सत्ता के अंकगणित में 20 बागी टीएमसी सांसदों पर सुप्रीम कोर्ट की नजर ने बढ़ाई सियासी बेचैनी,परिसीमन और महिला आरक्षण की राह में फिर खड़े हुए संख्या बल के सवाल
विनोद सिंह ‘तकियावाला’
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र भारत की राजनीति वर्तमान में ऐसे वठिन दौर से गुजर रही है,जहाँ सत्ता परिवर्तन अब केवल चुनावी जनादेश तक सीमित नहीं रह गया है।चुनाव के बाद सांसदों और विधायकों के पाला बदलने, दलों में टूट,विलय और सत्ता के अंकगणित को अपने पक्ष में करने की कोशिशों ने लोकतांत्रिक व्यवस्था के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा कर दिया है।आम जनता चुनाव में अपना प्रतिनिधि चुनती है,राजनीतिक दल उस प्रतिनिधि को अपना उम्मीदवार बनाकर जनता के बीच ले जाते हैं और फिर वही प्रतिनिधि चुनाव परिणाम के बाद किसी दूसरे राजनीतिक खेमे में खड़ा दिखाई देता है।ऐसी स्थिति में सवाल केवल दल-बदल का नहीं,बल्कि उस जनादेश की विश्वसनीयता का भी है जिसके आधार पर संसद अस्तित्व में आती है।इसी राजनीतिक पृष्ठभूमि में तृणमूल कांग्रेस के 20 बागी सांसदों का मामला अब पश्चिम बंगाल की राजनीति की सीमाओं से निकलकर राष्ट्रीय राजनीति के केंद्र में पहुँच गया है।मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें एक ओर संविधान की दसवीं अनुसूची अर्थात् दल-बदल विरोधी कानून की कसौटी है,दूसरी ओर लोकसभा अध्यक्ष के अधिकार और जिम्मेदारी का प्रश्न है और तीसरी ओर सर्वोच्च न्यायालय की वह निगरानी है जिसमें न्यायपालिका ने स्पष्ट संकेत दिया है कि केवल नोटिस जारी कर देना पर्याप्त नहीं,बल्कि अयोग्यता की कार्यवाही को उचित समय-सीमा में पूरा करना होगा।विगत दिनों तृणमूल कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव और लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी ने 20 बागी सांसदों के विरुद्ध लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर शीघ्र निर्णय की माँग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।इन सांसदों पर आरोप है कि वे तृणमूल कांग्रेस से अलग होकर नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया यानी NCPI से जुड़ गए और लोकसभा में अलग समूह के रूप में अपनी पहचान बनाने का प्रयास किया।तृणमूल कांग्रेस का तर्क है कि जिस राजनीतिक दल के चुनाव चिह्न पर ये सांसद निर्वाचित होकर संसद पहुँचे, उससे अलग होकर दूसरे राजनीतिक संगठन से जुड़ना संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत कार्रवाई का आधार बनता है।वही दूसरी ओर बागी सांसद अपने कदम को वैध राजनीतिक विलय के रूप में प्रस्तुत कर रहे हैं।सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई ने इस विवाद को और गंभीर बना दिया है।मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने 25 अगस्त को मामले की सुनवाई करते हुए 20 बागी सांसदों को नोटिस जारी किया। सुनवाई के दौरान यह स्पष्ट हुआ कि लोकसभा अध्यक्ष की ओर से इन सांसदों को नोटिस जारी किया जा चुका है। न्यायालय ने इस बात पर जोर दिया कि असली सवाल केवल नोटिस जारी करने का नहीं,बल्कि पूरी कार्यवाही को कितने समय में समाप्त किया जाएगा।यही वह बिंदु है जहाँ भारतीय संसदीय लोकतंत्र की एक पुरानी समस्या फिर सामने आती है।