अमंगल हारी, करुणामयी शिवशक्ति का पावन पर्व है सावन शिवरात्रि

Sawan Shivratri is the sacred festival of the compassionate Shiva-Shakti, the dispeller of all inauspiciousness

सावन शिवरात्रि केवल भगवान शिव के पूजन और जलाभिषेक का पर्व नहीं बल्कि भीतर के अंधकार, अहंकार, क्रोध और नकारात्मकता के संहार का आध्यात्मिक अवसर है। नीलकंठ शिव का त्याग हमें सिखाता है कि संसार के विष को धारण कर भी करुणा और संतुलन बनाए रखना ही सच्चा शिवत्व है। सावन की पवित्रता में गूंजता ‘ॐ नमः शिवाय’ हमें आत्मशुद्धि, संयम, समरसता और मानवता के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है।

योगेश कुमार गोयल

भारत में सर्वाधिक महत्व जिस देव का है, वो देवाधिदेव भगवान शिव ही हैं, जो आज भी समूचे भारतवर्ष में उतने ही पूजनीय और वंदनीय हैं, जितने सदियों पहले। देशभर में भगवान शिव की पूजा-उपासना व्यापक स्तर पर होती है, इसीलिए ‘शिवरात्रि’ पर्व को भारत में राष्ट्रीय पर्व का दर्जा प्राप्त है। वैसे तो शिवरात्रि हर माह मनती है किन्तु इनमें से फाल्गुन महाशिवरात्रि और सावन शिवरात्रि की महत्ता सर्वाधिक है। सावन शिवरात्रि प्रायः माह की कृष्ण पक्ष चतुर्दशी को मनाई जाती है, जिसे भगवान शिव के प्रति भारतीयों की आस्था की प्रतीक ‘कांवड़ यात्रा’ का समापन दिवस भी कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार भारत में सावन शिवरात्रि का बहुत महत्व है। हिंदू पंचांग के अनुसार, सावन की शिवरात्रि सावन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को मनाई जाती है और वर्ष यह तिथि 11 अगस्त को प्रातः 4 बजकर 43 मिनट से शुरू होकर 12 अगस्त रात्रि 01 बजकर 51 मिनट तक रहेगी। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, यह पर्व 11 अगस्त को ही मनाया जाएगा और इसी दिन शिवलिंग का जलाभिषेक होगा। सावन शिवरात्रि के पावन अवसर पर ही कांवड़ यात्रा का भी समापन होता है। ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, इस साल सावन शिवरात्रि पर चतुर्ग्रही योग बन रहा है और इस दिन कर्क राशि में सूर्य, गुरु, बुध और चंद्रमा एक साथ बैठकर चतुर्ग्रही योग का निर्माण करने वाले हैं।

धार्मिक ग्रंथों में ‘शिव’ और ‘रात्रि’ के शाब्दिक अर्थ को परिभाषित करते हुए बताया गया है, जिसमें सारा जगत शयन करता है, जो विकार रहित है, वह शिव है अथवा जो अमंगल का ह्रास करते हैं, वे ही सुखमय, मंगलमय शिव हैं। जो सारे जगत को अपने अंदर लीन कर लेते हैं, वे ही करूणासागर भगवान शिव हैं। जो भगवान नित्य, सत्य, जगत आधार, विकार रहित, साक्षीस्वरूप हैं, वे ही शिव हैं। महासमुद्र रूपी शिव ही एक अखंड परम तत्व हैं, इन्हीं की अनेक विभूतियां अनेक नामों से पूजी जाती हैं, यही सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान हैं, यही व्यक्त-अव्यक्त रूप से ‘सगुण ईश्वर’ और ‘निर्गुण ब्रह्म’ कहे जाते हैं तथा यही परमात्मा, जगत आत्मा, शम्भव, मयोभव, शंकर, मयस्कर, शिव, रूद्र आदि कई नामों से संबोधित किए जाते हैं। ‘रात्रि’ शब्द ‘रा’ दानार्थक धातु से बना है अर्थात् जो सुखादि प्रदान करती है, वह ‘रात्रि’ है। रात्रि सदा आनन्ददायिनी होती है, अतः सबकी आश्रयदात्री होने के कारण उसकी स्तुति की गई है। इस प्रकार शिवरात्रि का अर्थ है, वह रात्रि, जो आनंद देने वाली है, जिसका शिव नाम के साथ विशेष संबंध है।

