दीपक कुमार त्यागी
“वैसे तो किसी भी तरह की शराब पीना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है, लेकिन हमारे देश में तो अलग ही खेल चलता आ रहा है दशकों से ही व्हिस्की और रम के निर्माण में देश में प्राकृतिक सामग्रियों की जगह स्पिरिट में व्हिस्की और रम के आर्टीफिशियल फ्लेवर्ड को मिलाकर के बनाया जाता है। शराब पीने के शौकीनों के लिए यह स्थिति बेहद ही चिंताजनक है वहीं सिस्टम को ठेंगा दिखाने वाली है। चिंताजनक बात है कि व्हिस्की और रम के फ्लेवर्ड स्पिरिट से निर्माण की असलियत को पूरी तरह से उपभोक्ताओं से छिपाते हुए कंपनियां बेखौफ होकर के उपभोक्ता के संज्ञान में लाएं बिना ही धड़ल्ले से बाज़ार में बेचकर भारी मुनाफा कमाने का कार्य कर रही थी। व्हिस्की और रम को फ्लेवर्ड मिक्स स्पिरिट से बनाने की असलियत छिपाकर के शराब कंपनियां बेखौफ होकर दशकों से शराब पीने के शौकीनों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ करती रही और हमारे देश का सिस्टम चुपचाप बैठकर तमाशा देखता रहा।”
हमारे प्यारे देश भारत में शराब पीने के शौकीन लोगों के लिए एक बेहद चौंकाने वाली ख़बर है, यह लोग दशकों से आर्टीफिशियल फ्लेवर्ड मिक्स स्पिरिट को व्हिस्की और रम समझकर के पीने का कार्य कर रहे थे, जो स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होती है। व्हिस्की और रम बनाने वाली कई कंपनियों ने निर्माण की असलियत को अपने उपभोक्ताओं से छिपाकर के उन्हें दशकों से ठगने का कार्य किया है। साथ ही इन शराब की कंपनियों ने पिछले कई दशकों से शराब पीने के शौकीन लोगों के स्वास्थ्य से भी खिलवाड़ करने का अपराध किया है। लेकिन अब शराब कंपनियों की व्हिस्की व रम के निर्माण करने की हकीकत उपभोक्ताओं के सामने आने पर उपभोक्ताओं का यह वर्ग अपने आपको ठगा हुआ महसूस कर रहा है। शराब के उपभोक्ता और देश में आम जनमानस यह जानकार के अचंभित हैं कि 18वीं सदी की शुरुआत से ही भारत में व्हिस्की और रम बनाने का कार्य शुरू हो चुका है, लेकिन इसमें प्राकृतिक निर्माण सामग्री की जगह स्पिरिट में व्हिस्की और रम का केमिकल युक्त फ्लेवर्ड डालकर के शराब पीने के शौकीन लोगों को पिलाने का खेल बेखौफ होकर के धड़ल्ले से कैसे चल रहा था।
लेकिन अफसोस की बात यह है कि एक तरफ़ तो हम इक्कीसवीं सदी के आधुनिक भारत होने की ताल ठोंक रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ़ आज भी देश में उपभोक्ताओं के अधिकारों का कंपनियों के द्वारा बेखौफ होकर के हनन किया जाता है। इक्कीसवीं के आधुनिक भारत में स्पिरिट से शराब बनाने के खेल में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) का सिस्टम भी लंबे समय के बाद जागा है, जबकि 2008 में स्थापना होने के बाद वर्ष 2011 से ही फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) धरातल पर पूर्ण रूप से प्रभावी ढंग से कार्य कर रहा था। लेकिन फिर भी आज तक ना जाने क्यों उसने शराब कंपनियों की व्हिस्की व रम निर्माण करने की प्रक्रिया की असलियत को जानने की जहमत नहीं उठाई, यह स्थिति देश में उपभोक्ताओं के अधिकारों के प्रति सिस्टम की लापरवाही को दर्शाती है।
हालांकि भारत में विभिन्न प्रकार के मादक पेय पदार्थों, मदिरा व शराब बनाने का इतिहास बेहद प्राचीन व सदियों पुराना है। विभिन्न प्राचीन ग्रंथों में मदिरा, मादक पेय पदार्थों और शराब का उल्लेख मिलता है। कौटिल्य के अर्थशास्त्र में बारह प्रकार के मादक पेय पदार्थों का उल्लेख मिलता है। दुनिया भर में प्रसिद्ध चरक संहिता जिसे 400 ईसा पूर्व से 600 ईस्वी के बीच संकलित किया गया है, इसमें भी अनाज, शहद, गन्ना, अंगूर, आम और महुआ के फूलों आदि से बने 84 प्रकार के मादक पेय पदार्थों का विवरण दिया है। वहीं आदिवासी जन जातियां और समुदाय अपने पूर्वजों की तरह ही आज के दौर में भी अनाजों और फूलों से आरा, लोह पानी और महुआ आदि जैसे पारंपरिक मादक पेय पदार्थों का निर्माण करते हैं।
