वाशिंगटन में ‘ब्लू वेव’, तेल का खेल और भारतीय बाज़ार की दीवाली: आर्थिक कूटनीति का नया क्षितिज

'Blue Wave' in Washington, Oil Game and Indian Market Diwali: New Horizon of Economic Diplomacy

अशोक भाटिया

अमेरिका के मध्यावधि चुनावों के नतीजों ने न केवल वाशिंगटन के शक्ति संतुलन को उलट दिया है, बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था की बिसात पर भी एक ऐसी हलचल पैदा कर दी है जिसका सीधा असर भारत के आम निवेशक की जेब और देश के राजकोष पर दिखने लगा है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की रिपब्लिकन पार्टी को सीनेट और प्रतिनिधि सभा दोनों सदनों में मिली करारी हार और डेमोक्रेटिक पार्टी की ‘ब्लू वेव’ ने अंतरराष्ट्रीय बाजारों को एक नया संदेश दिया है। अमेरिकी इतिहास के इस महत्वपूर्ण राजनैतिक उलटफेर के पीछे का सबसे बड़ा कारण ईरान युद्ध और उसके कारण उपजी अभूतपूर्व वैश्विक महंगाई को माना जा रहा है। अमेरिकी मतदाताओं ने युद्ध की इस राजनीति को नकारते हुए ट्रम्प प्रशासन को घरेलू मोर्चे पर घुटनों पर ला दिया है। लेकिन इस राजनैतिक पराजय का जो सबसे दिलचस्प और सकारात्मक प्रभाव देखने को मिला है, वह है वैश्विक कच्चे तेल की कीमतों का अचानक क्रैश हो जाना और उसके फलस्वरूप भारतीय शेयर बाजार में समय से पहले ही दीवाली के पटाखों की तरह फूटती तेजी। यह घटनाक्रम साबित करता है कि समकालीन दुनिया में भू-राजनीति और भू-अर्थशास्त्र किस कदर एक-दूसरे के पूरक बन चुके हैं।

इस पूरे घटनाक्रम के आर्थिक गणित को समझने के लिए सबसे पहले कच्चे तेल और डोनाल्ड ट्रम्प की नीतियों के अंतर्संबंधों का विश्लेषण करना जरूरी है। डोनाल्ड ट्रम्प के इस कार्यकाल का एक बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व में तनाव और ईरान के साथ सीधे टकराव में बीता, जिसने वैश्विक तेल आपूर्ति श्रृंखला को बुरी तरह प्रभावित कर रखा था। युद्ध के बाद तेल की कीमतों में जो उछाल आया था, उसने पूरी दुनिया के साथ-साथ खुद अमेरिका के भीतर भी मुद्रास्फीति को बेलगाम कर दिया था। अब जब अमेरिकी संसद (कांग्रेस) पर डेमोक्रेट्स का पूर्ण नियंत्रण स्थापित हो चुका है, तो वाशिंगटन की आक्रामक विदेश नीति और युद्धप्रिय रुख पर एक मजबूत विधायी ब्रेक लग गया है। बाजार इस बात को अच्छी तरह समझ रहा है कि अब ट्रम्प प्रशासन मनमाने ढंग से युद्ध को और लंबा नहीं खींच पाएगा और न ही ऊर्जा बाजारों को अपनी शर्तों पर चला पाएगा। इसी राजनैतिक गतिरोध की संभावना ने तेल सटोरियों और वैश्विक तेल बाजार में एक भारी बिकवाली को जन्म दिया, जिससे कच्चे तेल की कीमतें औंधे मुंह गिर गईं। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी तेल जरूरतों का लगभग 85 प्रतिशत हिस्सा आयात करता है, कच्चे तेल की कीमतों में आई यह गिरावट किसी दैवीय वरदान से कम नहीं है।

कच्चे तेल की कीमतों का गिरना भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए एक साथ कई मोर्चों पर संजीवनी का काम करता है, जिसका सीधा प्रतिबिंब दलाल स्ट्रीट पर देखने को मिल रहा है। जैसे ही अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम टूटे, भारतीय शेयर बाजार के दोनों प्रमुख सूचकांक, सेंसेक्स और निफ्टी, रिकॉर्ड ऊंचाई की तरफ दौड़ पड़े। बाजार की इस खुशी के पीछे ठोस आर्थिक तर्क हैं। जब कच्चा तेल सस्ता होता है, तो भारत का व्यापार घाटा (Trade Deficit) तेजी से कम होता है और चालू खाता घाटा नियंत्रण में आ जाता है। इससे भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले मजबूत होता है। डॉलर की मजबूती और तेल की सस्ती दरों का सीधा मतलब यह है कि भारत को तेल आयात करने के लिए कम विदेशी मुद्रा खर्च करनी होगी, जिससे देश के राजकोषीय स्वास्थ्य में सुधार होगा। यही कारण है कि विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक जो पिछले कुछ समय से भारतीय बाजार से पूंजी निकाल रहे थे, वे एक बार फिर भारतीय इक्विटी में बड़े पैमाने पर खरीदारी करने लौटे हैं। बाजार को यह भरोसा हो गया है कि आने वाले समय में भारत की विकास दर को वैश्विक मंदी के बाद भी एक मजबूत सहारा मिलने जा रहा है।

