महेन्द्र तिवारी
चीनी की बढ़ती कीमतों ने इन दिनों आम उपभोक्ता से लेकर किसान, चीनी मिलों और नीति निर्धारकों तक सभी का ध्यान खींचा है। जुलाई और अगस्त 2026 के दौरान चीनी के दाम में जिस तेजी से वृद्धि हुई, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया कि आखिर इसके पीछे वास्तविक कारण क्या है। इसी बीच यह चर्चा भी तेज हुई कि क्या पेट्रोल में एथेनॉल मिलाने की बढ़ती आवश्यकता के कारण गन्ने का अधिक हिस्सा एथेनॉल बनाने में चला गया और इसका सीधा असर चीनी के उत्पादन तथा कीमतों पर पड़ा। सवाल महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत में गन्ना केवल एक कृषि उपज नहीं है, बल्कि इससे चीनी, एथेनॉल और कई अन्य उत्पादों का पूरा आर्थिक तंत्र जुड़ा हुआ है।
गन्ने से चीनी और एथेनॉल का संबंध समझे बिना इस विवाद को समझना कठिन है। गन्ने को मिल में पेरने पर उससे रस प्राप्त होता है। इस रस को विभिन्न प्रक्रियाओं से गुजारकर चीनी के कण तैयार किए जाते हैं। चीनी निकालने के बाद बचने वाला गाढ़ा पदार्थ शीरा कहलाता है। इसी शीरे का उपयोग एथेनॉल बनाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है। कुछ परिस्थितियों में गन्ने के रस या गाढ़े सिरप से भी सीधे एथेनॉल तैयार किया जा सकता है। इस प्रकार गन्ने का उपयोग दो अलग-अलग आर्थिक जरूरतों के लिए हो सकता है। एक ओर वह भोजन के लिए चीनी उपलब्ध कराता है और दूसरी ओर परिवहन ईंधन के लिए एथेनॉल। इसलिए दोनों के बीच संबंध को नकारा नहीं जा सकता।
यहीं से यह धारणा पैदा होती है कि यदि गन्ने का अधिक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन में चला जाए तो चीनी की उपलब्धता घट सकती है और उसके दाम बढ़ सकते हैं। सामान्य परिस्थितियों में यह तर्क आर्थिक रूप से असंगत नहीं है। यदि किसी सीमित संसाधन का एक बड़ा हिस्सा एक वस्तु के उत्पादन में इस्तेमाल होगा तो दूसरी वस्तु के लिए उपलब्ध मात्रा प्रभावित हो सकती है। लेकिन किसी एक सामान्य आर्थिक संबंध को देखकर यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि वर्तमान चीनी मूल्य वृद्धि का मुख्य कारण भी एथेनॉल ही है।
अगस्त 2026 में केंद्र सरकार ने इसी धारणा को स्पष्ट रूप से खारिज किया है। सरकार के अनुसार चीनी की कीमतों में हाल की वृद्धि को एथेनॉल के लिए गन्ने या चीनी के कथित अधिक उपयोग से जोड़ना सही नहीं है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार एथेनॉल उत्पादन के लिए चीनी के उपयोग का हिस्सा 2022-23 में लगभग 12 प्रतिशत था, जो 2025-26 में घटकर लगभग 9 प्रतिशत रह गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि हाल के वर्षों में एथेनॉल के लिए चीनी के उपयोग का अनुपात बढ़ने के बजाय घटा है।
इस स्थिति को और स्पष्ट करने वाली बात यह है कि भारत में एथेनॉल बनाने के लिए अब अनाज का उपयोग भी काफी बढ़ गया है। विशेष रूप से मक्का एथेनॉल उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण कच्चा माल बनकर उभरा है। इसलिए पेट्रोल में एथेनॉल मिश्रण बढ़ाने की नीति का पूरा भार गन्ने और चीनी उद्योग पर नहीं है। सरकार का कहना है कि देश में बनने वाले एथेनॉल का बड़ा हिस्सा अब अनाज से प्राप्त हो रहा है। ऐसे में केवल एथेनॉल नीति को चीनी की मौजूदा महंगाई का जिम्मेदार ठहराना तथ्यों को अधूरा देखने जैसा होगा।
