विभिन्न हिस्सों में चीनी की खुदरा कीमतों में अप्रत्याशित उछाल देखा गया है। जो चीनी कुछ समय पहले तक 40 से 42 रुपये प्रति किलोग्राम के दायरे में मिल रही थी, वह अब कई खुदरा बाजारों में 52 से 56 रुपये और कुछ प्रीमियम शहरी इलाकों में 65 से 70 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच चुकी है। त्योहारों के ठीक पहले कीमतों में यह वृद्धि केवल एक सांख्यिकीय आंकड़ा नहीं है, बल्कि यह देश के करोड़ों मध्यमवर्गीय और निम्न-आय वर्ग के परिवारों के बजटीय संतुलन को बिगाड़ने वाली एक कड़वी हकीकत है।
कृषि, पर्यावरण और बाजार की विसंगतियों के एक जटिल ताने-बाने ने मिलकर चीनी के बाजार को प्रभावित किया है। इस संकट की पहली और सबसे प्रमुख जड़ अल-नीनो के प्रभाव और देश के प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में असमान मानसून के कारण गन्ने की फसल का प्रभावित होना है। महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे शीर्ष उत्पादक राज्यों में कम बारिश के चलते गन्ने के उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। जब भी कृषि आधारित किसी भी उत्पाद का उत्पादन घटने की आशंका होती है, तो बाजार में एक मनोवैज्ञानिक कमी पैदा हो जाती है, जिसका सीधा असर कीमतों पर पड़ता है। दूसरा महत्वपूर्ण कारण गन्ने का एथेनॉल उत्पादन की ओर डाइवर्ट होना भी रहा है। सरकार की हरित ऊर्जा नीति के तहत पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग के लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारी मात्रा में गन्ने के रस और शीरे का उपयोग किया जा रहा है। हालांकि, यह कदम देश के कच्चे तेल के आयात बिल को कम करने और पर्यावरण संरक्षण के लिए दीर्घकालिक रूप से बेहद जरूरी है, लेकिन अल्पकालिक रूप से इसने खाद्य चीनी की उपलब्धता पर दबाव बनाया है। जब मिलें चीनी बनाने के बजाय एथेनॉल बनाने को प्राथमिकता देने लगती हैं, तो बाजार में चीनी की तात्कालिक आपूर्ति प्रभावित होना स्वाभाविक है।
जैसे ही बाजार को यह संकेत मिलता है कि आगामी सीजन में उत्पादन कम रह सकता है, वैसे ही बाजार के कुछ अवांछित तत्व सक्रिय हो जाते हैं। थोक व्यापारी, बड़े डीलर और कुछ खाद्य प्रसंस्करण इकाइयां भविष्य में और अधिक दाम बढ़ने की उम्मीद में चीनी का स्टॉक जमा करना शुरू कर देते हैं। इस कृत्रिम कमी के कारण थोक बाजारों में दाम रातों-रात बढ़ जाते हैं, जिसका खामियाजा अंततः खुदरा उपभोक्ता को भुगतना पड़ता है। त्योहारों के समय मिठाई निर्माताओं, बेकरियों और शीतल पेय कंपनियों की तरफ से चीनी की मांग सामान्य दिनों की तुलना में 30 से 40 प्रतिशत तक बढ़ जाती है। मांग में इस मौसमी वृद्धि और आपूर्ति में सट्टेबाजी के गठजोड़ ने ही इस बार कीमतों को बेकाबू कर दिया है।
कीमतों के इस बेकाबू रथ को रोकने के लिए सरकार ने हाल ही में कुछ अत्यंत सख्त और नीतिगत कदम उठाए हैं, जिन्हें इस संकट के समाधान की दिशा में एक बड़ा ‘डैमेज कंट्रोल’ माना जा सकता है। उपभोक्ता मामलों के मंत्रालय और खाद्य मंत्रालय ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए कई मोर्चों पर एक साथ कार्रवाई शुरू की है। सबसे पहला और कड़ा प्रहार जमाखोरों पर किया गया है। सरकार ने चीनी के लिए नई ‘स्टॉक लिमिट’ लागू कर दी है। इसके तहत, जो भी बड़े खाद्य निर्माता या बल्क कंज्यूमर्स महीने में 10 टन से अधिक चीनी का उपयोग करते हैं, वे अब 1 सितंबर से 30 नवंबर तक अपनी 15 दिनों की खपत से अधिक का स्टॉक नहीं रख सकते। पहले यह सीमा 30 दिनों की थी, जिसे आधा कर दिया गया है ताकि मिलों और गोदामों में बंद चीनी बाजार में आने के लिए मजबूर हो। इसी तरह, डीलर और ट्रेडर के लिए भी अधिकतम 4000 क्विंटल (400 टन) की स्टॉक सीमा तय कर दी गई है। इस कदम का मुख्य उद्देश्य बाजार में चीनी के कृत्रिम अभाव को पूरी तरह समाप्त करना है।
