अजय कुमार
उत्तर प्रदेश की राजनीति में अयोध्या एक बार फिर सबसे बड़ा सियासी अखाड़ा बनने जा रही है। समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव 12 दिसंबर 2026 को परिवार के साथ रामलला के दर्शन करने पहुंचेंगे। हनुमानगढ़ी में भी माथा टेकेंगे। सपा नेता तेज नारायण पांडेय उर्फ पवन पांडेय ने इस कार्यक्रम की घोषणा की है। लेकिन सवाल सिर्फ इतना नहीं कि अखिलेश रामलला के सामने शीश झुकाएंगे। असली सवाल यह है कि आखिर तीन दशक से अधिक समय तक अयोध्या की राजनीति से दूरी बनाए रखने के आरोप झेलने के बाद अब उन्हें मंदिर पहुंचने की जरूरत क्यों महसूस हुई? क्या यह मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक विरासत से आगे निकलने की कोशिश है या भाजपा के हिंदुत्व के राजनीतिक विमर्श को सीधी चुनौती देने की तैयारी? इस दौरे ने भाजपा के नेताओं को भी अखिलेश पर हमला करने का नया अवसर दिया है। अक्टूबर में अखिलेश अयोध्या पहुंचे थे, लेकिन रामलला के दर्शन नहीं किए। इसी को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उन्हें मंदिर जाने और पश्चाताप करने की नसीहत दी। भाजपा नेताओं ने पुराने अयोध्या गोलीकांड को फिर उठाया। सवाल उठता है कि क्या राम मंदिर का रास्ता अब विपक्षी नेताओं के लिए राजनीतिक परीक्षा का रास्ता भी बन गया है? भाजपा की रणनीति साफ दिखाई देती है। वह चाहती है कि अखिलेश का हर कदम 1990 की घटना के संदर्भ में देखा जाए। इससे चुनावी बहस रोजगार, महंगाई, किसान और सरकारी कामकाज से हटकर धार्मिक पहचान पर केंद्रित हो सकती है।
इस हमले में ओम प्रकाश राजभर ने भी अपना राजनीतिक तीर चलाया। उन्होंने अखिलेश के अयोध्या दौरे पर तंज कसते हुए कहा कि मंदिर जाते तो दाढ़ी-टोपी नाराज हो जाती। राजभर ने आरोप लगाया कि अखिलेश मुस्लिम वोटों के डर से रामलला के दर्शन नहीं कर रहे थे। उन्होंने उनसे पश्चाताप करने की नसीहत भी दी। राजभर की टिप्पणी महज व्यक्तिगत कटाक्ष नहीं, बल्कि सपा के एमवाई समीकरण पर सीधा हमला है। भाजपा और उसके सहयोगी दल यह सवाल खड़ा करना चाहते हैं कि क्या सपा की राजनीति धार्मिक आस्था के मामले में भी वोटों के हिसाब से चलती है? लेकिन इस बहस में एक सवाल राजभर से भी पूछा जाना चाहिए: क्या किसी नेता की धार्मिक आस्था का फैसला उसके मंदिर जाने या न जाने से किया जा सकता है? अखिलेश के लिए यह सवाल आसान नहीं है। 1990 की अयोध्या गोलीबारी समाजवादी पार्टी की राजनीति पर आज भी सबसे भारी ऐतिहासिक बोझ है। 30 अक्टूबर और 2 नवंबर को राम जन्मभूमि आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर पुलिस ने गोली चलाई थी। उस समय मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री थे। गोलीबारी में कई लोगों की जान गई। मृतकों की संख्या को लेकर अलग-अलग दावे रहे हैं। मुलायम सिंह ने बाद में 28 मौतों का उल्लेख किया था। तत्कालीन सरकार ने कार्रवाई को कानून-व्यवस्था और सांप्रदायिक तनाव रोकने की मजबूरी बताया, जबकि भाजपा ने इसे रामभक्तों पर गोली चलाने की घटना के रूप में अपनी राजनीति का प्रमुख मुद्दा बनाया। यही वह इतिहास है जिसे भाजपा हर चुनाव में सपा के सामने रखती है।
