गोपेन्द्र नाथ भट्ट
8 सितंबर केवल कैलेंडर की एक तारीख नहीं, बल्कि दुनिया को यह याद दिलाने का दिन है कि साक्षरता व्यक्ति का अधिकार और समाज के विकास की बुनियाद है। इसकी शुरुआत 1965 में तेहरान में आयोजित शिक्षा मंत्रियों के विश्व सम्मेलन की पहल से हुई थी। यूनेस्को ने नवंबर 1966 में 8 सितंबर को अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस घोषित किया और 1967 से यह दिवस दुनिया भर में मनाया जा रहा है। 2026 में इसका 60वां वर्ष है। यूनेस्को के अनुसार आज भी दुनिया के विभिन्न देशों में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के कम से कम 73.9 करोड़ युवा और वयस्क बुनियादी साक्षरता कौशल से वंचित हैं।
भारत ने भी स्वतंत्रता के बाद साक्षरता के क्षेत्र में लंबी छलांग लगाते हुए एक उल्लेखनीय यात्रा तय की है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश की साक्षरता दर 72.98 प्रतिशत है, जो 2001 की तुलना में एक उल्लेखनीय वृद्धि थी। इसी अवधि में देश के सबसे बड़े भौगोलिक प्रदेश राजस्थान की साक्षरता दर भी 66.11 प्रतिशत दर्ज हुई थी। राज्य में पुरुष साक्षरता 79.19 प्रतिशत और महिला साक्षरता में 52.12 प्रतिशत तक वृद्धि हुई। यानी राजस्थान ने आशातीत प्रगति तो की, लेकिन लैंगिक अंतर और राष्ट्रीय औसत से पीछे रहने की चुनौती से पार पाने की कठिन परीक्षा अभी भी मौजूद है।
दुनिया के अनेक देशों की तुलना में भारत की साक्षरता यात्रा को अभी भी पूरा होना नहीं माना जा सकता है। विकसित देशों और कुछ एशियाई देशों ने लगभग सार्वभौमिक साक्षरता का स्तर हासिल कर लिया है। हालांकि भारत में भी दक्षिणी प्रदेश केरल जैसे राज्यों ने शिक्षा का बहुत ऊंचा स्तर प्राप्त किया है। इसका संदेश साफ है कि आर्थिक विकास के साथ-साथ सामाजिक जागरूकता, महिला शिक्षा और सार्वजनिक शिक्षा व्यवस्था पर लगातार निवेश साक्षरता को नई ऊंचाई प्रदान करता है लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधताओ से भरे देश में शिक्षा का औसत आंकड़ा साक्षरता की पूरी तस्वीर नहीं बताता। राज्यों और सामाजिक समूहों के बीच साक्षरता काअंतर अभी भी काफी बड़ा है।
राजस्थान इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है। प्रदेश की साक्षरता दर 2001 में 61.03 प्रतिशत से बढ़कर 2011 में 66.11 प्रतिशत हुई लेकिन जिला-वार तस्वीर में काफी अंतर दिखाई देता है। 2011 में जयपुर की साक्षरता दर 75.51 प्रतिशत और कोटा की 76.56 प्रतिशत थी, जबकि जालोर में 54.86, बाड़मेर में 56.53, बांसवाड़ा में 56.33 और प्रतापगढ़ में 55.97 प्रतिशत थी । महिला साक्षरता में तो यह अंतर और भी स्पष्ट है। यह बताता है कि राजस्थान में शिक्षा की चुनौती केवल कितने लोग साक्षर हैं का प्रश्न नहीं, बल्कि कौन पीछे है और क्यों पीछे है का प्रश्न अहम से है।यहीं से राजस्थान की स्थानीय चुनौतियां सामने आती हैं। पश्चिमी राजस्थान की दूर-दूर बसी ढाणियां, रेगिस्तानी भूगोल और परिवहन की कठिनाइयां विद्यालय तक पहुंच को प्रभावित करती हैं। दक्षिणी राजस्थान के आदिवासी बहुल इलाकों में भौगोलिक दूरी के साथ आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां भी शिक्षा की निरंतरता को प्रभावित करती हैं। ऐसे क्षेत्रों में विद्यालय का भवन उपलब्ध होना जरूरी है, लेकिन उससे भी जरूरी है कि बच्चा नियमित रूप से विद्यालय पहुंचे और वहां गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्राप्त करे।
