दीवाली के अवसर पर आतिशबाजी का चलन बहुत पुराना माना जाता है लेकिन पटाखों की अंधाधुंध आतिशबाजी अब हमारी सांसों, स्वास्थ्य और पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बनती जा रही है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में केवल हरित पटाखों के उपयोग की अनुमति है लेकिन विडंबना है कि प्रतिबंधों और दिशा-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक पटाखों की बिक्री बाजारों से लेकर गली-मोहल्लों तक धड़ल्ले से जारी रहती है। पारंपरिक पटाखों के धुएं में सल्फर डाईऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोक्साइड, ऐस्बेस्टॉस के अलावा विषैली गैसों के रासायनिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए भी अनुकूल परिस्थितियां पैदा करते हैं।
योगेश कुमार गोयल
दीवाली, उजालों का त्योहार, खुशियों का स्वागत! लेकिन जब यही जश्न हमारी सांसों को घुटन से भर दे और हमारे वातावरण को जहर बना दे, तब कहीं न कहीं हमारी संवेदनशीलता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। सदियों से भारत में दीयों की रोशनी और हल्की आतिशबाजी के साथ दीपोत्सव मनाने की परम्परा रही है। यह उत्सव प्रतीक है बुराई पर अच्छाई की विजय का, अंधकार पर प्रकाश का, लेकिन पिछले कुछ दशकों में इसका स्वरूप इस कदर बदल गया है कि अब यह ‘आतिशबाजी का युद्ध’ प्रतीत होता है। जिस उत्सव की आत्मा प्रकाश और शांति में निहित थी, वह अब शोर, धुआं और प्रदूषण का पर्याय बन गया है। बीते वर्षों में अत्यधिक विस्फोटक पटाखों की भरमार ने इस पवित्र पर्व की सादगी को निगल लिया है। यही पटाखे वायु प्रदूषण को भयावह स्तर तक पहुंचाने और पहले से बिगड़ती पर्यावरणीय स्थिति को बेहद विकराल बनाने में बड़ी भूमिका निभाते हैं।
तेज रोशनी वाले और बारूद से लबालब पारंपरिक पटाखे पलभर में न केवल जान-माल का भारी नुकसान कर डालते हैं बल्कि वायु, ध्वनि और मिट्टी, तीनों को गहराई से प्रदूषित करते हैं। इन पटाखों में बेरियम, कॉपर, गंधक, सीसा जैसे रासायनिक तत्व होते हैं, जो फूटने के बाद 100 घंटे तक वातावरण में घुले रहते हैं। बेरियम रेडियोधर्मी और विषैला होता है, कॉपर के यौगिक कैंसर का खतरा बढ़ाते हैं और गंधक श्वसन रोगों को जन्म देता है। पटाखों के धुएं में सल्फर डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड, कार्बन मोनोऑक्साइड जैसी जहरीले गैसें होती हैं, जो फेफड़ों, दिल और आंखों पर सीधा प्रभाव डालती हैं। इनसे सिरदर्द, एलर्जी, खांसी, ब्रोंकाइटिस, न्यूमोनिया, अनिद्रा और यहां तक कि कैंसर जैसी असाध्य बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है। ध्वनि प्रदूषण का खतरा भी कम नहीं है। कई स्थानों पर पटाखों की आवाज 130 से 150 डेसीबल तक पहुंच जाती है, जो कानों के लिए खतरनाक है। इससे बहरेपन, तनाव, नींद की कमी और हृदय की धड़कनों में असामान्यता जैसे रोग तेजी से बढ़ते हैं।
मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षी और पालतू जानवर भी इस शोर और प्रदूषण से अत्यधिक प्रभावित होते हैं। शोध बताते हैं कि पटाखों की तीव्र ध्वनि कुत्तों सहित अन्य जीवों की सुनने की क्षमता को स्थायी रूप से क्षति पहुंचा सकती है। वायु प्रदूषण का एक और गंभीर प्रभाव पुरुषों के प्रजनन स्वास्थ्य पर देखा गया है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार, प्रदूषण के कारण वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या में 40 प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई है, जिससे नपुंसकता का खतरा बढ़ रहा है। देश में हर दसवां व्यक्ति अस्थमा का शिकार है और प्रदूषित हवा गर्भ में पल रहे बच्चों तक के लिए खतरा बन चुकी है। ऐसे में, जब पहले से ही पराली, औद्योगिक धुआं, टूटी-फूटी सड़कों की धूल और निर्माण कार्यों के कारण हवा जहरीली हो चुकी हो, तब एक रात की अंधाधुंध आतिशबाजी इस संकट को और भयावह बना देती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने पटाखों से होने वाले प्रदूषण की गंभीरता और