” जिस जंगल में अमृत तुल्य दवाएं उगती थी, हमने वहां नीलगिरी, सागौन और कंक्रीट उगा दिया, वनभूमि पट्टटा के कागज के टुकड़े के लिए हमने हजारों साल पुराना जंगल काट डाले।”
डॉ. राजाराम त्रिपाठी
कृषि विशेषज्ञ, पर्यावरण एवं आदिवासी सरोकारों के लेखक तथा नेशनल मेडिसिनल प्लांट बोर्ड आयुष मंत्रालय के सदस्य भी हैं।
पांच मुख्य बातें:-
- मंजूर गोड़ी के साथ ही बस्तर की आधा दर्जन महत्वपूर्ण वनौषधियां विलुप्ति के कगार पर।
- सदियों पुराने अनमोल जंगल काटकर बनाए एकल वृक्षारोपण के रेगिस्तान : सागौन-नीलगिरी ने घटाई जैव-विविधता।
- राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड: 26 साल बाद भी सफलता पर सवाल, कृषि या उद्यानिकी के बजाय इसे वनविभाग को क्यों नहीं सौंपा?
- जंगल बचेंगे, तभी अनमोल वनौषधियां, संचित जनजातीय औषधीय ज्ञान बचेगा और पर्यावरण भी।
- दूषित ‘वन भूमि पट्टा नीति’ ने जंगलों के सहचर, सतत पहरेदार आदिवासियों की कुल्हाड़ी को जंगल के खिलाफ खड़े कर दिया।
कभी बस्तर के जंगल केवल लकड़ी और लोहा के भंडार मात्र नहीं थे। वे नाना प्रकार की अनमोल वनोपज के अक्षय स्रोत के साथ ही एक ऐसा खुला औषधालय भी थे, जहां न कोई पर्ची कटती थी, न कोई काउंटर होता था और न कोई कैशियर। गांव से लगा हुआ जंगल ही उसकी औषधि-दुकान (फार्मेसी) था और आदिवासी वैद्य, सिरहा-गुनिया उसके चिकित्सक। आसपास के गांव के साधारण बीमार लोग अपने परिजनों के साथ चलकर आते थे और गंभीर बीमार लोग खटिया या डोली में ढोकर लाए जाते थे। बीमारी या समस्या बताने भर से उसका सटीक इलाज जंगल के विभिन्न वृक्ष, पौधे, लता अथवा झाड़ी की पत्ती, फल, फूल, छाल, कंद या जड़ से तत्काल शुरू हो जाता था।
मैंने अपने बचपन में बस्तर में ऐसे कई जनजातीय वैद्य, जिन्हें हमारी स्थानीय भाषा में सिरहा-गुनिया कहा जाता था, देखे हैं, जिनके घरों के सामने बीसियों परिवार अपने मरीज को खटिया या बांस की बनी डोली पर बिठाकर उसे ढोकर लेकर आते थे। वे अपने साथ अपने भोजन के लिए पर्याप्त अनाज आदि लेकर आते थे और वहीं पर आग जलाकर अपना खाना बनाते थे। मौसम के अनुरूप खुली जगह अथवा किसी बड़ी झोपड़ी में सोने की सामूहिक व्यवस्था हो जाती थी। और एक दिन वह मरीज पूरी तरह से ठीक होकर खुद पैदल चलकर वापस घर जाता था और अपनी वह खटिया वहीं छोड़ जाता था। जो उस ग्रामीण चिकित्सक, गुनिया-सिरहा के लिए एक ‘प्रतिष्ठा-पत्र’ के समान होता था। घर के आसपास पड़ी इन खाली खटियाओं की गिनती यह बताती थी कि ग्रामीण चिकित्सक ने कितने असाध्य रोगियों को ठीक किया है। एक नजर में ही लोगों और मरीज को भी उनकी इलाज की क्षमता का पता चल जाता था। रोगी के मन में विश्वास पैदा होता था, जो उसके इलाज में सकारात्मक भूमिका निभाता था।
