सत्य भूषण शर्मा
मनुष्य का संपूर्ण जीवन विश्वास की नींव पर खड़ा है। विश्वास वह अदृश्य शक्ति है जो परिवार को जोड़ती है, समाज में सहयोग उत्पन्न करती है और राष्ट्र के विकास का आधार बनती है। माता-पिता का अपने बच्चों पर विश्वास, गुरु का अपने शिष्य पर विश्वास, चिकित्सक पर रोगी का विश्वास तथा नागरिक का संविधान पर विश्वास—ये सभी सभ्यता के स्तंभ हैं। किंतु जब यही विश्वास तर्क, अनुभव और विवेक से दूर होकर भय, भ्रम और अज्ञान का रूप धारण कर लेता है, तब वह अंधविश्वास बन जाता है। यही वह सूक्ष्म अंतर है जिसे समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक है।
विश्वास सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत है। यह व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में भी आगे बढ़ने का साहस देता है। इतिहास साक्षी है कि जिन लोगों ने अपने उद्देश्य पर अटूट विश्वास रखा, उन्होंने असंभव प्रतीत होने वाले कार्य भी संभव कर दिखाए। स्वामी विवेकानंद का आत्मविश्वास, महात्मा गांधी का सत्य और अहिंसा में विश्वास तथा डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का युवाशक्ति में विश्वास इस बात के प्रमाण हैं कि विश्वास व्यक्ति और समाज दोनों को नई दिशा देता है।
इसके विपरीत अंधविश्वास व्यक्ति की स्वतंत्र सोच को जकड़ देता है। वह बिना प्रमाण के किसी बात को अंतिम सत्य मान लेने की प्रवृत्ति है। कभी बिल्ली का रास्ता काटना अशुभ माना जाता है, कभी ग्रह-नक्षत्रों के भय से महत्वपूर्ण निर्णय टाल दिए जाते हैं, तो कभी झाड़-फूंक और चमत्कारों के नाम पर लोगों का आर्थिक और मानसिक शोषण किया जाता है। ऐसी मान्यताएँ न केवल व्यक्ति की प्रगति में बाधक बनती हैं, बल्कि समाज को भी पीछे धकेलती हैं।
अंधविश्वास की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि वह भय को व्यापार बना देता है। कुछ लोग धार्मिक भावनाओं का दुरुपयोग करके भोले-भाले लोगों को भ्रमित करते हैं। बीमारी का इलाज अस्पताल की बजाय ढोंगियों के पास खोजा जाता है, शिक्षा की जगह टोने-टोटके अपनाए जाते हैं और वैज्ञानिक सोच को संदेह की दृष्टि से देखा जाता है। परिणामस्वरूप अनेक बार जान-माल की हानि तक हो जाती है।
यहाँ यह समझना भी आवश्यक है कि आस्था और अंधविश्वास समानार्थी नहीं हैं। आस्था मन की शुद्धता, नैतिकता और आध्यात्मिक उन्नति का मार्ग हो सकती है, जबकि अंधविश्वास विवेकहीन स्वीकार्यता है। मंदिर जाना, प्रार्थना करना या ईश्वर में विश्वास रखना व्यक्तिगत आस्था का विषय है; किंतु किसी निराधार दावे को बिना जाँच-परख के सत्य मान लेना अंधविश्वास है। भारतीय दर्शन ने सदैव प्रश्न पूछने, तर्क करने और सत्य की खोज करने की परंपरा को सम्मान दिया है। उपनिषदों से लेकर बुद्ध और कबीर तक सभी ने विवेकपूर्ण चिंतन का संदेश दिया।
आज विज्ञान और तकनीक के युग में भी अंधविश्वास पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। सोशल मीडिया पर फैलने वाले झूठे संदेश, चमत्कारी उपचारों के दावे और अफवाहें नई चुनौतियाँ बनकर सामने आई हैं। इसलिए वैज्ञानिक दृष्टिकोण विकसित करना केवल विद्यार्थियों का नहीं, बल्कि पूरे समाज का दायित्व है। शिक्षा का वास्तविक उद्देश्य भी यही है कि वह व्यक्ति को सोचने, परखने और सही-गलत में अंतर करने की क्षमता प्रदान करे।
परिवार और विद्यालय इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। यदि बच्चों को बचपन से प्रश्न पूछने के लिए प्रोत्साहित किया जाए, प्रयोग करने की आदत डाली जाए और तर्कसंगत सोच विकसित की जाए, तो वे अंधविश्वास के जाल में आसानी से नहीं फँसेंगे। साथ ही, हमारी सांस्कृतिक परंपराओं के पीछे छिपे वैज्ञानिक और सामाजिक कारणों को भी समझाया जाना चाहिए, ताकि परंपरा सम्मान का विषय बने, अंधानुकरण का नहीं।
विश्वास और अंधविश्वास के बीच की रेखा बहुत महीन है, किंतु वही रेखा समाज की दिशा तय करती है। विश्वास हमें जोड़ता है, प्रेरित करता है और आगे बढ़ाता है; अंधविश्वास हमें बाँधता है, डराता है और पीछे ले जाता है। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी आस्था को विवेक के प्रकाश में परखें और विज्ञान तथा मानवीय मूल्यों के साथ संतुलित जीवन जीने का संकल्प लें।
अंततः यही कहा जा सकता है कि विश्वास वह दीपक है जो जीवन का मार्ग प्रकाशित करता है, जबकि अंधविश्वास वह धुआँ है जो उसी प्रकाश को धुँधला कर देता है। जब आस्था के साथ तर्क का हाथ जुड़ता है, तभी सच्चे अर्थों में प्रगतिशील, संवेदनशील और जागरूक समाज का निर्माण संभव होता है।





