अशोक भाटिया
भारत केवल एक भू-भाग नहीं, बल्कि एक जीवंत सनातन सांस्कृतिक चेतना है। इस चेतना की अभिव्यक्ति हमारे पर्वों, उत्सवों और त्योहारों में होती है। दीपावली, जो अंधकार पर प्रकाश और अधर्म पर धर्म की विजय का शाश्वत संदेश देती है, वह महज एक कैलेंडर की तारीख नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों की सामूहिक आस्था का प्रतीक है। लेकिन हाल के वर्षों में, विशेषकर समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में, देश के इन पावन त्योहारों को लेकर एक नई और चिंताजनक स्क्रिप्ट लिखी जा रही है। इस स्क्रिप्ट के केंद्र में है—बहुसंख्यक समाज की आस्था को कठघरे में खड़ा करना, सनातन परंपराओं पर चयनात्मक प्रतिबंध थोपना और धर्मनिरपेक्षता के नाम पर सांस्कृतिक प्रतीकों का राजनीतिकरण करना। इस चौतरफा वैचारिक हमले के बीच, भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्व की विचारधारा आज केवल एक राजनीतिक दल या विमर्श की आवाज नहीं, बल्कि सदियों से दबाई गई बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक अस्मिता और आत्मगौरव की ढाल बनकर उभरी है।
स्वतंत्रता के बाद के दशकों में भारत की राजनीति पर एक खास किस्म की ‘छद्म-धर्मनिरपेक्षता’ हावी रही। इस व्यवस्था के तहत बहुसंख्यक हिंदू समाज को अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों पर गर्व करने से रोका गया। तुष्टीकरण की राजनीति इस हद तक बढ़ गई कि अल्पसंख्यकों के त्योहारों पर तो सरकारी सुविधाएं और शुभकामनाएं बढ़-चढ़कर दी जाती थीं, लेकिन जब हिंदुओं के त्योहारों की बात आती थी, तो अचानक पर्यावरण चेतना, पशु क्रूरता और सामाजिक कुरीतियों के उपदेश शुरू हो जाते थे।
दीपावली के आते ही पटाखों से होने वाले प्रदूषण पर हाहाकार मचना, होली पर पानी की बर्बादी का रोना, और जन्माष्टमी या दही-हांडी पर सुरक्षा के नाम पर बंदिशें लगाना—यह एक तय ढर्रा बन चुका था। विडंबना यह थी कि यह ज्ञान केवल हिंदू त्योहारों तक ही सीमित रहता था। नए साल के जश्न, शादियों या अन्य धर्मों के त्योहारों पर होने वाले प्रदूषण या आतिशबाजी पर यही बुद्धिजीवी वर्ग और राजनीतिक दल चुप्पी साध लेते थे। इस चयनात्मक दृष्टिकोण ने बहुसंख्यक समाज के भीतर एक गहरी असुरक्षा और आक्रोश को जन्म दिया, जिसे भाजपा और हिंदुत्व के विचार ने एक सकारात्मक राजनीतिक दिशा दी।
साल 2014 के बाद देश के राजनीतिक और सांस्कृतिक परिदृश्य में एक युगांतरकारी परिवर्तन आया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने ‘विकास भी, विरासत भी’ का जो मंत्र दिया, उसने देश के बहुसंख्यक समाज को अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करना सिखाया। अयोध्या में भव्य राम मंदिर का निर्माण, काशी विश्वनाथ धाम का कायाकल्प, उज्जैन के महाकाल लोक का पुनरुद्धार और केदारनाथ-बद्रीनाथ का जीर्णोद्धार—यह केवल बुनियादी ढांचे का विकास नहीं है, बल्कि यह भारत के सांस्कृतिक पुनर्जागरण का शंखनाद है।इस पुनर्जागरण का सीधा असर त्योहारों को मनाने के तौर-तरीकों और उनके राजनीतिक विमर्श पर पड़ा है। आज जब अयोध्या में सरयू के तट पर लाखों दीये जलते हैं, तो वह केवल एक रिकॉर्ड नहीं होता, बल्कि वह सदियों की गुलामी की मानसिकता से मुक्ति और रामराज्य की उस परिकल्पना का उत्सव होता है, जो हिंदुत्व के मूल में है। भाजपा ने यह स्थापित किया है कि देश की प्रगति उसकी सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर करके नहीं, बल्कि उन्हें और मजबूत करके ही संभव है।
नवंबर 2026 की इस दीपावली पर बने हालिया विवादों को देखें तो दिल्ली-NCR में पटाखों पर पूर्ण प्रतिबंध या मुंबई में ‘पर्यावरण-अनुूल’ दिवाली के नाम पर हिंदू परंपराओं को निशाना बनाने की कोशिशें इस नई स्क्रिप्ट का हिस्सा हैं। मुंबई में एक सेलिब्रिटी के माध्यम से हिंदुओं को त्योहार मनाने का तरीका सिखाने के प्रयास पर जब भाजपा नेताओं ने आपत्ति जताई, तो इसे विपक्ष द्वारा ‘ध्रुवीकरण’ का नाम दे दिया गया। लेकिन सवाल यह है कि क्या अपनी आस्था की रक्षा करना और अपनी परंपराओं पर थोपे जा रहे ज्ञान का विरोध करना ध्रुवीकरण है?
सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस साल 7 और 8 नवंबर को नियमों के साथ ‘ग्रीन पटाखे’ जलाने की सीमित छूट देना इस बात का प्रमाण है कि पूर्ण प्रतिबंध व्यावहारिक नहीं था और इससे केवल एक समुदाय विशेष की भावनाओं को ठेस पहुंच रही थी। विपक्ष के नेता जब हिंदुत्व को एक आक्रामक या विभाजनकारी विचारधारा के रूप में पेश करने की कोशिश करते हैं, तो वे भूल जाते हैं कि हिंदुत्व की प्रकृति कभी आक्रामक नहीं रही। हिंदुत्व ‘वसुधैव कुटुंबकम’ और ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ के दर्शन पर आधारित है। लेकिन इसका मतलब यह कतई नहीं है कि अपनी ही धरती पर सनातनी परंपराओं को दोयम दर्जे का व्यवहार सहना पड़े। जब विपक्ष के वरिष्ठ नेता दीपावली जैसे पवित्र अवसर पर भी हिंदू पहचान और हिंदुत्व को लेकर विवादित बयान देते हैं, तो वे अनजाने में ही सही, उस बहुसंख्यक विरोधी स्क्रिप्ट को आगे बढ़ा रहे होते हैं जिसका उद्देश्य समाज को बांटना है।
विपक्ष का आरोप है कि भाजपा त्योहारों का उपयोग राजनीतिक लाभ और वोटों के ध्रुवीकरण के लिए करती है। लेकिन यदि निष्पक्षता से विश्लेषण किया जाए, तो भाजपा ने केवल उस शून्य को भरा है जो कांग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों ने अपनी तुष्टीकरण की नीतियों के कारण पैदा किया था। विपक्ष के लिए सेकुलरिज़्म का मतलब हमेशा से बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को दबाकर रखना रहा है ताकि एक निश्चित वोट बैंक सुरक्षित रहे। इसके विपरीत, हिंदुत्व की राजनीति ने बहुसंख्यक समाज को एकजुट किया है और उन्हें यह अहसास कराया है कि उनकी आस्था का भी इस देश में उतना ही अधिकार और सम्मान है जितना किसी और का।
दीपावली के मंच से आज जो विमर्श निकल रहा है, वह ध्रुवीकरण का नहीं बल्कि ‘सांस्कृतिक स्वाभिमान’ का है। यह विमर्श इस बात का है कि भारत की आत्मा उसके त्योहारों में बसती है। यदि हम अपने त्योहारों की रौनक को, उनकी परंपराओं को राजनीति की वेदी पर चढ़ा देंगे, तो हम एक समाज के रूप में अपनी पहचान खो देंगे। भाजपा ने त्योहारों को राष्ट्रीय गौरव से जोड़ा है। आज सेना के जवानों के साथ प्रधानमंत्री का दिवाली मनाना राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक मूल्यों के उसी सुंदर संगम को दर्शाता है, जो हिंदुत्व की सोच की रीढ़ है।
अल्टीमेटली, त्योहारों के मंच पर जो स्क्रिप्ट लिखी जा रही है, उसका अंतिम अध्याय जनता ही तय करेगी। भारत का आम नागरिक अब यह भली-भांति समझ चुका है कि कौन आस्था के साथ खड़ा है और कौन केवल चुनावी रोटियां सेकने के लिए त्योहारों का इस्तेमाल कर रहा है। हिंदुत्व का उद्देश्य किसी अन्य धर्म या संस्कृति को नीचा दिखाना नहीं है, बल्कि अपनी समृद्ध विरासत का संरक्षण करना है।
दीपावली प्रकाश का पर्व है, और यह प्रकाश तब तक अधूरा है जब तक देश का बहुसंख्यक समाज आत्मगौरव और स्वतंत्रता के साथ अपनी परंपराओं का निर्वाह न कर सके। छद्म-धर्मनिरपेक्षता के पैरोकारों को यह समझना होगा कि भारत में यदि लोकतंत्र और विविधता सुरक्षित है, तो उसका सबसे बड़ा कारण सनातन संस्कृति की सहिष्णुता ही है। इसलिए, त्योहारों को विवाद का अखाड़ा बनाने के बजाय, उनकी मूल भावना का सम्मान किया जाना चाहिए। भाजपा और हिंदुत्व के नेतृत्व में चल रहा यह सांस्कृतिक आंदोलन भारत को एक ‘विश्वगुरु’ बनाने की दिशा में अग्रसर है, जहाँ आधुनिक प्रगति और प्राचीन विरासत दोनों कंधे से कंधा मिलाकर चलेंगे। यही नए भारत की नियति है और यही इस महापर्व का वास्तविक संदेश है।