मैंने स्वयं अपनी आंखों से सल्फी, जिसे बस्तर शैंपेन (Bastar Champagne) भी कहते हैं, और जिसके आकाश-चुंबी पेड़ों की ऊंचाई कम से कम 70-80 फीट और कई बार 100 फीट से भी ज्यादा होती थी, उन पेड़ों पर सल्फी निकालने के लिए चढ़े हुए लोगों को वहां से गिरने के बाद चकनाचूर हुई शरीर की हड्डियों, टूटे हाथ-पैर तथा टूटी हुई कमर को पूरी तरह से ठीक होते देखा है। इन पेड़ों से गिरे ऐसे मरीज, जिनकी रीढ़ की हड्डी टूट चुकी होती थी, कमर टूट गई होती थी, शरीर में अनेक अस्थिभंग (मल्टीपल फ्रैक्चर) होते थे, बिल्कुल हिल-डुल नहीं पाते थे, ऐसे कई मरीजों को मैंने पूरी तरह से स्वस्थ होकर ठीक होकर पुनः खेतों में काम करते देखा है।
इन्हीं महत्वपूर्ण वन-औषधियों में एक थी मंजूर गोड़ी, जिसे बस्तर में पुराने लोग इसी नाम से जानते थे। इसका वैज्ञानिक नाम विटेक्स पेडनक्यूलरिस (Vitex peduncularis Wall. ex Schauer) है। इसका वनस्पति-कुल (परिवार) लेमिएसी (Lamiaceae) है, हालांकि पुराने साहित्य में इसे वर्बेनेसी (Verbenaceae) में भी रखा गया है। इसके अन्य नामों में चिरईगोरवा, छराईगोरवा, मिनजुरगोर्वा, नागबेल, नागफेनी, सिमजांदा, भादु आदि मिलते हैं। मध्य प्रदेश के कुछ क्षेत्रों में चिराईगोड़वा और नागबेल, बिहार में सिमजंघा, ओडिशा में मादोचुलिया/भादु तथा अन्य क्षेत्रों में अलग-अलग स्थानीय नाम मिलते हैं।
इस पेड़ की सबसे अद्भुत पहचान इसकी पत्ती है। सामान्यतः लोग इसे तीन पत्तियों वाला वृक्ष कहकर आगे बढ़ जाते हैं, लेकिन असली रहस्य उसके चपटे, लंबवत फैले हुए पत्ती-जैसे डंठल में है। सामान्यतः तीन पर्णिकाएं निकलती हैं, बीच की पर्णिका लगभग 10 से 20 सेंटीमीटर लंबी और पार्श्व पर्णिकाएं लगभग 8.5 से 15 सेंटीमीटर लंबी होती हैं। युवा पौधों में डंठल का पंखदार होना (पेटिओल का विंग्ड यानी winged होना) इसकी पहचान का महत्वपूर्ण लक्षण है। वृक्ष 7 से 18 मीटर तक ऊंचा हमने देखा है।
अंग्रेजी में इसके लिए मोर-पैर जैसी आकृति (Peacock-foot) से जुड़े नाम मिलते हैं और यही कारण है कि बस्तर का “मंजूर गोड़ी” नाम सुनकर स्थानीय लोकज्ञान और अंग्रेजी वानस्पतिक नामकरण (botanical naming) के बीच एक अद्भुत समानता दिखाई देती है। पुराने औपनिवेशिक वनस्पति साहित्य में भी यह पेड़ दर्ज है। फ्लोरा ऑफ ब्रिटिश इंडिया (Flora of British India), 1885 में विटेक्स पेडनक्यूलरिस (Vitex peduncularis) का वैज्ञानिक विवरण मिलता है। हां, उपलब्ध प्रमाणों के आधार पर इसे सीधे ब्रिटिश फार्माकोपिया (British Pharmacopoeia) की आधिकारिक औषधि-विवरणिका (official monograph) कहना उचित नहीं होगा।