इसके अतिरिक्त, भारतीय कॉरपोरेट जगत के लिए कच्चे तेल का सस्ता होना सीधे तौर पर उनकी उत्पादन लागत को कम करता है। भारत में पेंट, टायर, लुब्रिकेंट्स, लॉजिस्टिक्स, एविएशन और प्लास्टिक जैसे दर्जनों उद्योग सीधे तौर पर कच्चे तेल या उसके डेरिवेटिव्स पर निर्भर हैं। तेल की कीमतें घटने से इन कंपनियों के मार्जिन में भारी सुधार होने की उम्मीद जग गई है। जब परिवहन और माल ढुलाई की लागत कम होती है, तो इसका एक व्यापक असर देश के भीतर आम उपभोक्ता वस्तुओं (FMCG) की कीमतों पर भी पड़ता है। यानी, जो महंगाई पिछले कई महीनों से भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) और आम नागरिकों के लिए सिरदर्द बनी हुई थी, उसमें अब गिरावट आने के आसार हैं। यदि महंगाई दर नियंत्रण में आती है, तो इस बात की पूरी संभावना बढ़ जाती है कि केंद्रीय बैंक आने वाली तिमाहियों में ब्याज दरों में कटौती का फैसला ले सकता है। ब्याज दरों का कम होना उद्योगों के लिए कर्ज सस्ता करेगा और देश में निजी निवेश के एक नए चक्र की शुरुआत होगी। शेयर बाजार इसी भविष्यगामी संभावना को भांपकर आज जश्न मना रहा है, जिसे विश्लेषक “अग्रिम दीवाली” की संज्ञा दे रहे हैं।

हालांकि, एक परिपक्व लेखकीय दृष्टि केवल इस तात्कालिक जश्न तक सीमित नहीं रह सकती; हमें इस सिक्के के दूसरे और अधिक जटिल पहलू पर भी नजर डालनी होगी। वाशिंगटन में ट्रम्प का कमजोर होना भारतीय कूटनीति और अर्थव्यवस्था के लिए एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ जहां हमें तेल की कीमतों में राहत मिली है और ट्रम्प की मनमानी व्यापारिक नीतियों पर अमेरिकी कांग्रेस का अंकुश लग गया है, वहीं दूसरी तरफ वाशिंगटन में पैदा होने वाला राजनीतिक गतिरोध एक नई अनिश्चितता को जन्म देगा। डेमोक्रेटिक पार्टी, जिसका अब अमेरिकी सीनेट और हाउस पर कब्जा है, पारंपरिक रूप से व्यापारिक मुद्दों पर भले ही थोड़ी उदार हो, लेकिन वह मानवाधिकारों, जलवायु परिवर्तन की शर्तों और आंतरिक श्रम कानूनों को लेकर भारत जैसी उभरती अर्थव्यवस्थाओं पर कड़ा दबाव बनाने के लिए जानी जाती है। आने वाले दिनों में, अमेरिकी संसद की विभिन्न कमिटियां भारत की घरेलू नीतियों, पर्यावरण मानकों और डेटा सुरक्षा कानूनों को लेकर तीखे सवाल उठा सकती हैं, जो भारतीय आईटी और फार्मास्यूटिकल जैसे प्रमुख निर्यात क्षेत्रों के लिए नई चुनौतियां खड़ी कर सकते हैं।

इसके साथ ही, हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि डोनाल्ड ट्रम्प भले ही संसद में अपना बहुमत खो चुके हैं, लेकिन वे अभी भी अगले दो साल तक अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर बने रहेंगे। एक घायल और राजनैतिक रूप से कमजोर राष्ट्रपति कई बार घरेलू मोर्चे पर अपनी विफलता से ध्यान भटकाने के लिए विदेश नीति में अप्रत्याशित और आक्रामक फैसले लेने की कोशिश करता है। ट्रम्प अपनी ‘अमेरिका फर्स्ट’ की छवि को बचाने के लिए भारत सहित अन्य विकासशील देशों के खिलाफ कुछ ऐसे कार्यकारी आदेश भी जारी कर सकते हैं जिन्हें संसद की मंजूरी की जरूरत न हो, जैसे कि एच-1बी वीजा नियमों को और कड़ा करना या विशिष्ट भारतीय उत्पादों पर प्रतिबंध लगाना। इसलिए, भारतीय नीति निर्माताओं को इस तात्कालिक बाजार की तेजी के उत्साह में बहने के बजाय एक दीर्घकालिक और संतुलित रणनीति तैयार करनी होगी।

गौरतलब है कि अमेरिकी मध्यावधि चुनावों के बाद वैश्विक मंच पर जो नई आर्थिक और राजनैतिक बिसात बिछी है, उसने भारत को एक रणनीतिक बढ़त जरूर दी है। कच्चे तेल का क्रैश होना और भारतीय शेयर बाजार में पटाखों की तरह गूंजती तेजी इस बात का प्रमाण है कि भारत इस समय वैश्विक उथल-पुथल के बीच भी एक मजबूत आर्थिक द्वीप के रूप में खड़ा है। लेकिन वास्तविक समझदारी इस बात में होगी कि हम इस तात्कालिक आर्थिक लाभ का उपयोग देश के आंतरिक सुधारों को गति देने में करें। भारत को अपनी ऊर्जा निर्भरता को पारंपरिक कच्चे तेल से हटाकर नवीकरणीय ऊर्जा की तरफ तेजी से मोड़ना होगा, ताकि भविष्य में अमेरिकी चुनावों या मध्य पूर्व के युद्धों पर हमारी आर्थिक स्थिरता निर्भर न रहे। वाशिंगटन की ‘ब्लू वेव’ ने भारतीय बाजार को दिवाली मनाने का अवसर तो दे दिया है, लेकिन इस उजियारे के पीछे छिपे कूटनीतिक और आर्थिक अंधरों से निपटने के लिए नई दिल्ली को अपनी तैयारी अभी से चाक-चौबंद रखनी होगी। अंतरराष्ट्रीय राजनीति का यह नया दौर चेहरों के पीछे भागने का नहीं, बल्कि संस्थागत और आर्थिक आत्मनिर्भरता को मजबूत करने का है।