पर्यावरण संरक्षण की अनिवार्यता को देखते हुए हरित पटाखों के इस्तेमाल तथा उनकी बिक्री को लेकर महत्वपूर्ण दिशा-निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने स्पष्ट किया है कि स्वच्छ हवा और प्रदूषण नियंत्रण की जिम्मेदारी केवल दिल्ली-एनसीआर तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पूरे देश का सामूहिक दायित्व है। न्यायालय ने हरित पटाखों के इस्तेमाल की अनुमति देते हुए उनकी गुणवत्ता, प्रमाणन और बिक्री पर कड़ी निगरानी रखने पर जोर दिया है। अदालत ने अपने 29 अक्तूबर के आदेश में कुछ अतिरिक्त और कड़े प्रावधान लागू किए हैं, जिसके तहत दिल्ली-एनसीआर में केवल उन्हीं हरित पटाखों के निर्माण और बिक्री की अनुमति दी गई है, जिन्हें वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान तथा पैट्रोलियम एवं विस्फोटक सुरक्षा संगठन से वैध प्रमाणन प्राप्त है और जो संस्थान की अधिकृत सूची में शामिल हैं। प्रत्येक पैकेट पर उत्पाद-विशिष्ट क्यूआर कोड अनिवार्य किया गया है, जिसके माध्यम से निर्माता, पंजीकरण, लाइसेंस और परीक्षण प्रमाणपत्र की प्रामाणिकता जांची जा सकेगी। बेरियम युक्त पटाखों तथा लड़ियों और पटाखों की मालाओं के निर्माण एवं बिक्री पर भी रोक लगाई गई है। अवैध पटाखों की बिक्री अथवा आदेशों के उल्लंघन पर लाइसेंस रद्द करने, पटाखे जब्त करने और दोषियों के विरुद्ध अभियोजन की कार्रवाई करने के निर्देश भी दिए गए हैं। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया है कि केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं बल्कि उनका प्रभावी क्रियान्वयन और नागरिकों की जिम्मेदार भागीदारी भी उतनी ही आवश्यक है।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय के स्पष्ट आदेशों के अनुसार केवल हरित पटाखों के उपयोग की ही अनुमति है लेकिन विडंबना यह है कि प्रतिबंधों और दिशा-निर्देशों की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुए प्रदूषण फैलाने वाले पारंपरिक पटाखों की बिक्री बाजारों से लेकर गली-मोहल्लों तक धड़ल्ले से जारी रहती है। कानून और निर्णय केवल तभी सार्थक हैं, जब नागरिक भी अपनी जिम्मेदारी समझें। भारत में पहले से ही वायु एवं ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण कानून लागू हैं लेकिन उनकी पालना सुनिश्चित करने में प्रशासन की उदासीनता अक्सर नजर आती है। पर्यावरणीय मामलों में केवल न्यायपालिका नहीं, जनता की भूमिका भी निर्णायक है। जब लोग ही संवेदनशील नहीं होंगे तो अदालतें भी पर्यावरण को अकेले नहीं बचा सकती। हमें यह समझना होगा कि दीवाली की असली सुंदरता पटाखों के धमाके में नहीं बल्कि दीयों की उजली लौ में है। यह वह पर्व है, जो हमारे मन, घर और समाज को प्रकाशमान करता है, न कि उन्हें धुएं से ढ़क देता है। दीवाली पर साफ-सफाई की परंपरा रही है पर अब वही दिन कचरे, बारूद और प्लास्टिक की परतों में बदल जाता है। यह कैसा उत्सव है, जो हमारी सांसों को छीन लेता है?
अब वक्त आ गया है कि हम अपनी परंपराओं को आधुनिक विवेक से जोड़ें। यदि हमें पटाखों का उपयोग करना है तो केवल हरित पटाखों का सीमित और नियंत्रित उपयोग करें। दीयों से घर-आंगन जगमगाएं, एक-एक पौधा लगाएं, बच्चों को सिखाएं कि असली रोशनी वही है, जो टिकाऊ हो, जो जीवन दे, न कि जहर घोले। ऑस्ट्रेलिया में दिसंबर में मनाए जाने वाले एक त्योहार पर लोग आतिशबाजी करते हैं लेकिन उसी दिन हर परिवार एक पौधा भी लगाता है। यह एक छोटी-सी परंपरा है पर उसका पर्यावरणीय संदेश गहरा है। भारत भी ऐसी परंपराओं को अपना सकता है, जहां उत्सव और पर्यावरण दोनों का संतुलन बना रहे। आज जब दिल्ली और अन्य शहरों की हवा पहले से ही जहरीली हो चुकी है, हमें यह स्वीकार करना होगा कि एक रात का यह जश्न हमारे भविष्य की कीमत पर नहीं होना चाहिए। हमें अपने बच्चों को वह दीपावली देनी है, जो केवल आंखों को नहीं, दिलों को भी रोशनी दे। दीवाली दीयों की हो, धमाकों की नहीं क्योंकि असली रोशनी वही है, जो प्रकाश के संग करुणा और जिम्मेदारी का संदेश फैलाए।