संविधान की दसवीं अनुसूची दल-बदल पर रोक लगाने के उद्देश्य से लाई गई थी। इसका मकसद राजनीतिक खरीद-फरोख्त और अवसरवादी दल-बदल पर अंकुश लगाना था। संसद ने यह व्यवस्था इसलिए बनाई थी ताकि निर्वाचित प्रतिनिधि व्यक्तिगत राजनीतिक लाभ के लिए जनादेश को बीच रास्ते में न बदल दें। मगर व्यवहार में दल-बदल विरोधी कानून की सबसे बड़ी कमजोरी यही रही है कि अयोग्यता संबंधी निर्णय का अधिकार सदन के पीठासीन अधिकारी के पास रहता है और निर्णय में देरी स्वयं एक राजनीतिक प्रश्न बन जाती है।सर्वोच्च न्यायालय का मौजूदा हस्तक्षेप इसी व्यापक चिंता को रेखांकित करता है।न्यायपालिका ने लोकसभा अध्यक्ष के संवैधानिक अधिकार को सीधे अपने हाथ में लेने के बजाय समयबद्ध कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर दिया है। यह अंतर समझना आवश्यक है। सर्वोच्च न्यायालय ने अभी यह फैसला नहीं दिया है कि 20 सांसद निश्चित रूप से अयोग्य हैं या उनकी सदस्यता समाप्त हो जाएगी।अदालत ने प्रक्रिया को गति देने और मामले को लंबित रखने के बजाय समयबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की आवश्यकता पर सवाल उठाया है।लोकसभा सचिवालय ने अब इन 20 सांसदों को सात दिनों के भीतर अपना पक्ष रखने का अवसर दिया है।यह कार्रवाई 18 जून को अभिषेक बनर्जी द्वारा दायर अयोग्यता याचिकाओं के बाद हुई है और इसे 25 अगस्त की सर्वोच्च न्यायालय की सुनवाई के घटनाक्रम से जोड़कर देखा जा रहा है।अब असली प्रश्न यह है कि आगे क्या होगा?क्या 20 सांसदों की सदस्यता समाप्त होगी? क्या उनके द्वारा किया गया राजनीतिक विलय संविधान की दसवीं अनुसूची की कसौटी पर वैध माना जाएगा? क्या वे स्वतंत्र समूह के रूप में लोकसभा में बने रहेंगे? अथवा यदि अयोग्यता सिद्ध होती है तो संसद के मौजूदा संख्या बल में बड़ा बदलाव आएगा?इन प्रश्नों का उत्तर केवल पश्चिम बंगाल की राजनीति को प्रभावित नहीं करेगा।इसका प्रभाव राष्ट्रीय राजनीति के गणित पर भी पड़ सकता है।यही कारण है कि 20 सांसदों का मामला अब ममता बनर्जी बनाम उनके बागी सांसदों की लड़ाई से कहीं बड़ा हो गया है।पिछले कुछ महीनों में भारतीय राजनीति में हुए राजनीतिक पुनर्संयोजन ने संसद के अंकगणित को लगातार बदलने का काम किया है।ऐसे समय में जब केन्द्र सरकार संविधान संशोधन से जुड़े परिसीमन और महिला आरक्षण के प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक समर्थन जुटाने की कोशिश कर रही है,प्रत्येक सांसद की स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। 2026 में प्रस्तावित संवैधानिक संशोधन से लोकसभा की अधिकतम सदस्य संख्या को 850 तक बढ़ाने का प्रस्ताव सामने आया है।सरकार के प्रस्तावित मॉडल में मौजूदा 543 सीटों को बढ़ाकर 816 करने की बात भी सामने आई थी।यहाँ यह स्पष्ट करना भी आवश्यक है कि परिसीमन और महिला आरक्षण के मुद्दे पर राजनीतिक चर्चा अवश्य तेज रही है,मगर यह कहना कि सर्वोच्च न्यायालय ने इन विधेयकों को रोक दिया है,तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा।मौजूदा घटनाक्रम में अदालत का मामला 20 बागी टीएमसी सांसदों की अयोग्यता कार्यवाही से संबंधित है।परिसीमन या महिला आरक्षण विधेयक पर सर्वोच्च न्यायालय ने ऐसा कोई आदेश नहीं दिया है जिससे यह कहा जा सके कि विधेयक पारित कराने की संवैधानिक प्रक्रिया पर अदालत ने रोक लगा दी है।