जेनरेशन ज़ेड फिर से परंपराओं की ओर: पारंपरिक दिवाली मनाने का बढ़ता चलन

Generation Z back to traditions: Growing trend of celebrating traditional Diwali

डॉ. विजय गर्ग

कई वर्षों से यह धारणा बनी हुई है कि युवा पीढ़ी, विशेषकर जेनरेशन ज़ेड (Gen Z), पारंपरिक रीति-रिवाजों की अपेक्षा आधुनिक जीवनशैली, डिजिटल मनोरंजन और फैशनेबल आयोजनों को अधिक पसंद करती है। लेकिन अब एक सुखद बदलाव देखने को मिल रहा है। अनेक युवा पारंपरिक तरीके से दिवाली मनाने की ओर लौट रहे हैं। वे पारिवारिक मेल-मिलाप, मिट्टी के दीयों, पारंपरिक मिठाइयों, सांस्कृतिक मूल्यों और पर्यावरण के अनुकूल उत्सवों के महत्व को फिर से समझ रहे हैं।

दिवाली केवल रोशनी का त्योहार नहीं है, बल्कि यह बुराई पर अच्छाई, अज्ञान पर ज्ञान और अंधकार पर प्रकाश की विजय का प्रतीक है। पीढ़ियों से परिवार इस त्योहार को घरों की सफाई और सजावट, पारंपरिक दीये जलाकर, घर में मिठाइयाँ बनाकर, पूजा-पाठ करके तथा रिश्तेदारों और पड़ोसियों के साथ खुशियाँ बाँटकर मनाते आ रहे हैं। ये परंपराएँ पारिवारिक संबंधों को मजबूत बनाती हैं और हमारी सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखती हैं।

दिलचस्प बात यह है कि आज जेनरेशन ज़ेड के अनेक युवा इन पारंपरिक तरीकों को अपना रहे हैं। महँगी सजावट, बिजली की चमकदार लड़ियों और दिखावे वाली पार्टियों के बजाय कुछ युवा मिट्टी के दीयों, रंग-बिरंगी रंगोलियों, फूलों और हाथ से बनी सजावटी वस्तुओं से अपने घरों को सजाना पसंद करते हैं। वे पारंपरिक पहनावे, क्षेत्रीय व्यंजनों, पारिवारिक रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक गतिविधियों में भी रुचि ले रहे हैं।

सोशल मीडिया ने भी इस बदलाव में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। युवा पारंपरिक सजावट, घर में बनाई गई मिठाइयों, पारिवारिक समारोहों और पर्यावरण के अनुकूल दिवाली से संबंधित तस्वीरें और वीडियो साझा करते हैं। जिन डिजिटल प्लेटफॉर्मों को कभी युवाओं को परंपराओं से दूर करने के लिए जिम्मेदार माना जाता था, वही आज सांस्कृतिक विरासत को बढ़ावा देने का माध्यम बन रहे हैं।

एक और उत्साहजनक बदलाव पर्यावरण के प्रति बढ़ती जागरूकता है। अनेक युवा वायु और ध्वनि प्रदूषण कम करने वाले तरीकों से दिवाली मनाने को प्राथमिकता दे रहे हैं। वे मिट्टी के दीयों, प्राकृतिक सजावट और सामूहिक आयोजनों को अधिक महत्व देते हैं। यह सोच दर्शाती है कि परंपराएँ और आधुनिक वैज्ञानिक चेतना एक-दूसरे के पूरक हो सकते हैं।

पारंपरिक दिवाली की ओर बढ़ता रुझान भावनात्मक संतुष्टि की तलाश को भी दर्शाता है। तेज गति वाली डिजिटल दुनिया में युवा अब माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और अन्य रिश्तेदारों के साथ समय बिताने के महत्व को समझ रहे हैं। परिवार के बुजुर्गों से पुरानी यादें और कहानियाँ सुनना, मिलकर पारंपरिक व्यंजन बनाना और सांस्कृतिक गतिविधियों में भाग लेना ऐसी यादें पैदा करता है, जिनकी जगह कोई महँगा उपहार या ऑनलाइन मनोरंजन नहीं ले सकता।

हालाँकि, यह कहना उचित नहीं होगा कि जेनरेशन ज़ेड का प्रत्येक युवा एक ही तरीके से दिवाली मनाता है। उनकी पसंद पारिवारिक पृष्ठभूमि, क्षेत्र, व्यक्तिगत विश्वासों और जीवनशैली के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि पारंपरिक उत्सव युवाओं के जीवन में फिर से अपनी जगह बना रहे हैं।

माता-पिता और दादा-दादी, नाना-नानी को इस सकारात्मक बदलाव को बिना किसी दबाव के प्रोत्साहित करना चाहिए। परंपराएँ तभी सार्थक बनती हैं, जब युवा उनके महत्व को समझकर अपनी इच्छा से अपनाते हैं। परिवारों को त्योहारों से जुड़े दया, सहयोग, कृतज्ञता, समानता और प्रकृति के प्रति सम्मान जैसे मूल्यों से भी बच्चों को परिचित कराना चाहिए।

दिवाली स्थानीय कारीगरों, कुम्हारों और छोटे व्यापारियों की सहायता करने का भी एक अच्छा अवसर है। हाथ से बने दीये, पारंपरिक सजावटी वस्तुएँ और स्थानीय उत्पाद खरीदकर हम अपनी सांस्कृतिक पहचान के साथ-साथ स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत कर सकते हैं।

अंततः, जेनरेशन ज़ेड का पारंपरिक दिवाली की ओर लौटना एक उत्साहजनक संदेश देता है कि आधुनिक बनने का अर्थ अपनी जड़ों को भूल जाना नहीं है। तकनीक, आधुनिक जीवनशैली और सांस्कृतिक परंपराएँ एक साथ आगे बढ़ सकती हैं।

दिवाली की असली रौनक बिजली की लड़ियों की चमक या पटाखों के शोर में नहीं, बल्कि रिश्तों की आत्मीयता, मिट्टी के दीयों की रोशनी, खुशियाँ बाँटने की भावना और मानवता के प्रकाश में है। जब युवा पीढ़ी इन मूल्यों को अपनाती है, तो दिवाली और भी सार्थक, पर्यावरण के अनुकूल तथा चिरस्थायी बन जाती है।