भगवान शिव को ‘कालों का काल’ और ‘देवों का देव’ अर्थात् ‘महादेव’ कहा गया है। देव-दानव, मानव-प्रेत, भगवान शिव इन सभी के आराध्य देव रहे हैं। ‘भोले बाबा’ के रूप में सर्वत्र पूजनीय भगवान शिव को समस्त देवों में अग्रणीय और पूजनीय इसलिए भी माना गया है क्योंकि वह अपने भक्तों पर बहुत जल्दी प्रसन्न होते हैं और दूध या जल की धारा, बेलपत्र व भांग की पत्तियों की भेंट से ही अपने भक्तों पर प्रसन्न हो जाते हैं तथा उनकी मनोकामना पूर्ण करते हैं। भगवान शिव को भारत की भावनात्मक एवं राष्ट्रीय एकता तथा अखण्डता का प्रतीक माना गया है। एक होते हुए भी शिव के नटराज, पशुपति, हरिहर, त्रिमूर्ति, मृत्युंजय, अर्द्धनारीश्वर, महाकाल, भोलेनाथ, विश्वनाथ, ओंकार, शिवलिंग, बटुक, क्षेत्रपाल, शरभ इत्यादि अनेक रूप हैं। ग्रंथों में भगवान शिव के बारे में यही उल्लेख मिलता है कि तीनों लोकों की अपार सुन्दरी और शीलवती गौरी को अर्धांगिनी बनाने वाले शिव प्रेतों और भूत-पिशाचों से घिरे रहते हैं। उनका शरीर भस्म से लिपटा रहता है, गले में सर्पों का हार शोभायमान रहता है, कंठ में विष है, जटाओं में जगत तारिणी गंगा मैया हैं और माथे में प्रलयंकर ज्वाला है। बैल (नंदी) को भगवान शिव का वाहन माना गया है और ऐसी मान्यता है कि स्वयं अमंगल रूप होने पर भी भगवान शिव अपने भक्तों को मंगल, श्री और सुख-समृद्धि प्रदान करते हैं।

कहा जाता है कि भगवान विष्णु ने भगवान शिव की अनुकम्पा प्राप्त करने के लिए उन्हें अपनी एक आंख समर्पित कर दी थी। इस बारे में कहा गया है कि भगवान विष्णु जब शिव को प्रसन्न करने के लिए 1008 कमल के फूलों से उनका अभिषेक कर रहे थे, तब आखिर में एक कमल कम रह गया। इस पर भगवान विष्णु ने तुरंत कटार से अपनी एक आंख निकाली और कम रहे कमल के स्थान पर शिव को अपनी आंख अर्पित कर दी। इससे शिव विष्णु पर इतने प्रसन्न हुए कि उन्होंने भगवान विष्णु को अपना दिव्य मंत्र प्रदान कर दिया:-

ॐ त्रयम्बकं यजामहे
सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम।
उर्वारूकमिव बन्धनात।
मृत्योर्मुक्षीय मामृतात।।

भगवान शिव के मस्तक पर अर्द्धचंद्र शोभायमान है। इसके संबंध में कहा जाता है कि समुद्र मंथन के समय समुद्र से विष और अमृत के कलश उत्पन्न हुए थे। इस विष का प्रभाव इतना तीव्र था कि इससे समस्त सृष्टि का विनाश हो सकता था, ऐसे में भगवान शिव ने इस विष का पान कर सृष्टि को नया जीवनदान दिया जबकि अमृत का पान चन्द्रमा ने कर लिया। विषपान करने के कारण भगवान शिव का कंठ नीला पड़ गया, जिससे वे ‘नीलकंठ’ के नाम से जाने गए। विष के भीषण ताप के निवारण के लिए भगवान शिव ने चन्द्रमा की एक कला को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। यही भगवान शिव का तीसरा नेत्र है और इसी कारण भगवान शिव ‘चन्द्रशेखर’ भी कहलाए।