जनजातीय चिकित्सा में इस वनस्पति का महत्व केवल नाम भर का नहीं था। बस्तर के पुराने परंपरागत औषधि ज्ञान (एथ्नोमेडिसिनल रिकॉर्ड्स, ethnomedicinal records) में इसकी छाल का प्रयोग बुखार और सीने के दर्द में तथा पारंपरिक उपचार में किया जाना दर्ज है। एक पुराने बस्तर संबंधी अध्ययन में इसे चराईगोरवा, नाग बेल (Charaigorwa/Nagbail) के नाम से दर्ज करते हुए बुखार और छाती के दर्द के उपचार का उल्लेख है। बस्तर में मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में मलेरिया के इलाज में भी इसके पंचांग का काढ़ा उपयोग किया जाता रहा है।
भारत के अन्य आदिवासी क्षेत्रों में इसके उपयोग और भी व्यापक मिलते हैं। सीएसआईआर-एनईआईएसटी (CSIR-NEIST) के औषधि पौधों के डेटाबेस (medicinal plants database) में विटेक्स पेडनक्यूलरिस (Vitex peduncularis) के साथ इसके जीवाणुरोधी (antibacterial), ज्वर-विशेष रूप से मलेरिया के ज्वर (fever, particularly malarial fever) तथा शरीर के दर्द, सूजन एवं सर्पदंश के प्रभावी पारंपरिक इलाज दर्ज हैं। कुछ परंपरागत चिकित्सा पद्धतियों में (एथ्नोबॉटनिकल स्रोतों, ethnobotanical sources) में इसकी पत्तियों का रस सर्पदंश (snakebite) में लेने का भी उल्लेख मिलता है।
इसका अर्थ यह नहीं कि आज कोई व्यक्ति सर्पदंश के उपचार के लिए अस्पताल जाने के बजाय मंजूर गोड़ी का रस पी ले। आधुनिक चिकित्सा में विषैले सर्पदंश का उपचार प्रतिविष (antivenom) और चिकित्सकीय निगरानी है। लोकज्ञान का सम्मान करना, उस पर शोध करना और उसे वैज्ञानिक उपचार का विकल्प बना देना, पूरी तरह अलग-अलग बातें हैं।
वैज्ञानिक दृष्टि से भी यह वनस्पति अब महज लोककथा का अंश नहीं रह गई है। इसके विभिन्न भागों में इरिडॉइड्स (iridoids), फ्लेवोनॉइड्स (flavonoids), टरपेनॉइड्स (terpenoids) और ट्राइटरपेनॉइड्स (triterpenoids) जैसे पादप-रसायन (phytochemicals) पाए गए हैं। विटेक्स पेडनक्यूलरिस (Vitex peduncularis) से बीटा-एक्डिस्टरॉन (β-ecdysterone), टॉरमेंटिक एसिड (tormentic acid), पेडनक्यूलरिसाइड (pedunculariside), विटेक्सिलैक्टोन (vitexilactone), लिमोनिसाइड (limoniside), सर्सिमार्टिन (cirsimartin) आदि यौगिकों की रिपोर्ट है। शोधों में इसके रोगाणुरोधी (antimicrobial), सूजनरोधी (anti-inflammatory) और अन्य औषधीय-क्रियात्मक (pharmacological) गतिविधियों की संभावनाओं का अध्ययन हुआ है।
