पर्यूषण : बाहर नहीं, भीतर की सफाई का पर्व

Discussions held on the conservation and promotion of the Himalayas' rich natural and cultural heritage, as well as the sustainable development of Himalayan regions, during the ‘Himalayo Naam Nagadhiraj’ program

जब मन का मैल धुलता है, तभी रिश्तों में मिठास और समाज में शांति जन्म लेती है

सत्य भूषण शर्मा

भारत की पर्व-परंपरा केवल उत्सवधर्मिता की परंपरा नहीं है। हमारे पर्व जीवन को दिशा देने वाले पड़ाव भी हैं। पर्यूषण पर्व इसी जीवन-दर्शन का एक अनुपम उदाहरण है। यह हमें बाहरी संसार की चकाचौंध से कुछ समय के लिए हटकर अपने भीतर झाँकने, अपनी भूलों को स्वीकार करने और जीवन को अधिक संयमित, संवेदनशील एवं सार्थक बनाने का अवसर देता है।

आज मनुष्य के पास सुख-सुविधाओं की कमी नहीं है, लेकिन सुकून की कमी अवश्य दिखाई देती है। साधन बढ़े हैं, पर संतोष घटा है। संपर्क के साधन बढ़े हैं, लेकिन संवाद कम हुआ है। हम दुनिया से जुड़े हुए हैं, फिर भी अपने ही परिवार और अपने आसपास के लोगों से कहीं-कहीं दूर होते जा रहे हैं। ऐसे समय में पर्यूषण का संदेश हमारे लिए विशेष महत्व रखता है।

इस पर्व का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है—आत्ममंथन। हम दूसरों के दोष खोजने में जितनी ऊर्जा लगाते हैं, उसका थोड़ा-सा हिस्सा भी यदि अपनी कमियों को पहचानने में लगा दें तो जीवन में बड़ा परिवर्तन आ सकता है। पर्यूषण हमें यही साहस देता है कि हम स्वयं से प्रश्न करें—क्या मेरे व्यवहार से किसी को पीड़ा हुई? क्या मेरे शब्दों ने किसी का मन दुखाया? क्या मेरे स्वार्थ ने किसी दूसरे के अधिकार को प्रभावित किया?

इन प्रश्नों के ईमानदार उत्तर ही वास्तविक आत्मशुद्धि की शुरुआत हैं।

क्षमा—रिश्तों को जोड़ने वाली शक्ति
पर्यूषण का संदेश क्षमा के बिना अधूरा है। जैन परंपरा में क्षमावाणी और ‘मिच्छामि दुक्कडम्’ की भावना अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका व्यापक मानवीय अर्थ यही है कि हम जाने-अनजाने हुई अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगें और दूसरों की भूलों को भी हृदय से क्षमा करने का प्रयास करें।

आज समाज में असहमति को स्वीकार करने की क्षमता कम होती जा रही है। परिवारों में छोटी-छोटी बातों पर मनमुटाव, सामाजिक जीवन में बढ़ती कटुता और डिजिटल माध्यमों पर आक्रामक भाषा इसके उदाहरण हैं। ऐसे वातावरण में क्षमा केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि सामाजिक आवश्यकता बन गई है।

क्षमा का अर्थ अन्याय को स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ है—मन में स्थायी द्वेष को स्थान न देना। जो व्यक्ति क्षमा कर देता है, वह दूसरे से अधिक स्वयं को मुक्त करता है।

अहिंसा से आगे—विचारों में भी अहिंसा
अहिंसा को अक्सर केवल शारीरिक हिंसा से जोड़कर देखा जाता है, जबकि इसका व्यापक अर्थ हमारे शब्दों और विचारों से भी जुड़ा है। किसी को अपमानित करना, अनावश्यक कटु टिप्पणी करना, झूठ फैलाना या किसी की प्रतिष्ठा को चोट पहुँचाना भी सामाजिक हिंसा का ही एक रूप माना जा सकता है।

पर्यूषण हमें अपने शब्दों पर संयम रखने की प्रेरणा देता है। आज जब एक संदेश या टिप्पणी कुछ ही क्षणों में हजारों लोगों तक पहुँच सकती है, तब वाणी की अहिंसा और भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

अपरिग्रह : उपभोग की अंधी दौड़ का विकल्प
आज की अर्थव्यवस्था और जीवनशैली ने हमारी आवश्यकताओं को इच्छाओं और इच्छाओं को लालच में बदलने का रास्ता खोल दिया है। अधिक से अधिक पाने की दौड़ में मनुष्य प्रकृति का असीम दोहन कर रहा है।

जैन दर्शन का अपरिग्रह हमें सीमित संसाधनों वाली धरती पर संतुलित जीवन जीने की प्रेरणा देता है। इसका अर्थ विकास का विरोध नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण उपभोग है। जितना आवश्यक हो उतना लेना और शेष के प्रति जिम्मेदारी निभाना—आज के पर्यावरण संकट के दौर में यह विचार अत्यंत प्रासंगिक है।

पर्यूषण और नई पीढ़ी
इस पर्व की सार्थकता तभी बढ़ेगी जब इसके मूल्यों को नई पीढ़ी तक पहुँचाया जाए। बच्चों को केवल पर्व की धार्मिक विधियाँ बताना पर्याप्त नहीं। उन्हें यह समझाना भी जरूरी है कि क्षमा क्यों आवश्यक है, संयम क्यों जरूरी है, अहिंसा का व्यापक अर्थ क्या है और प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारी क्या है।

यदि घर में बच्चे अपने माता-पिता को गलती स्वीकार करते, क्षमा माँगते और दूसरों को सम्मान देते देखेंगे, तो वे इन मूल्यों को किताबों से नहीं, जीवन से सीखेंगे।

आज जरूरत मनुष्य को बदलने की है
हम कानून बनाकर अपराध रोक सकते हैं, तकनीक से समस्याओं को कम कर सकते हैं और आर्थिक विकास से जीवन को सुविधाजनक बना सकते हैं; लेकिन समाज में स्थायी शांति तभी आएगी जब मनुष्य के भीतर परिवर्तन होगा।

पर्यूषण इसी आंतरिक परिवर्तन का पर्व है। यह हमें सिखाता है कि सच्ची विजय किसी दूसरे को हराने में नहीं, बल्कि अपने क्रोध, अहंकार, लोभ और असंयम पर विजय पाने में है।

इसलिए पर्यूषण को केवल एक धार्मिक पर्व के रूप में मनाने के बजाय इसे आत्मनिरीक्षण का पर्व बनाया जाए। इस अवसर पर हम कम से कम एक बुरी आदत छोड़ने, एक टूटे रिश्ते को जोड़ने, किसी से क्षमा माँगने, किसी को क्षमा करने और प्रकृति के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने का संकल्प लें।

क्योंकि अंततः दुनिया को बदलने की शुरुआत किसी बड़े मंच से नहीं, मनुष्य के अपने मन से होती है।

पर्यूषण हमें यही पुकार सुनाता है—
मन स्वच्छ होगा तो विचार स्वच्छ होंगे, विचार स्वच्छ होंगे तो व्यवहार स्वच्छ होगा और व्यवहार स्वच्छ होगा तो समाज में शांति का मार्ग स्वयं प्रशस्त होगा।

यही पर्यूषण की वास्तविक साधना है और यही इसकी सार्वभौमिक प्रासंगिकता भी।