लेकिन अयोध्या की कहानी 1990 पर खत्म नहीं होती। दिसंबर 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद उत्तर प्रदेश की राजनीति का सामाजिक समीकरण बदल गया। 1993 के विधानसभा चुनाव में सपा और बसपा ने गठबंधन किया। सपा को 109 और बसपा को 67 सीटें मिलीं। भाजपा 177 सीटों पर सिमट गई। मुलायम सिंह दोबारा मुख्यमंत्री बने। इसी दौर में मुस्लिम-यादव यानी एमवाई समीकरण सपा की राजनीतिक पहचान बना। इसलिए 1990 की गोलीबारी को केवल कानून-व्यवस्था की घटना बताकर छोड़ देना भी इतिहास को अधूरा पढ़ना होगा। उसके राजनीतिक परिणामों ने प्रदेश की सत्ता और सामाजिक गठबंधनों को दशकों तक प्रभावित किया। अब अखिलेश उस विरासत के साथ अपनी अलग राजनीतिक पहचान बनाने की कोशिश कर रहे हैं। उनका पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक समीकरण सपा के पुराने एमवाई आधार का विस्तार है। लेकिन भाजपा का आरोप है कि सपा की राजनीति अब भी मुस्लिम मतदाताओं पर निर्भर है। ऐसे में रामलला के दर्शन अखिलेश के लिए एक प्रतीकात्मक जवाब हो सकते हैं। हालांकि मंदिर पहुंचने से यह साबित नहीं होगा कि पुराने सवाल समाप्त हो गए। उन्हें यह स्पष्ट करना होगा कि धार्मिक आस्था और सामाजिक न्याय को साथ लेकर उनकी राजनीति किस दिशा में जाएगी।
2024 के लोकसभा चुनाव ने भाजपा के लिए अयोध्या को लेकर एक असहज राजनीतिक सवाल जरूर खड़ा किया था। फैजाबाद सीट पर सपा के अवधेश प्रसाद ने भाजपा के लल्लू सिंह को 54,567 वोटों से हराया। अवधेश प्रसाद को 5,54,289 वोट मिले, जबकि भाजपा को 4,99,722 वोट प्राप्त हुए। जिस संसदीय क्षेत्र में राम मंदिर निर्माण को भाजपा अपनी बड़ी उपलब्धि बताती रही, वहीं पार्टी की हार ने यह दिखाया कि चुनाव केवल धार्मिक प्रतीकों से नहीं जीते जाते। स्थानीय नाराजगी, उम्मीदवार, सामाजिक समीकरण और संविधान जैसे मुद्दे भी मतदाताओं के फैसले को प्रभावित करते हैं। सपा ने इस जीत को पीडीए की राजनीति से जोड़ा और अवधेश प्रसाद को दलित प्रतिनिधित्व के प्रतीक के रूप में सामने रखा। अब 2027 में दोनों पक्षों के सामने नई चुनौती होगी। भाजपा अखिलेश को 1990 की विरासत के कठघरे में खड़ा करेगी। सपा भाजपा से पूछेगी कि मंदिर निर्माण के बाद अयोध्या के आम नागरिक को क्या मिला? क्या स्थानीय दुकानदारों की आमदनी बढ़ी? क्या युवाओं को स्थायी रोजगार मिला? क्या विकास परियोजनाओं का लाभ स्थानीय परिवारों तक पहुंचा? क्या विस्थापन और मुआवजे की शिकायतों का समाधान हुआ? ये सवाल भी उतने ही जरूरी हैं जितना राम मंदिर का राजनीतिक महत्व।
अखिलेश की 12 दिसंबर की यात्रा इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि उन्होंने 2024 में प्राण प्रतिष्ठा के समय बाद में परिवार के साथ दर्शन करने की बात कही थी। अब वह उसी वादे को पूरा करने जा रहे हैं। लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि भाजपा के आरोपों का जवाब केवल मंदिर में माथा टेककर नहीं दिया जा सकता। उन्हें अपनी राजनीति का स्पष्ट पक्ष रखना होगा। इसी तरह भाजपा को भी यह बताना होगा कि हिंदुत्व के साथ शासन, रोजगार और विकास का उसका हिसाब क्या है। अयोध्या में अब मुकाबला सिर्फ मंदिर जाने और नहीं जाने का नहीं है। यह इतिहास, आस्था, सामाजिक न्याय और सत्ता के जवाबदेही वाले सवालों का मुकाबला है। अखिलेश का दर्शन भाजपा के आरोपों को स्वतः समाप्त नहीं करेगा और भाजपा के हमले भी सपा के सामाजिक आधार को स्वतः खत्म नहीं कर देंगे। 2027 में मतदाता के सामने असली सवाल यही होगा कि कौन इतिहास की बहस से आगे निकलकर वर्तमान की समस्याओं का जवाब देता है। रामलला के दरबार में शीश झुकाना आस्था है, लेकिन जनता की अदालत में जवाब देना राजनीति की असली कसौटी है।