लेकिन बस्तर की त्रासदी यह है कि जिस जंगल ने इन औषधियों को जन्म दिया, उसी जंगल का अस्तित्व हमने लगातार छोटा किया, अभी भी कर रहे हैं। कभी लकड़ी के लिए पेड़ कटे, कहीं कोयला बनाने के लिए पेड़ काटे गए, कहीं खनन के लिए समूचे जंगल काटे गए, कहीं दुनिया भर की रेल के स्लीपरों के लिए जंगल काटे गए, कभी पानी से जहाज बनाने के लिए तो कहीं औद्योगिक उपयोग के लिए। कभी हमने जंगलों को काटकर साफ कर खेती शुरू की थी, वह आज भी कहीं-कहीं पर जारी है। सरकार की अदूरदर्शी ‘वन भूमि पट्टा’ नीति का फायदा उठाने के लिए मानो होड़ मची हुई है। जी हां, वन भूमि पट्टे के कागज के टुकड़े के लिए इन जंगलों की असली वारिस जनजातियों के द्वारा ही हजारों साल पुराने समूचे जंगल काट डाले गए और अभी भी काटे जा रहे हैं। यह कहना गलत ना होगा कि दूषित ‘वन भूमि पट्टा नीति’ ने जंगलों के सहचर, सतत पहरेदार आदिवासियों की कुल्हाड़ी को जंगल के खिलाफ खड़े कर दिया। इसके दुष्परिणामों को आने वाली पीढ़ियां भोगेंगी ।कुछ क्षेत्रों में पर्यावरण संरक्षण, भूमि संरक्षण, मृदा संरक्षण के लुभावने प्रयोजनों के नाम पर हजारों-हजार साल पुराने प्राकृतिक मिश्रित जंगलों की जगह सागौन और यूकेलिप्टस जैसे सीमित प्रजातियों के रोपण ने जैव विविधता को बुरी तरह से प्रभावित किया है। जंगल यदि विविधता का घर है तो एक ही प्रजाति का विशाल रोपण अकाल वृक्षारोपण रेगिस्तान तो हो सकता है पर जैव विविधता से भरपूर जंगल का विकल्प नहीं हो सकता।
इसके बाद नियमित रूप से हर साल लगने वाली जंगल की आग ने बचा-खुचा काम पूरा कर दिया है। महुआ और सालबीज बीनने वालों में कुछ स्थानों पर जमीन साफ करने और श्रम बचाने के लिए पत्तियों को जलाने की परंपरा रही है। हर साल दोहराई जाने वाली ऐसी आग केवल सूखी पत्तियां नहीं जलाती। वह बीज, अंकुर, कीट, जीव-जंतु और जमीन की जैविक परत के साथ उन छोटी-छोटी औषधीय वनस्पतियों को भी खत्म करती है, जिनकी पहचान तक अगली पीढ़ी को नहीं मिलती।
और फिर आता है बाजार। बस्तर के साप्ताहिक हाटों से औषधीय वनस्पतियां सस्ते में खरीदकर बड़े व्यापारिक केंद्रों तक पहुंचाने की व्यवस्था नई नहीं है। धमतरी, जगदलपुर, कटनी और दिल्ली-मुंबई जैसे बाजारों तक औषधीय वनोपज (medicinal forest produce) के व्यापार के नेटवर्क का दस्तावेजी उल्लेख मिलता है। जंगलों से सैकड़ों-हजारों ट्रक साजिया निकालकर व्यापारियों के गोदाम में पहुंचती रही है। जाहिर है, यह परंपरागत अक्षय स्रोत अब रीत गया है। एक सवाल यह भी है कि जंगल से जड़ी निकालने वाले हाथ को कितना मिला और उससे मूल्य बढ़ाकर बेचने वाले दलालों को कितना?
