अजय कुमार
23 जुलाई से स्कॉटलैंड के ग्लासगो में शुरू हो रहे 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स भारतीय खेलों के लिए सिर्फ एक और बहु-खेल प्रतियोगिता नहीं हैं। यह वह टूर्नामेंट है, जिसने शुरू होने से पहले ही भारत के मेडल समीकरण को पूरी तरह बदल दिया है। हर बार जब कॉमनवेल्थ गेम्स का आगाज होता है तो देश में चर्चा होती है कि भारत 60 या उससे ज्यादा पदक जीत पाएगा या नहीं, कौन-सा खिलाड़ी गोल्ड लाएगा और मेडल तालिका में चौथा या तीसरा स्थान मिलेगा या नहीं। लेकिन इस बार माहौल अलग है। नीरज चोपड़ा मैदान में नहीं हैं, पीवी सिंधु नहीं हैं, भारतीय हॉकी टीम नहीं है, महिला क्रिकेट टीम नहीं है, मनु भाकर नहीं हैं और सबसे बड़ी बात यह कि जिन खेलों ने पिछले एक दशक में भारत को कॉमनवेल्थ की ताकत बनाया, उनमें से अधिकांश इस बार खेलों का हिस्सा ही नहीं हैं।यही वजह है कि ग्लासगो पहुंचा भारतीय दल पहले के मुकाबले छोटा भी है और उसकी पदक संभावनाएं भी सीमित दिखाई दे रही हैं। भारत ने इस बार करीब 125 खिलाड़ियों को भेजा है, जबकि 2022 के बर्मिंघम कॉमनवेल्थ गेम्स में 210 एथलीट उतरे थे। उस समय भारत ने 22 स्वर्ण, 16 रजत और 23 कांस्य सहित कुल 61 पदक जीतकर ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और कनाडा के बाद चौथा स्थान हासिल किया था। लेकिन 2026 की कहानी 2022 जैसी बिल्कुल नहीं है। इस बार मुकाबला विरोधी खिलाड़ियों से कम और बदले हुए प्रारूप से ज्यादा है।अगर केवल आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और साफ हो जाती है। बर्मिंघम में भारत के 61 पदकों में से 30 पदक ऐसे खेलों से आए थे जिन्हें ग्लासगो से बाहर कर दिया गया है। यानी पिछले प्रदर्शन का लगभग 49 प्रतिशत हिस्सा इस बार शुरू होने से पहले ही खत्म हो चुका है। कुश्ती अकेले 12 पदक लेकर आई थी। टेबल टेनिस से 7 पदक मिले थे। बैडमिंटन ने 6 पदक दिए थे। हॉकी और स्क्वैश ने मिलकर 4 पदक दिलाए थे, जबकि महिला क्रिकेट टीम ने रजत पदक जीता था। यही वे खेल थे जिन्होंने भारत को लगातार शीर्ष देशों में बनाए रखा। अब इनमें से कोई भी खेल ग्लासगो के कार्यक्रम में नहीं है।
सबसे दिलचस्प बात यह है कि यह फैसला किसी खेल प्रदर्शन की वजह से नहीं, बल्कि आर्थिक मजबूरी के कारण लिया गया। 2026 कॉमनवेल्थ गेम्स की मेजबानी पहले ऑस्ट्रेलिया के विक्टोरिया राज्य को मिली थी। शुरुआती अनुमान के मुताबिक आयोजन पर करीब ढाई अरब ऑस्ट्रेलियाई डॉलर खर्च होने थे, लेकिन कुछ ही महीनों में लागत बढ़कर सात अरब डॉलर के आसपास पहुंचने लगी। इसके बाद विक्टोरिया सरकार ने साफ कह दिया कि इतनी बड़ी रकम खर्च करना संभव नहीं है और उसने मेजबानी छोड़ दी। अचानक पूरा आयोजन संकट में आ गया। तीन साल से भी कम समय में कोई नया मेजबान तैयार होना आसान नहीं था। ऐसे समय में ग्लासगो आगे आया। 2014 में सफल मेजबानी कर चुका यह शहर तैयार तो था, लेकिन उसने भी शर्त रखी कि वह केवल सीमित संसाधनों के साथ छोटे संस्करण का आयोजन करेगा। नया गेम्स विलेज नहीं बनाया जाएगा। खिलाड़ी होटलों में ठहरेंगे। प्रतियोगिताएं केवल चार मौजूदा परिसरों में होंगी और उन्हीं खेलों को रखा जाएगा जिनके लिए पहले से बुनियादी ढांचा मौजूद है। यही कारण है कि क्रिकेट, हॉकी, बैडमिंटन, टेबल टेनिस, कुश्ती, स्क्वैश, बीच वॉलीबॉल, ट्रायथलॉन और रग्बी सेवन्स जैसे खेल बाहर हो गए।इस बार पूरे आयोजन में केवल 10 खेल शामिल हैं एथलेटिक्स, तैराकी, ट्रैक साइक्लिंग, वेटलिफ्टिंग, बॉक्सिंग, जूडो, आर्टिस्टिक जिम्नास्टिक्स, लॉन बॉल्स, नेटबॉल और 3×3 बास्केटबॉल। कुल 215 स्वर्ण पदकों पर मुकाबला होगा। तुलना करें तो बर्मिंघम में 19 खेल थे और पदकों की संख्या भी कहीं ज्यादा थी। यानी मेडल जीतने के अवसर ही काफी कम हो गए हैं।