वास्तविक अड़चन संख्या बल और राजनीतिक सहमति की है।संविधान संशोधन विधेयक को पारित कराने के लिए संसद में विशेष बहुमत की आवश्यकता होती है।इसलिए सामान्य विधेयक की तरह केवल उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों की साधारण बहुमत से काम नहीं चलता।यही कारण है कि सरकार को अपने सहयोगियों के साथ- साथ उन दलों और सांसदों के समर्थन की भी आवश्यकता पड़ सकती है जो औपचारिक रूप से एनडीए का हिस्सा नहीं हैं।इसी संदर्भ में 20 बागी सांसदों की राजनीतिक स्थिति महत्वपूर्ण हो जाती है। यदि वे एनडीए के साथ खड़े दिखाई देते हैं तो सत्ता पक्ष के संख्या बल की तस्वीर अलग दिखाई देती है।यदि उनकी सदस्यता पर प्रश्नचिह्न लग जाता है तो वही अंकगणित बदल सकता है।इसीलिए इन सांसदों की सदस्यता का फैसला अब केवल एक दल की आंतरिक राजनीति का विषय नहीं रह गया है।यहाँ लोकतंत्र का सबसे बड़ा सवाल भी सामने आता है-क्या संसद की संख्या खरीद-फरोख्त, राजनीतिक सौदेबाजी और दल-बदल के सहारे बदली जानी चाहिए?राजनीति में विचारों का परिवर्तन लोकतंत्र का हिस्सा है। कोई सांसद अपने दल की नीतियों से असहमत हो सकता है। कोई नेता नई राजनीतिक विचारधारा स्वीकार कर सकता है।मगर सवाल यह है कि ऐसा परिवर्तन चुनाव के दौरान मतदाता के सामने स्पष्ट रूप से होना चाहिए या चुनाव जीतने के बाद सत्ता के समीकरण के अनुसार?मतदाता किसी उम्मीदवार को केवल व्यक्ति के रूप में नहीं चुनता।वह उसके साथ खड़े राजनीतिक दल,उसके चुनाव चिह्न और उसके घोषित कार्यक्रम को भी ध्यान में रखता है।यदि चुनाव के तुरंत बाद निर्वाचित प्रतिनिधि दूसरे दल या राजनीतिक समूह के साथ चला जाता है तो मतदाता के मन में स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि उसके वोट का वास्तविक अर्थ क्या रह गया?भारत में दल-बदल का इतिहास बहुत पुराना है।कभी ‘आया राम,गया राम’ की राजनीति ने लोकतंत्र को शर्मसार किया था।उसी दौर के अनुभवों ने दल-बदल विरोधी कानून की आवश्यकता पैदा की।आज दशकों बाद राजनीतिक परिस्थितियाँ बदली हैं,मगर समस्या का स्वरूप नए रूप में हमारे सामने है।अब सीधे तौर पर विधायक या सांसदों की खरीद-फरोख्त के बजाय विलय,अलग गुट की मान्यता,राजनीतिक पुनर्संयोजन और सत्ता समर्थन के रास्ते तलाशे जाते हैं।यही कारण है कि दसवीं अनुसूची की व्याख्या आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।दल-बदल विरोधी कानून में वैध विलय के लिए निर्धारित शर्तें हैं। केवल कुछ सांसदों का अलग होकर दूसरे राजनीतिक संगठन के साथ खड़ा हो जाना अपने आप में वैध विलय नहीं माना जा सकता।दूसरी ओर किसी राजनीतिक समूह के वास्तविक विलय और केवल व्यक्तिगत या समूहगत पाला बदलने के बीच कानूनी अंतर है।अंतिम निर्णय तथ्यों,संविधान और संबंधित नियमों की कसौटी पर होना है।
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के सामने अब यही संवैधानिक व राजनीतिक अग्नि परीक्षा है।एक तरफ उनके पास सदन की कार्यवाही और सदस्यों की अयोग्यता से जुड़े संवैधानिक अधिकार हैं,दूसरी तरफ सर्वोच्च न्यायालय की निगाह इस बात पर है कि ऐसी कार्यवाही अनिश्चितकाल तक लंबित न रहे।संसदीय लोकतंत्र में अध्यक्ष का पद किसी दल विशेष का पद नहीं है।सदन में वे सत्ता और विपक्ष दोनों के संरक्षक माने जाते हैं।