दूसरा बड़ा कदम ‘शुल्क-मुक्त आयात’ की अनुमति देना है। घरेलू उपलब्धता को तुरंत सुदृढ़ करने के लिए सरकार ने 10 लाख टन कच्ची चीनी के आयात को मंजूरी दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार से आने वाली यह चीनी देश की मिलों के पास जाकर रिफाइन होगी और सीधे बाजार में सप्लाई की जाएगी। इसके अतिरिक्त, राज्यों और मिलों को इस बार गन्ने की पेराई का नया सीजन 15 अक्टूबर से ही शुरू करने के निर्देश दिए गए हैं, जो आमतौर पर नवंबर में शुरू होता है। पेराई सत्र को समय से पहले शुरू करने का सीधा लाभ यह होगा कि दशहरा और दिवाली के मुख्य त्योहारी दिनों के बीच बाजार में बिल्कुल ताजी और पर्याप्त चीनी उपलब्ध होगी।
अब सवाल यह उठता है कि इन प्रशासनिक और नीतिगत उपायों का असर धरातल पर कब तक दिखेगा? बाजार विश्लेषकों और आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के इन कदमों का असर सितंबर के पहले या दूसरे सप्ताह से खुदरा बाजार में दिखना शुरू हो जाना चाहिए। जब थोक खरीदारों और डीलर्स पर स्टॉक खाली करने का दबाव बढ़ेगा, तो वे बाजार में चीनी की आपूर्ति बढ़ाएंगे, जिससे थोक कीमतों में तत्काल नरमी आएगी। इसके अलावा, एथेनॉल उत्पादन के लिए गन्ने के उपयोग पर लगाए गए अस्थायी नियंत्रणों से भी चीनी मिलों को अधिक चीनी बनाने में मदद मिलेगी। हालांकि, उपभोक्ताओं को यह समझना होगा कि वैश्विक स्तर पर भी चीनी की कीमतें ऊंचे स्तर पर हैं, इसलिए दाम रातों-रात बहुत नीचे नहीं गिरेंगे। लेकिन हां, जो चीनी इस समय 65से 7 0 रुपये तक बिक रही है, उसके वापस 44 से 46 रुपये प्रति किलो के एक स्थिर और न्यायसंगत दायरे में आने की पूरी संभावना है।
त्योहारों पर हर साल चीनी, खाद्य तेल या अन्य आवश्यक वस्तुओं के दामों का बढ़ना एक स्थायी समस्या बनती जा रही है। हर बार सरकार तात्कालिक उपाय जैसे स्टॉक लिमिट लगाना या आयात करना अपनाती है, लेकिन इस समस्या के स्थायी समाधान के लिए एक दीर्घकालिक और संतुलित रणनीति की आवश्यकता है। सरकार को खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा के बीच एक महीन संतुलन बनाना होगा। गन्ने से एथेनॉल बनाने के लक्ष्यों को तय करते समय देश की घरेलू चीनी खपत के सुरक्षित बफर स्टॉक को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। साथ ही, गन्ना एक अत्यधिक पानी की खपत वाली फसल है। जलवायु परिवर्तन के इस दौर में किसानों को ड्रिप इरिगेशन और कम पानी में अधिक उपज देने वाली गन्ने की नई किस्मों की ओर स्थानांतरित करना होगा ताकि मानसून की अनिश्चितता का असर उत्पादन पर न पड़े। इसके अतिरिक्त, देश में चीनी के उत्पादन, मिलों के स्टॉक और बड़े डीलरों के गोदामों की रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग होनी चाहिए ताकि त्योहारों के आने का इंतजार किए बिना, सट्टेबाजी के शुरुआती संकेतों पर ही कार्रवाई की जा सके।
त्योहार किसी भी समाज के सांस्कृतिक गौरव और सामूहिक खुशी के अवसर होते हैं। किसी भी लोकतांत्रिक और कल्याणकारी सरकार की यह प्राथमिक जिम्मेदारी है कि वह इन अवसरों पर आम नागरिक की थाली और त्योहार की मिठास को सुरक्षित रखे। सरकार द्वारा उठाए गए हालिया कदम जैसे स्टॉक लिमिट को आधा करना और शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति देना सही दिशा में उठाए गए मजबूत कदम हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सितंबर की शुरुआत के साथ ही इन कदमों का असर खुदरा दुकानों पर दिखेगा और इस बार त्योहारों की मिठास महंगाई के कड़वेपन से मुक्त रहेगी। बाजार पर निरंतर निगरानी और नियमों का सख्त प्रवर्तन ही इस लगाम को प्रभावी बनाए रख सकता है।