हांलांकि मादक पेय पदार्थों के निर्माण के निशान हमें प्राचीन सिंधु घाटी सभ्यता से ही मिलते चले आ रहे है। सिंधु घाटी सभ्यता के उत्खनन स्थलों से प्राप्त हुए मिट्टी के बर्तन, आसवन के उपकरण और कुंड इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि यहां पर रहने वाले लोग भी प्रागैतिहासिक काल में भी अनाज, फल, फूल आदि पदार्थ का उपयोग करके विभिन्न प्रकार के मादक पेय पदार्थों का किण्वन, निर्माण और आसवन आदि करते थे। मुगलों के काल में भी जमकर के मादक पेय पदार्थों का निर्माण व सेवन होता था। पुर्तगालियों ने काजू से बनी फेनी को भारत के लोकप्रिय स्थानीय पेय पदार्थों की सूची में शामिल किया था। ब्रिटिश काल में शराब निर्माण अधिकारी और सेना के जवान के लिए ही होता था, अंग्रेजों ने भारतीय सेना के लिए रम बनाने हेतु भारत में कई शराब भट्ठियां विभिन्न स्थानों पर स्थापित की थी। इतिहासकारों के अनुसार अंग्रेजों के राज में सबसे पहले शराब की भट्ठियां वर्ष 1805 में कानपुर में खुलीं थी और भारत की आज़ादी के समय तक पूरे देश में ऐसी लगभग 40 भट्ठियां खुल चुकी थीं। अंग्रेजों के द्वारा वर्ष 1716 तक बीयर को इंग्लैंड से भारत में आयात किया जाता था, लेकिन लंबी यात्रा से बीयर की क्वालिटी खराब हो जाने की वज़ह से एडवर्ड अब्राहम डायर ने वर्ष 1830 में भारत की पहली कसौली ब्रेवरी की स्थापना की। यहां से लॉयन ब्रांड बीयर का उत्पादन शुरू हुआ। हालांकि धीरे-धीरे शराब भारत के आम लोगों तक भी पहुंच गई, जिसके चलते देश में इसकी औधौगिक ईकाई लगनी शुरू हो गई थी। वर्ष 1915 में स्कॉटलैंड के एक बड़े बिजनेसमैन ने दक्षिण भारत में चार ब्रेवरी का विलय कराकर यूनाइटेड ब्रुअरीज की स्थापना की थी। वर्ष 1947 में भारत के व्यापारी विट्टल माल्या ने इस कंपनी के शेयर खरीद लिए थे और वह इस कंपनी के पहले भारतीय निदेशक चुने गए, विट्टल माल्या विजय माल्या के पिता थे और उनके निधन के बाद यह कंपनी विजय माल्या के पास आ गई थी।
वैसे देखा जाए तो पारंपरिक रूप से प्राकृतिक सामग्री के किण्वन / फर्मेंटेशन और लकड़ी के पीपों (बैरल) में परिपक्वता (एजिंग) के अनुसार व्हिस्की व रम का निर्माण होता हैं। लेकिन अफसोस की बात यह है कि भारत में एक्स्ट्रा न्यूट्रल अल्कोहल (ENA) में कृत्रिम या नेचर – आइडेंटिकल फ्लेवरों को मिलाकर के व्हिस्की और रम तैयार करने का शॉर्टकट अंग्रेज के समय से ही चलन में चलता आ रहा है। हाल ही में भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने व्हिस्की व रम के निर्माण में चल रही भ्रामक और मानकीकृत की प्रक्रिया पर सख्त शिकंजा कसते हुए कई नामी ब्रांड्स की बिक्री पर रोक लगाने का कार्य किया है।
हमें व्हिस्की व रम के निर्माण के शॉर्टकट और मिलावट के इस पूरे खेल को सरल शब्दों में समझना होगा। कंपनियां पारंपरिक अनाज से व्हिस्की के निर्माण के लिए या गुड़ / गन्ने को रम के निर्माण के लिए असली किण्वन / फर्मेंटेशन और लकड़ी के पीपों (बैरल) में परिपक्वता (एजिंग) के अनुसार प्रक्रिया अपनाने के बजाय व्हिस्की व रम के निर्माण के लिए सीधे सस्ते न्यूट्रल अल्कोहल (ENA) का उपयोग करती हैं और बेस्वाद स्पिरिट में ऊपर से आर्टीफिशियल कैमिकल से तैयार व्हिस्की व रम के फ्लेवर को मिलाकर उसे असली व्हिस्की व रम का रंग-रूप दे दिया जाता है। वहीं कंपनी शराब की बोतलों पर ‘वर्षों पुरानी ब्लेंडेड’ होने का दावा करते हुए अधिक कीमत वसूलती हैं, जबकि लैब जांच में परिपक्व स्पिरिट की मात्रा 5% से भी कम निकलती है, तो नियमानुसार शराब को ‘वर्षों पुरानी ब्लेंडेड’ नहीं माना जा सकता है। वहीं भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) के स्पष्ट नियम हैं कि यदि व्हिस्की व रम में बाहरी फ्लेवर मिलाए गए हैं, तो उन्हें सीधे रम या व्हिस्की कह कर के कंपनियां उपभोक्ता को नहीं बेच सकती हैं, बल्कि उन्हें ‘व्हिस्की फ्लेवर्ड स्पिरिट’ व ‘रम फ्लेवर्ड स्पिरिट’ स्पष्ट रूप से लिखे हुए लेबल लगा कर ही बेच सकती हैं।
फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) ने हाल ही व्हिस्की व रम के निर्माण के इस खेल को पकड़ने का कार्य किया है, उन्होंने शराब के कई ब्रांडों की लैब टेस्टिंग रिपोर्ट आने पर इस पूरे खेल को अच्छे से समझा है कि भारत में शराब का निर्माण करने वाली अधिकतर कंपनियां पारंपरिक तरीके से शराब तैयार करने के बजाय शराब निर्माण के लिए शॉर्टकट अपना रही हैं, कंपनियां व्हिस्की व रम के निर्माण के लिए स्पिरिट में ऐसा आर्टिफिशियल फ्लेवर मिला रही हैं जिसके स्पिरिट में मिश्रण करने से उसका स्वाद व खुशबू व्हिस्की व रम जैसा हो जाता है। जबकि व्हिस्की व रम में नियमानुसार व्हिस्की व रम का फ्लेवर्ड नहीं मिलाया जाता है और कंपनियों की छल व हठधर्मिता देखिए की वह इस बात का जिक्र व्हिस्की व रम की बोतल पर नहीं करती हैं, वह उपभोक्ताओं से इस असलियत छिपाकर के लिए यह बड़ा धोखा व छल करती हैं। जिस स्थिति पर फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) का स्पष्ट मानना है कि व्हिस्की व रम के इस तरह के उत्पाद न केवल घटिया स्तर के हैं, बल्कि बोतल में बंद शराब के बारे में कंपनियां अपने उपभोक्ताओं को गुमराह भी करने का कार्य भी कर रही हैं।
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने शराब के कई ब्रांडों की लैब टेस्टिंग में तय मानकों के अनुरूप टेस्ट रिपोर्ट नहीं आने के आधार पर और उत्पाद के बारे में पैक पर सही जानकारी नहीं देने के चलते ही शराब बनाने वाली कई कंपनियों के खिलाफ कार्रवाई करनी शुरू की है। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने मोहन रॉकी स्प्रिंग वॉटर के प्रसिद्ध ब्रांड ओल्ड मोंक वेरिएंट्स, यूनाइटेड स्पिरिट्स के प्रसिद्ध ब्रांड मैकडॉवेल्स नंबर 1 रम, एंटीक्विटी ब्लू व्हिस्की और रॉयल चैलेंज व्हिस्की, इनब्रू बेवरेजेज के प्रसिद्ध ब्रांड बैगपाइपर डीलक्स व्हिस्की और ओल्ड कास्क डीलक्स XXX रम और एसोसिएटेड अल्कोहल एंड ब्रुअरीज के सेंट्रल प्रोविंस व्हिस्की और मैकडॉवेल्स नंबर 1 सेलिब्रेशन मैच्योर XXX रम आदि ब्रांड की शराब बिक्री पर रोक लगा दी है।
वैसे भी देखा जाए तो भारत की वर्ष 2026 में जनसंख्या लगभग 147.6 करोड़ है, सबसे अधिक जनसंख्या के दम पर ही भारत दुनिया का सबसे बड़ा बाजार भी है, देश व दुनिया की हर छोटी-बड़ी कंपनियों का यह सपना है कि वह भारतीय बाजार में अपनी पैठ बनाए। उसी कड़ी में दुनिया भर की छोटी व बड़ी शराब कंपनियां भी अब भारत पर फोकस करने लगी हैं। वहीं जिस तेज़ी के साथ भारत में राज्य सरकारों ने राजस्व कमाने के लालच में शहर व ग्रामीण क्षेत्रों के गली-मोहल्लों तक में भी शराब के ठेके खोलने की होड़ लगा रखी है, उस स्थिति को देख लगता है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘नशा मुक्त युवा विकसित भारत संकल्प अभियान’ अभी बहुत दूर की कोड़ी है, उसके ठीक उल्ट आने वाले समय में देश में शराब के शौकीनों की संख्या में तेज़ी से इज़ाफ़ा होने की पूरी उम्मीद है, सरकार को तय करना चाहिए कि शराब के शौकीन इन लोगों को शराब के नाम पर देश में स्पिरिट में फ्लेवर्ड मिक्स करके नहीं बेचा जाए, बल्कि उन्हें सही क्वालिटी की व्हिस्की व रम ठेकों पर मिलती रहे। इसलिए व्हिस्की व रम में मिलावटखोरी को बंद करने के लिए केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय व भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) को शराब कंपनियों पर नकेल कसनी चाहिए।