इसलिए ऐसे मामलों में निर्णय की गति के साथ उसकी निष्पक्षता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। यदि निर्णय में अत्यधिक देरी होती है तो आरोप लगते हैं कि अध्यक्ष सत्ता पक्ष के राजनीतिक हितों को ध्यान में रख रहे हैं।यदि जल्दबाजी में निर्णय होता है तो दूसरा पक्ष संवैधानिक अधिकारों की अनदेखी का आरोप लगा सकता है।सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी इसी संतुलन की ओर संकेत करती है।अब यह देखना है कि क्या केन्द्र सरकार इन बदलते राजनीतिक समीकरणों के बीच परिसीमन और महिला आरक्षण से जुड़े प्रस्तावों को आगे बढ़ाने के लिए फिर कोई रास्ता तलाशेगी।संसद के मॉनसून सत्र के दौरान इन विधेयकों को लेकर सरकार की ओर से संख्या जुटाने की कोशिशों की खबरें लगातार सामने आती रही थीं।अगस्त की शुरुआत में संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने विशेष सत्र बुलाए जाने की अटकलों को खारिज करते हुए कहा था कि 16 से 18 अगस्त के बीच ऐसा कोई विशेष सत्र प्रस्तावित नहीं है।इससे स्पष्ट है कि सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल विधेयक तैयार करना नहीं,बल्कि पर्याप्त राजनीतिक समर्थन जुटाना है।परिसीमन का मुद्दा अपने आप में अत्यंत संवेदनशील है।उत्तर और दक्षिण भारत के बीच प्रतिनिधित्व का संतुलन,जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों की राजनीतिक स्थिति,लोकसभा की कुल सीटों में वृद्धि और महिलाओं के लिए 33 प्रतिशत आरक्षण-इन सभी प्रश्नों का संबंध देश के राजनीतिक भविष्य से है।सरकार का पक्ष है कि प्रस्तावित व्यवस्था से दक्षिणी राज्यों को नुकसान नहीं होगा।गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में कहा था कि 543 से 816 सीटों की वृद्धि के मॉडल में दक्षिण भारत की सीटें भी बढ़ेंगी और उसका कुल प्रतिनिधित्व लगभग समान अनुपात में रहेगा।दूसरी ओर कई विपक्षी दलों और दक्षिणी राज्यों की ओर से यह चिंता व्यक्त की जाती रही है कि जनसंख्या को परिसीमन का आधार बनाने से उन राज्यों को राजनीतिक नुकसान हो सकता है जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री डी.के. शिवकुमार ने हाल में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को बनाए रखने और महिलाओं का आरक्षण इसी मौजूदा संख्या के भीतर लागू करने की वकालत की है।इस प्रकार परिसीमन केवल सीटों की संख्या बढ़ाने का सवाल नहीं है। यह आने वाले वर्षों में भारतीय संघीय राजनीति के स्वरूप को प्रभावित करने वाला निर्णय है।इसीलिए सरकार को इस विषय पर व्यापक राजनीतिक सहमति बनाने की आवश्यकता है।यदि कोई बड़ा संवैधानिक परिवर्तन केवल सत्ता के तत्कालीन संख्या बल के आधार पर किया जाता है तो आने वाली पीढ़ियों में उसके प्रति राजनीतिक विवाद बने रह सकते हैं। संविधान किसी एक सरकार या एक राजनीतिक दल का दस्तावेज नहीं है।वह पूरे राष्ट्र की लोकतांत्रिक व्यवस्था का आधार है।यही बात सांसदों के दल-बदल पर भी लागू होती है।यदि आज एक दल अपने विरोधी दल के सांसदों को अपने पक्ष में आने पर लोकतांत्रिक उपलब्धि मानता है तो कल वही स्थिति उसके सामने भी खड़ी हो सकती है।राजनीति में सत्ता स्थायी नहीं होती।आज सत्ता पक्ष में बैठे लोग कल विपक्ष में हो सकते हैं और आज विपक्ष में बैठे लोग कल सत्ता में।