वन्यजीवों की घटती आबादी, जैव विविधता संकट और संरक्षण की चुनौती

Declining wildlife populations, biodiversity crisis and conservation challenges

डॉ. प्रियंका सौरभ

पृथ्वी पर जीवन की विविधता मानव सभ्यता के अस्तित्व का आधार है। वन, नदियाँ, महासागर, घास के मैदान और आर्द्रभूमियाँ न केवल वन्यजीवों को आश्रय प्रदान करती हैं, बल्कि भोजन, स्वच्छ जल, जलवायु संतुलन तथा आजीविका के लिए भी आवश्यक हैं। किंतु तीव्र आर्थिक विकास, प्राकृतिक संसाधनों के अनियंत्रित दोहन और पर्यावरणीय असंतुलन ने जैव विविधता पर गंभीर संकट उत्पन्न कर दिया है। लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट वन्यजीव आबादी में गिरावट के माध्यम से इसी संकट को उजागर करती है। यह केवल कुछ प्रजातियों के कम होने की कहानी नहीं, बल्कि प्रकृति और मानव के बीच बिगड़ते संबंधों का प्रतिबिंब है।

रिपोर्ट में दर्ज वन्यजीव आबादी में गिरावट का अर्थ पृथ्वी पर मौजूद सभी पशुओं की कुल संख्या में समान अनुपात में कमी आना नहीं है। यह मुख्यतः निगरानी की गई स्तनधारी, पक्षी, सरीसृप, उभयचर और मछली प्रजातियों की आबादी में समय के साथ हुए औसत परिवर्तन को दर्शाती है। उदाहरण के लिए, यदि किसी क्षेत्र में बाघों, पक्षियों और मछलियों की आबादी लगातार घट रही है, तो यह उनके प्राकृतिक आवास, भोजन की उपलब्धता और प्रजनन परिस्थितियों में प्रतिकूल बदलाव का संकेत हो सकता है। इसी प्रकार, मीठे पानी के पारिस्थितिकी तंत्र में आबादी की तीव्र गिरावट नदियों, झीलों और आर्द्रभूमियों पर बढ़ते दबाव को दर्शाती है। हालाँकि, आबादी में गिरावट और प्रजातियों के विलुप्त होने के बीच अंतर है। कुछ प्रजातियों की संख्या घटने का अर्थ यह नहीं कि वे विलुप्त हो चुकी हैं। इसलिए वन्यजीवों की घटती आबादी को प्रकृति के स्वास्थ्य का चेतावनी संकेतक समझना चाहिए, न कि सभी जीवों के कुल विनाश का प्रत्यक्ष माप।

जैव विविधता के ह्रास का सबसे प्रमुख कारण प्राकृतिक आवासों का विनाश और विखंडन है। वनों की कटाई, कृषि भूमि का विस्तार, खनन, शहरीकरण, सड़क निर्माण तथा औद्योगिक परियोजनाएँ वन्यजीवों के प्राकृतिक आवासों को सीमित कर देती हैं। जब जंगल छोटे-छोटे हिस्सों में बँट जाते हैं, तो जानवरों की आवाजाही, प्रजनन और भोजन प्राप्त करने की क्षमता प्रभावित होती है। भारत में वन क्षेत्रों के निकट मानव बस्तियों और आधारभूत संरचनाओं का विस्तार हाथियों तथा तेंदुओं के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष को बढ़ा सकता है। प्राकृतिक आवासों का विनाश केवल जीवों को आश्रय से वंचित नहीं करता, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र की खाद्य शृंखला और प्राकृतिक संतुलन को भी कमजोर करता है।

प्राकृतिक संसाधनों का अतिदोहन भी जैव विविधता के लिए गंभीर चुनौती है। अत्यधिक शिकार, अवैध वन्यजीव व्यापार, अनियंत्रित मछली पकड़ना तथा लकड़ी का अत्यधिक दोहन अनेक प्रजातियों के अस्तित्व को खतरे में डालते हैं। जब किसी प्रजाति से उसकी प्राकृतिक पुनरुत्पादन क्षमता से अधिक संसाधन प्राप्त किए जाते हैं, तो उसकी आबादी में गिरावट आने लगती है। भारत में बाघों के अंगों, पैंगोलिन के शल्कों और अन्य वन्यजीव उत्पादों का अवैध व्यापार इस समस्या की गंभीरता को दर्शाता है। इसी प्रकार, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र में अत्यधिक मत्स्य दोहन खाद्य शृंखला को प्रभावित करता है। इसके अतिरिक्त, वन्यजीव उत्पादों की बढ़ती माँग और अवैध व्यापार के अंतरराष्ट्रीय नेटवर्क संरक्षण संबंधी प्रयासों को कमजोर करते हैं।

जलवायु परिवर्तन जैव विविधता के संकट को और गहरा कर रहा है। वैश्विक तापवृद्धि, वर्षा चक्र में परिवर्तन, सूखा, बाढ़, समुद्र-स्तर में वृद्धि तथा महासागरों का अम्लीकरण वन्यजीवों के अस्तित्व को प्रभावित करते हैं। तापमान में बदलाव से प्रजातियों के प्रजनन काल, प्रवास और भोजन की उपलब्धता में परिवर्तन हो सकता है। समुद्री तापमान बढ़ने से प्रवाल विरंजन की घटनाएँ बढ़ती हैं, जिससे प्रवाल भित्तियों पर निर्भर अनेक जीव प्रभावित होते हैं। हिमालयी क्षेत्रों में बदलती जलवायु पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र और वहाँ रहने वाली प्रजातियों के लिए नई चुनौतियाँ उत्पन्न करती है। इस प्रकार, जलवायु परिवर्तन पहले से ही कमजोर पारिस्थितिकी तंत्रों पर अतिरिक्त दबाव डालता है।