आज बस्तर में सर्पगंधा (Rauvolfia serpentina), जिसे स्थानीय लोग कुरवां जड़ी कहते थे, रसना जड़ी (Blepharispermum subsessile), कपूर कचरी (Hedychium spicatum), कलिहारी कंद (Gloriosa superba), तीखुर (Curcuma angustifolia) और मेदा-महामेदा, हिरनतूतिया, तेलियाकंद जैसी अनेक अत्यंत महत्वपूर्ण तथा दुर्लभ वन-औषधियां, जो पहले बस्तर के जंगलों में भरपूर मात्रा में पाई जाती थीं, आज ढूंढने पर भी नहीं मिलतीं। सबसे बड़ी चिंता का विषय यही है। रसना की जड़ को बस्तर में पारंपरिक चिकित्सा में प्रयोग किए जाने का वैज्ञानिक दस्तावेज भी उपलब्ध है। अब यह जड़ी-बूटियां भी लगता है दस्तावेजों में ही मिलेंगी।
अब लगभग पूरी तरह से विलुप्त और केवल बस्तर की लोक-स्मृतियों में ही शेष बची हिरन-तूतिया, तेलियाकंद तथा दूसरी दुर्लभ विलुप्तप्राय वनौषधियां इस संकट की असल कहानी कहती हैं। इनमें से कुछ स्थानीय नामों की वास्तविक वैज्ञानिक पहचान आज भी अलग-अलग क्षेत्रों में विवादित है। यह भी एक बड़ा खतरा है। पौधा गया तो उसके साथ उसका स्थानीय नाम, पहचान, उपयोग और उससे जुड़ी पीढ़ियों की स्मृति भी चली जाती है।
सवाल फिर राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड, यानी राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (National Medicinal Plants Board, NMPB) पर आता है। इसका गठन 24 नवंबर 2000 को औषधीय पौधों के समुचित संरक्षण, उचित संग्रहण (harvesting), खेती (cultivation), अनुसंधान (research), प्रसंस्करण (processing) और विपणन (marketing) के लिए समन्वयकारी संस्था के रूप में किया गया था। आज 26 वर्ष होने को हैं। बोर्ड के घोषित कार्यों में संरक्षण (conservation), खेती (cultivation), सूचीकरण (inventorisation), गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री (quality planting material), बाजार संपर्क (market linkage) और किसानों को सहायता देना स्पष्ट रूप से शामिल है।
सरकार की योजनाओं में औषधीय पौधों (medicinal plants) की खेती के लिए 30, 50 और 75 प्रतिशत तक सहायता का प्रावधान और बाजार प्रसार का भी उल्लेख किया जाता रहा है। फिर भी जमीन पर वास्तविक किसान के लिए योजना तक पहुंच, प्रमाणित रोपण सामग्री, तकनीकी मार्गदर्शन, खरीद की गारंटी और बाजार की समस्या आज भी बड़ी चुनौती है। स्वयं राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) की वेबसाइट मानती है कि गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री (quality planting material) की कमी व्यावसायिक खेती (commercial cultivation) की प्रमुख बाधाओं में है।
मैं स्वयं राष्ट्रीय औषधीय पादप बोर्ड (NMPB) से जुड़ी एक भूमिका में नामित रहा हूं। पिछले चार वर्षों में मेरी जानकारी में इसकी एक भी बैठक नहीं हुई, अथवा हुई हो तो उसकी सूचना मुझे नहीं मिली। यह व्यक्तिगत शिकायत नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से पूछा गया एक सार्वजनिक प्रश्न है, जिसका उद्देश्य ही देश की औषधीय जैव-विविधता का संरक्षण है।
जड़ी-बूटी की खेती को किसान की खेती की तरह देखना होगा। उसे केवल जंगल की वस्तु समझकर वन विभाग की फाइलों में बंद कर देना समाधान नहीं है। कृषि, उद्यानिकी, वन, आयुष, शोध संस्थान और आदिवासी वैद्य, सबको एक साथ लाना होगा। किसान को खेती सिखाने के लिए केवल वन प्रशासन पर्याप्त नहीं, जैसे डॉक्टर से पुल बनवाना और इंजीनियर से हृदय प्रत्यारोपण करवाना उचित नहीं होगा।
मंजूर गोड़ी को बचाना दरअसल एक पेड़ को बचाना नहीं है। यह बस्तर की उस स्मृति को बचाना है, जिसमें जंगल के पेड़-पौधे सिर्फ पेड़ नहीं, औषधालय हुआ करते थे।
जिस दिन हमारी अगली पीढ़ी जंगल में जाकर पूछेगी, “मंजूर गोड़ी कैसी होती थी?” और हमारे पास दिखाने के लिए केवल किताब में छपी तस्वीर होगी, उस दिन समझिएगा कि हमने केवल एक वनस्पति नहीं खोई, हमने अपने पूर्वजों का लिखा सदियों पुराना महत्वपूर्ण एक पन्ना जला दिया है।





