सद्गुरु महात्मा सुशील कुमार का मासिक महानिर्वाण दिवस श्रद्धा और साधना के साथ मनाया गया

The monthly Mahanirvana Day of Sadguru Mahatma Sushil Kumar was observed with reverence and spiritual practice

गुरु माता माँ विजया की दिव्य उपस्थिति में इस्सयोगियों ने की साधना,भजन-कीर्तन और जनकल्याण कन्याण हेतु ब्रह्माण्ड साधना किया

विनोद तकियावाला

सद्गुरुदेव महात्मा सुशील कुमार का मासिक महानिर्वाण दिवस गुरु माता माँ विजया की दिव्य उपस्थिति में गुरुग्राम स्थित सुशांत लोक के ब्लॉक सामुदायिक केंद्र में श्रद्धा, भक्ति और दिव्य वातावरण में मनाया गया।आज के कार्यक्रम में दिल्ली/एन सी आर बड़ी संख्या में इस्सयोगियों ने उपस्थित होकर सद्गुरुदेव के चरणों में श्रद्धा अर्पित की और जनकल्याण की कामना के साथ सामूहिक साधना की।कार्यक्रम का शुभारंभ संस्था के सचिव के. एस. वर्मा ने सद्गुरुदेव महात्मा सुशील कुमार एवं गुरु माता माँ विजया के चित्र पर माल्यार्पण तथा दीप प्रज्ज्वलित कर किया।इसके बाद सद्गुरुदेव के आवाहन हेतु 10 मिनट की आवाहन साधना की गई।इसके उपरांत भजन-कीर्तन हुआ,जिसमें इस्सयोगियों ने भक्तिभाव से भाग लिया।विश्व एवं जनकल्याण के लिए लगभग आधे घंटे की सामूहिक साधना भी की गई।इस मौके पर इस्सयोगियों ने सद्गुरुदेव के प्रति अपने भाव और अनुभूतियाँ साझा किए।साधकों ने कहा कि सद्गुरु द्वारा दिखाया गया साधना का दिव्य मार्ग जीवन को भीतर से बदलने और सकारात्मक चेतना से जोड़ने का मार्ग है।इस्सयोग की नियमित सुक्ष्म साधना से मन की चंचलता कम होती है और व्यक्ति संसार की मोह-माया से ऊपर उठकर अपने भीतर की शक्ति को पहचानने का प्रयास करता है।गुरु माता माँ विजया ने अपने आशीर्वचन में साफव साधना के महत्व को स्पष्ट करते हुए कहा कि आशीर्वाद दिया नहीं जाता,ग्रहण किया जाता है।मैने गुरुपूर्णिमा के अवसर पर भी साधकों से यही कहा था कि गुरु के पास जाने और साधना में बैठने से साधक को शक्ति प्राप्त होती है।साधना के समय व्यक्ति सांसारिक मोह-माया से दूर होकर अपने भीतर की चेतना से जुड़ता है।माता जी कहा कि साधकों को अपनी चेतना को सदैव सकारात्मक रखना चाहिए। जीवन के प्रत्येक कार्य में अपनी श्वासों पर ध्यान केंद्रित करने का अभ्यास किया जा सकता है। भोजन करते समय,स्नान करते समय अथवा दैनिक कार्य करते हुए भी अपनी श्वास के प्रति सजग रहना साधना की निरंतरता को बनाए रखने में सहायक होता है।गुरु माता ने साधकों को प्रतिदिन कम से कम एक घंटे साधना में बैठने का आह्वान करते हुए कहा कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों,साधना का क्रम नहीं टूटना चाहिए।उन्होंने कहा कि साधक जब साधना के पथ पर आगे बढ़ता है तो उसके भीतर का अज्ञान और नकारात्मकता पीछे छूटने लगती है।भगवान को अपने स्तर पर नीचे लाने के बजाय स्वयं को भगवान के निकट और ऊँचे आध्यात्मिक स्तर तक ले जाने का प्रयास करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि साधक को साधना का मार्ग दिया गया है। आज नहीं तो कल उसका फल अवश्य प्राप्त होगा।आवश्यकता केवल निरंतरता,विश्वास और गुरु के वचनों का पालन करने की है। गुरु मार्ग दिखाने का कार्य करते हैं,उस मार्ग पर चलकर उसे जीवन में उतारने का कार्य साधक को स्वयं करना होता है।गुरु माता माँ विजया ने विद्यापति के संदर्भ का उल्लेख करते हुए कहा कि गुरु का काम मार्ग बता देना है, उस पर अमल साधक को स्वयं करना है।उन्होंने कहा कि यह ब्रह्मांड चलायमान है और मनुष्य स्वयं चेतन सत्ता है।वह पराशक्ति से जुड़ा हुआ है।इसलिए जीवन में सदैव सकारात्मक विचारों को स्थान देना चाहिए और नकारात्मक सोच से बचना चाहिए।मालिक का काम साधक को वह देना है जिसकी उसे आवश्यकता है।साधक को अपने भीतर ऐसी स्थिति विकसित करनी चाहिए,जहाँ वह सहज और निष्काम भाव में रह सके। यह स्थिति धीरे-धीरे साधना के माध्यम से आपके जीवन में आती है।संसार नश्वर है,इसलिए मनुष्य को सांसारिक जीवन में रहते हुए अपने कर्तव्यों का पूरी निष्ठा से निर्वहन करना चाहिए और साथ ही आध्यात्मिक साधना को जीवन का अभिन्न हिस्सा बनाना चाहिए।गुरु माता ने कहा कि साधना कोई एक दिन या किसी विशेष अवसर तक सीमित रहने वाली प्रक्रिया नहीं है।यह जीवन को अनुशासित करने और चेतना को परिष्कृत करने की निरंतर यात्रा है।साधक को परिस्थितियों से विचलित हुए बिना गुरु के बताए मार्ग पर आगे बढ़ते रहना चाहिए।कार्यक्रम के अंत में इस्सयोगियों ने सद्गुरुदेव महात्मा सुशील कुमार के बताए साधना मार्ग पर निरंतर चलने तथा समाज और जनकल्याण के लिए अपनी सकारात्मक भूमिका निभाने का संकल्प लिया। सामूहिक साधना और भजन-कीर्तन के साथ पूरा सामुदायिक केंद्र आध्यात्मिक एवं भक्तिमय वातावरण से सराबोर रहा।