बालिका शिक्षा राजस्थान के लिए विशेष महत्व रखती है। प्राथमिक स्तर पर लड़कियों की शिक्षा को लेकर समाज में सकारात्मक बदलाव आया है, लेकिन माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तथा उसके बाद कॉलेज तक उनकी पढ़ाई जारी रखना अभी भी एक बड़ी कसौटी बनी हुई है। आर्थिक दबाव, घरेलू जिम्मेदारियां, बाल विवाह, विद्यालय की दूरी और सुरक्षित परिवहन जैसे सवाल कुछ क्षेत्रों में आज भी प्रासंगिक हैं। इसलिए बालिका शिक्षा की सफलता केवल नामांकन से नहीं, बल्कि बारहवीं तक निरंतर शिक्षा और उसके बाद उच्च शिक्षा या कौशल प्रशिक्षण तक पहुंच से मापी जानी चाहिए।
अब शिक्षा की सबसे बड़ी चुनौती सीखने की गुणवत्ता है। स्कूल में नामांकित बच्चा वास्तव में कितना पढ़ और समझ रहा है? क्या वह अपनी कक्षा के अनुरूप लिख और गणना कर सकता है? यही शिक्षा व्यवस्था की असली परीक्षा है। बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक दक्षता पर जोर इसलिए आवश्यक है। नई शिक्षा नीति के अनुरूप अपनी मातृ भाषा में पढ़ाई का सवाल भी अहम है। राजस्थान के आदिवासी क्षेत्रों में स्थानीय भाषा और विद्यालय की शिक्षण भाषा के बीच अंतर भी शुरुआती सीखने को प्रभावित करता है। यहां स्थानीय संदर्भ और भाषा को शुरुआती शिक्षा से जोड़ना उपयोगी साबित हो सकता है। इसी तरह दूरस्थ क्षेत्रों में विषयानुकूल शिक्षकों की उपलब्धता और उनका समान वितरण भी महत्वपूर्ण है।
डिजिटल युग ने साक्षरता की परिभाषा और भी अधिक व्यापक कर दिया है। आज केवल पढ़ना-लिखना पर्याप्त नहीं। डिजिटल साक्षरता, वित्तीय समझ, सूचना की विश्वसनीयता पहचानने की क्षमता और तकनीक का सुरक्षित उपयोग भी आधुनिक साक्षरता का हिस्सा हैं। शहर और गांव, समृद्ध और वंचित परिवारों के बीच डिजिटल संसाधनों की असमानता को कम करना अब शिक्षा नीति की अनिवार्य जिम्मेदारी है।
अंतर्राष्ट्रीय साक्षरता दिवस इसलिए उपलब्धियों पर संतोष करने के बजाय अगली चुनौती पहचानने का अवसर है। राजस्थान ने विद्यालयों और नामांकन के विस्तार की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब लक्ष्य होना चाहिए—हर बच्चे को स्कूल तक पहुंचाना, हर बच्चे को स्कूल में टिकाना और हर बच्चे को वास्तव में सीखने योग्य बनाना।
आखिरकार साक्षरता अक्षरों को पहचानने से शुरू होती है, लेकिन सोचने और निर्णय लेने की क्षमता पर जाकर सार्थक होती है। राजस्थान की अगली शैक्षिक छलांग साक्षरता प्रतिशत बढ़ाने से आगे, शिक्षा की गुणवत्ता और समान अवसर सुनिश्चित करने की होनी चाहिए। साथ ही साक्षरता की असली परीक्षा अक्षर ज्ञान से जीवन ज्ञान तक होनी चाहिए । यही वह रास्ता है जो अक्षर ज्ञान को सामाजिक परिवर्तन की वास्तविक शक्ति में बदल सकता है।