इसलिए लोकतांत्रिक संस्थाओं की मजबूती किसी दल के तत्कालीन लाभ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है।20 बागी सांसदों का मामला इसी कारण एक चेतावनी भी है और एक अवसर भी।चेतावनी इसलिए कि यदि सांसदों की निष्ठा चुनाव परिणाम के बाद आसानी से बदलती रही तो मतदाता का विश्वास कमजोर होगा।अवसर इसलिए कि इस मामले में संविधान की दसवीं अनुसूची की भावना, अध्यक्ष की संवैधानिक भूमिका और न्यायपालिका की निगरानी-तीनों के बीच एक स्पष्ट और स्वस्थ संतुलन स्थापित किया जा सकता है।देश की जनता आज केवल यह नहीं देख रही कि कौन सांसद किस खेमे में जा रहा है। वह यह भी देख रही है कि उसके वोट की कीमत कितनी है।वह यह देख रही है कि संसद में कानून संख्या बल से बनेंगे या राष्ट्रीय सहमति से।वह यह भी देख रही है कि संविधान सत्ता की सुविधा के लिए बदलेगा या आने वाली पीढ़ियों की लोकतांत्रिक जरूरतों को ध्यान में रखकर।सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा पहल को इसी व्यापक संदर्भ में देखना चाहिए।अदालत ने अभी किसी सांसद की सदस्यता समाप्त नहीं की है और न ही परिसीमन अथवा महिला आरक्षण की संवैधानिक प्रक्रिया पर कोई रोक लगाई है। मगर उसने एक अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्धांत को सामने रखा है – संवैधानिक अधिकारों का प्रयोग अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रह सकता।अब गेंद लोकसभा अध्यक्ष के पाले में है।20 सांसदों के जवाब आने हैं। उसके बाद अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।यदि किसी पक्ष को निर्णय पर आपत्ति होती है तो आगे न्यायिक चुनौती की संभावना भी बनी रहेगी।इसलिए यह मामला आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति और संविधान की व्याख्या दोनों के लिए महत्वपूर्ण परीक्षा बन सकता है।भारत की जनता को ऐसी राजनीति नहीं चाहिए जिसमें सत्ता के सिंहासन तक पहुँचने के लिए हर राजनीतिक जोड़-तोड़ को जायज मान लिया जाए। जनता को ऐसी संसद चाहिए जहाँ सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्र और संविधान के प्रति जवाबदेह हों, जहाँ दल-बदल व्यक्तिगत लाभ का माध्यम न बने और जहाँ बड़े संवैधानिक परिवर्तन व्यापक राष्ट्रीय विमर्श के बाद हों।लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है।लोकतंत्र जनादेश का सम्मान करने,संस्थाओं की मर्यादा बनाए रखने और सत्ता की सीमाओं को स्वीकार करने का नाम है।आज देश के सामने असली प्रश्न यही है-क्या भारतीय राजनीति संख्या के खेल से ऊपर उठकर जनादेश की मर्यादा को स्वीकार करेगी?20 बागी सांसदों का फैसला चाहे जिस दिशा में जाए, उसकी राजनीतिक गूँज दूर तक सुनाई देगी।परिसीमन और महिला आरक्षण जैसे ऐतिहासिक प्रश्नों पर सरकार को संख्या बल से अधिक जनविश्वास की आवश्यकता होगी।संसद की शक्ति सांसदों की संख्या से बनती है,मगर लोकतंत्र की शक्ति जनता के विश्वास से।यदि राजनीति में सत्ता के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त,पाला बदलने और जोड़-तोड़ का दौर जारी रहा तो आने वाली पीढ़ियाँ केवल यह नहीं पूछेंगी कि कौन सरकार में था और कौन विपक्ष में।वे यह भी पूछेंगी कि उस समय लोकतंत्र कहाँ खड़ा था।यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर सत्ता, विपक्ष,संसद और न्यायपालिका -सभी को मिलकर देना होगा।