भारत की उम्मीदें अब मुख्य रूप से एथलेटिक्स, वेटलिफ्टिंग, मुक्केबाजी और जूडो पर टिकी हैं। लेकिन यहां भी चुनौती कम नहीं है। पेरिस ओलंपिक के बाद भारतीय मुक्केबाजी और भारोत्तोलन का प्रदर्शन उम्मीदों के अनुरूप नहीं रहा। मीराबाई चानू जैसी स्टार खिलाड़ी चोटों और फिटनेस से जूझती रहीं। महिला मुक्केबाजी में भी पिछले दो वर्षों में वैसा दबदबा नहीं दिखा जैसा टोक्यो ओलंपिक के बाद देखने को मिला था। ऐसे में बर्मिंघम जैसी सफलता दोहराना आसान नहीं माना जा रहा।हालांकि पूरी तस्वीर निराशाजनक भी नहीं है। भारत के पास एथलेटिक्स में मजबूत संभावनाएं हैं। लंबी कूद, पैदल चाल, ट्रिपल जंप और कुछ ट्रैक स्पर्धाओं में भारतीय खिलाड़ी पिछले कुछ वर्षों में लगातार बेहतर प्रदर्शन कर रहे हैं। वेटलिफ्टिंग में भी युवा खिलाड़ियों की नई खेप तैयार हुई है। मुक्केबाजी में अनुभवी और नए खिलाड़ियों का मिश्रण भारतीय चुनौती को मजबूत बनाता है। यही वजह है कि खेल विशेषज्ञ भारत के लिए लगभग 28 से 35 पदकों का अनुमान लगा रहे हैं। यह संख्या 2022 से काफी कम होगी, लेकिन मौजूदा प्रारूप को देखते हुए इसे खराब प्रदर्शन नहीं माना जाएगा।दरअसल, इस बार नुकसान केवल पदकों का नहीं है। करोड़ों भारतीय खेल प्रेमियों को भी अपने पसंदीदा सितारों को देखने का मौका नहीं मिलेगा। बैडमिंटन नहीं होगा तो पीवी सिंधु और लक्ष्य सेन नहीं दिखेंगे। हॉकी नहीं होगी तो हरमनप्रीत सिंह की ड्रैग-फ्लिक नहीं दिखेगी। कुश्ती नहीं होगी तो भारतीय पहलवानों की पारंपरिक ताकत नजर नहीं आएगी। क्रिकेट नहीं होगा तो महिला टीम की चमक गायब रहेगी। यानी दर्शकों के लिए भी यह कॉमनवेल्थ गेम्स पहले जैसा आकर्षण नहीं रखता।
दिलचस्प बात यह भी है कि यह संकट केवल भारत तक सीमित नहीं है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, कनाडा और न्यूजीलैंड जैसे देशों की भी कई मजबूत स्पर्धाएं बाहर हुई हैं। लेकिन भारत पर असर सबसे ज्यादा इसलिए पड़ा क्योंकि पिछले चार संस्करणों में उसके अधिकतर पदक इन्हीं हटाए गए खेलों से आते रहे हैं। यही वजह है कि भारत की मेडल तालिका पर सबसे बड़ा असर दिखाई देगा।एक और सवाल लगातार उठ रहा है कि क्या कॉमनवेल्थ गेम्स का भविष्य सुरक्षित है? पिछले कुछ वर्षों में कई देशों ने बढ़ती लागत के कारण मेजबानी से दूरी बनाई है। बड़े खेल गांव, हजारों खिलाड़ियों की मेजबानी, सुरक्षा और आधुनिक सुविधाओं पर अरबों डॉलर खर्च होते हैं, जबकि आर्थिक लाभ सीमित रहता है। ग्लासगो मॉडल इसी संकट का जवाब माना जा रहा है, जहां कम बजट, मौजूदा स्टेडियम और सीमित खेलों के जरिए आयोजन को बचाने की कोशिश की गई है। लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर यही मॉडल आगे भी जारी रहा तो कॉमनवेल्थ गेम्स का आकर्षण धीरे-धीरे कम हो सकता है।भारत के लिए हालांकि यह प्रतियोगिता एक और मायने रखती है। सितंबर में होने वाले एशियाई खेलों से पहले यह कई युवा खिलाड़ियों के लिए बड़ा परीक्षा मंच है। यहां अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी एशियाड और फिर लॉस एंजिलिस ओलंपिक 2028 की तैयारी में महत्वपूर्ण बढ़त हासिल कर सकते हैं। इसलिए ग्लासगो को केवल पदकों के चश्मे से देखना पूरी तस्वीर नहीं होगी। सच तो यह है कि 2026 का कॉमनवेल्थ गेम्स भारतीय खेल इतिहास में शायद सबसे असामान्य संस्करण साबित होगा। यहां भारत के सामने चुनौती केवल मेडल जीतने की नहीं, बल्कि यह साबित करने की भी है कि अगर उसके पारंपरिक मेडल बैंक बंद हो जाएं तो भी वह नए खेलों में अपनी पहचान बना सकता है। संभव है कि इस बार मेडल तालिका में संख्या कम दिखाई दे, लेकिन अगर युवा खिलाड़ी नए खेलों में सफलता की नई इबारत लिखते हैं तो यही ग्लासगो भारतीय खेलों के अगले दशक की सबसे मजबूत शुरुआत भी बन सकता है।





