संजय सक्सेना
संसद से वंदेमातरम गीत को पूरा गाना अनिवार्य करने का कानून बनने के बाद राजनीतिक स्वार्थ के चलते कांग्रेस के कार्यक्रमों और कुछ अन्य सार्वजनिक मंचों तक से राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के पूर्ण गायन नहीं किए जाने को लेकर छिड़ा सियासी घमासान देश की राजनीति का सबसे बड़ा मुद्दा बनता जा रहा है। इस विवाद के मूल में केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं, बल्कि वैचारिक भिन्नता और चुनावी समीकरणों की गहरी परतें छिपी हैं। वंदे मातरम् पर कांग्रेस की सीडब्ल्यूसी ने एक प्रस्ताव पास किया है, जिसके तहत कहा गया है कि वह राष्ट्रगीत के सिर्फ दो पद ही गाएगी। मामले पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कांग्रेस पर हमला करते हुए कहा कि कांग्रेस वर्किंग कमेटी ने देश विरोधी फैसला लिया है। उन्होंने कहा, ‘1937 के अपने प्रस्ताव को मानते हुए कांग्रेस ने वंदे मातरम् के सिर्फ दो पद गाने का फैसला किया। मैं देश को याद दिलाना चाहता हूं कि 1937 में मुसलमानों को खुश करने के लिए वंदे मातरम् को बांटकर कांग्रेस ने देश के बंटवारे की नींव रखी थी।’ कांग्रेस द्वारा केवल शुरुआती दो छंद ही गाने की परंपरा का हवाला देना और बीजेपी द्वारा इसे राष्ट्रीय अस्मिता से जोड़कर आक्रामक रुख अपनाना इस बहस को और तेज कर रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह और सत्ता पक्ष के अन्य वरिष्ठ नेताओं ने इस पर तीखी आपत्ति जताई है, जिससे यह मुद्दा और अधिक संवेदनशील हो गया है।
उधर, कांग्रेस पार्टी और उसके नेतृत्व का यह तर्क है कि वे ऐतिहासिक परंपराओं का निर्वहन कर रहे हैं, जो स्वतंत्रता संग्राम के दौर से चली आ रही हैं। पार्टी का पक्ष है कि महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू और सरदार पटेल जैसे राष्ट्रनायकों के समय से ही वंदे मातरम् के शुरुआती अंशों को गाने की परिपाटी रही है। इसके अलावा, इस विवाद के पीछे ऐतिहासिक और वैचारिक कारण भी हैं। आलोचकों और जानकारों का मानना है कि गीत के बाद के छंदों में कुछ ऐसी पौराणिक और सांस्कृतिक छवियां हैं, जिन्हें लेकर स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान भी अलग-अलग विचार रहे थे। कांग्रेस यह मानती है कि विविधता से भरे इस देश में सभी वर्गों को साथ लेकर चलने के लिए एक संतुलित दृष्टिकोण अपनाना आवश्यक है, ताकि किसी भी समुदाय की भावनाओं को ठेस न पहुंचे। हालांकि, आलोचकों का यह भी मानना है कि इस नीति के पीछे एक बड़ा कारण अल्पसंख्यक मतदाताओं, विशेषकर मुस्लिम समुदाय का राजनीतिक समर्थन अपने पाले में सुरक्षित रखना भी है, जो गीत के पूर्ण रूप को लेकर असहज महसूस करता है।दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी इस मुद्दे पर पूरी तरह हमलावर मुद्रा में है। ऐसा लगता है उसे एक मौका मिल गया है। बीजेपी का यह स्पष्ट आरोप है कि कांग्रेस अपनी पुरानी तुष्टीकरण की राजनीति के तहत राष्ट्रीय प्रतीकों और राष्ट्रीय गीत का अपमान कर रही है। हाल ही में संसद द्वारा राष्ट्रीय गीत के अपमान से जुड़े कानूनों और प्रावधानों को कड़ा किए जाने के बाद यह विवाद और बढ़ गया है। सत्ता पक्ष का यह भी तर्क है कि देश की आजादी के इतने दशकों बाद भी राष्ट्रीय गीतों को लेकर इस तरह की संकीर्ण राजनीतिक सोच रखना राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान लगाता है। बीजेपी इस मुद्दे के जरिए राष्ट्रवादी नैरेटिव को और अधिक मजबूत करने का प्रयास कर रही है, ताकि बहुसंख्यक समाज की भावनाओं को एकजुट किया जा सके।
कुल मिलाकर इस पूरे घटनाक्रम का भारतीय राजनीति पर दूरगामी प्रभाव पड़ना तय माना जा रहा है। देश का राजनीतिक ध्रुवीकरण और अधिक तीव्र हो सकता है। एक तरफ जहां बीजेपी राष्ट्रवादी और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को धार देते हुए हिंदू मतदाताओं को और अधिक गहराई से अपने पक्ष में लामबंद करने की कोशिश करेगी, वहीं कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों के सामने अपने पारंपरिक वैचारिक आधार को बचाने की चुनौती होगी। इस प्रकार के वैचारिक टकराव अक्सर जमीन पर वैचारिक स्पष्टता पैदा करने के साथ-साथ वोटों के ध्रुवीकरण को भी जन्म देते हैं।विपक्षी दलों के गठबंधन और क्षेत्रीय क्षत्रपों की बात करें तो समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे दलों का मुस्लिम मतदाता आधार इस पूरी बहस के बाद कांग्रेस या गठबंधन के पक्ष में और अधिक मजबूती से खड़ा दिखाई दे सकता है। उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां मुस्लिम मतदाता चुनावी नतीजों को बड़े पैमाने पर प्रभावित करते हैं, वहां इस तरह के मुद्दे ध्रुवीकरण को तेज करते हैं। जब राष्ट्रीय स्तर पर इस प्रकार के सांस्कृतिक और वैचारिक विषय उठते हैं, तो क्षेत्रीय दल भी अपनी रणनीतियों को उसी के अनुसार ढालते हैं ताकि उनका अल्पसंख्यक वोट बैंक सुरक्षित रहे। यदि अगले साल होने वाले विधानसभा चुनावों, विशेषकर उत्तर प्रदेश के संदर्भ में बात करें, तो इस तरह के भावनात्मक और सांस्कृतिक मुद्दे चुनाव के एजेंडे को पूरी तरह बदल सकते हैं। इस प्रकार के ज्वलंत मुद्दे जमीन पर जमीनी कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने का काम करते हैं, जहां एक तरफ बहुसंख्यक वोटर अपनी अस्मिता के प्रश्न पर लामबंद हो सकते हैं, वहीं दूसरी तरफ अल्पसंख्यक वर्ग भी अपनी सुरक्षा और राजनीतिक हितों को देखते हुए विपक्षी दलों की ओर गोलबंद हो सकता है। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा तेज हो गई है कि कैसे यह सांस्कृतिक बहस आगामी चुनावी समीकरणों को प्रभावित कर सकती है। उत्तर प्रदेश में जहाँ जातिगत समीकरण और सामाजिक लामबंदी हमेशा से चुनावों की धुरी रहे हैं, वहीं ऐसे भावनात्मक और वैचारिक मुद्दे ध्रुवीकरण की प्रक्रिया को और तीव्र कर देते हैं।