प्रदूषण भी जैव विविधता के ह्रास का एक प्रमुख कारण है। औद्योगिक अपशिष्ट, कीटनाशक, रासायनिक उर्वरक, प्लास्टिक तथा सीवेज मिट्टी और जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। कृषि क्षेत्रों से बहकर आने वाले रसायन जल निकायों में ऑक्सीजन की कमी पैदा कर सकते हैं, जिससे मछलियों और अन्य जलीय जीवों के लिए जीवित रहना कठिन हो जाता है। प्लास्टिक प्रदूषण समुद्री कछुओं, पक्षियों और मछलियों के लिए विशेष रूप से हानिकारक है। इसके अतिरिक्त, प्रकाश और ध्वनि प्रदूषण वन्यजीवों के व्यवहार, संचार तथा प्रजनन प्रक्रियाओं को बाधित कर सकते हैं। आक्रामक विदेशी प्रजातियाँ भी स्थानीय जैव विविधता को नुकसान पहुँचाती हैं। भारत में लैंटाना जैसी आक्रामक वनस्पति कुछ वन क्षेत्रों में स्थानीय वनस्पतियों के पुनर्जनन को प्रभावित करती है और प्राकृतिक आवासों की संरचना में बदलाव लाती है।

जैव विविधता संरक्षण के लिए सर्वप्रथम प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा और पारिस्थितिकी तंत्रों के पुनर्स्थापन को प्राथमिकता देनी चाहिए। वनों, आर्द्रभूमियों, घास के मैदानों, मैंग्रोव और प्रवाल भित्तियों का संरक्षण आवश्यक है। संरक्षित क्षेत्रों के साथ वन्यजीव गलियारों का विकास किया जाना चाहिए, ताकि जानवर अलग-थलग आबादियों के बीच आवागमन कर सकें। भारत में प्रोजेक्ट टाइगर ने बाघों और उनके प्राकृतिक आवासों के संरक्षण को महत्त्वपूर्ण आधार प्रदान किया है। इसी प्रकार, क्षतिग्रस्त वनों का स्थानीय प्रजातियों के माध्यम से पुनर्स्थापन तथा नदियों और आर्द्रभूमियों का पुनर्जीवन जैव विविधता की रक्षा में सहायक हो सकता है।

संरक्षण के प्रयासों को प्रभावी बनाने के लिए वैज्ञानिक निगरानी और अनुसंधान भी आवश्यक हैं। कैमरा ट्रैप, उपग्रह आधारित निगरानी, डीएनए विश्लेषण तथा नियमित जनसंख्या सर्वेक्षण से प्रजातियों की स्थिति का बेहतर आकलन किया जा सकता है। निगरानी में उन प्रजातियों और पारिस्थितिकी तंत्रों को भी शामिल करना चाहिए जिनके बारे में पर्याप्त जानकारी उपलब्ध नहीं है। साथ ही, स्थानीय और आदिवासी समुदायों की भागीदारी को बढ़ावा देना चाहिए। संयुक्त वन प्रबंधन, संरक्षण आधारित आजीविका, पर्यावरण पर्यटन तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष से प्रभावित परिवारों को उचित मुआवजा प्रदान करना संरक्षण के प्रति विश्वास बढ़ा सकता है। कृषि, उद्योग और मत्स्य पालन में सतत पद्धतियों को अपनाना, प्लास्टिक कचरे को कम करना तथा प्राकृतिक संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना भी आवश्यक है।

इसके अतिरिक्त, वन्यजीव संरक्षण से संबंधित कानूनों का प्रभावी क्रियान्वयन, अवैध व्यापार पर नियंत्रण और विकास परियोजनाओं का निष्पक्ष पर्यावरणीय आकलन सुनिश्चित किया जाना चाहिए। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुनमिंग-मॉन्ट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा देशों को जैव विविधता के संरक्षण, पारिस्थितिकी तंत्रों के पुनर्स्थापन और प्राकृतिक संसाधनों के सतत उपयोग के लिए साझा दिशा प्रदान करती है। इसके लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए पर्याप्त वित्तपोषण, तकनीकी सहयोग और जवाबदेही आवश्यक हैं।

अंततः, वन्यजीव आबादी में गिरावट प्रकृति के साथ बढ़ते असंतुलन का गंभीर संकेत है। इसका प्रभाव केवल वन्यजीवों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि खाद्य सुरक्षा, जल उपलब्धता, जलवायु स्थिरता और मानव कल्याण को भी प्रभावित करता है। इसलिए संरक्षण को विकास के विरोध के रूप में नहीं, बल्कि सतत विकास की अनिवार्य शर्त के रूप में देखा जाना चाहिए। वैज्ञानिक प्रमाण, प्रभावी नीतियाँ, स्थानीय समुदायों की भागीदारी और जिम्मेदार उपभोग को एक साथ आगे बढ़ाकर ही जैव विविधता के ह्रास को रोका जा सकता है। प्रकृति की रक्षा केवल भविष्य की पीढ़ियों के प्रति हमारा दायित्व नहीं, बल्कि वर्तमान मानव समाज के अस्तित्व और समृद्धि की भी आवश्यकता है।