वास्तविक समस्या इस समय घरेलू चीनी उत्पादन में आई कमी से अधिक जुड़ी दिखाई देती है। सरकार के ताजा अनुमान के अनुसार वर्तमान सत्र में चीनी का उत्पादन लगभग 306 लाख टन रहने का अनुमान है, जबकि आरंभिक अनुमान लगभग 343 लाख टन का था। अर्थात उत्पादन अनुमान में लगभग 11 प्रतिशत की कमी आई है। इतनी बड़ी कमी का सीधा असर बाजार में उपलब्धता पर पड़ना स्वाभाविक है।
उत्पादन में इस गिरावट के पीछे मौसम की भूमिका भी महत्वपूर्ण बताई जा रही है। गन्ने की फसल अत्यधिक वर्षा, जलभराव और कुछ क्षेत्रों में रोग जैसी समस्याओं से प्रभावित हुई। गन्ना ऐसी फसल है जिसे पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है, लेकिन अत्यधिक पानी और प्रतिकूल मौसम भी उसके उत्पादन तथा मिठास को प्रभावित कर सकते हैं। जब गन्ने की मात्रा या उससे चीनी निकालने की क्षमता घटती है तो चीनी मिलों के सामने उत्पादन का संकट खड़ा होता है। इसका असर अंततः बाजार की उपलब्धता और कीमतों पर दिखाई देता है।
दूसरी बड़ी वजह मांग में मौसमी वृद्धि है। भारत में अगस्त से लेकर दीपावली तक त्योहारों का लंबा दौर रहता है। इस अवधि में मिठाइयों, पेय पदार्थों, बेकरी उत्पादों और घरेलू उपयोग के कारण चीनी की मांग बढ़ जाती है। जब मांग बढ़ रही हो और उसी समय उत्पादन अनुमान से कम हो जाए तो कीमतों पर दबाव बनना स्वाभाविक है। इस वर्ष यही स्थिति दिखाई दे रही है। 20 जुलाई 2026 को चीनी की कीमत लगभग 48.18 रुपये प्रति किलोग्राम थी, जो 20 अगस्त को बढ़कर लगभग 55.70 रुपये प्रति किलोग्राम हो गई।
बाजार में उपलब्धता के साथ भंडारण और व्यापारिक व्यवहार भी कीमतों को प्रभावित करते हैं। सरकार ने बड़े उपभोक्ताओं और व्यापारियों के पास रखे जाने वाले चीनी भंडार पर सीमाएं लगाने जैसे कदम उठाए हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि बाजार में कृत्रिम कमी पैदा न हो और त्योहारों के समय उपभोक्ताओं को पर्याप्त चीनी उपलब्ध रहे। यदि कोई व्यापारी भविष्य में अधिक कीमत मिलने की उम्मीद में बड़ी मात्रा में माल रोककर रखता है तो बाजार में तत्काल उपलब्धता कम हो सकती है। ऐसी स्थिति में वास्तविक उत्पादन से अधिक महत्वपूर्ण बाजार में उपलब्ध मात्रा हो जाती है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार की स्थिति भी भारत से अलग नहीं है। वैश्विक चीनी कीमतों में भी हाल के महीनों में वृद्धि हुई है। भारत एक बड़ा उत्पादक होने के साथ-साथ वैश्विक चीनी बाजार का महत्वपूर्ण भागीदार है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय कीमतों में होने वाले बदलाव घरेलू बाजार को प्रभावित कर सकते हैं। जब देश के भीतर उत्पादन कम हो और बाहर भी कीमतें बढ़ रही हों तो घरेलू बाजार पर दोहरा दबाव पड़ता है। ऐसी परिस्थिति में सरकार के सामने उपभोक्ताओं को राहत देने और किसानों तथा चीनी उद्योग के हितों को सुरक्षित रखने के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।
इसी चुनौती को देखते हुए केंद्र सरकार ने 20 अगस्त 2026 को 10 लाख टन कच्ची चीनी के शुल्क-मुक्त आयात की अनुमति दी है। यह निर्णय लगभग एक दशक बाद इतनी बड़ी मात्रा में चीनी आयात की अनुमति देने वाला महत्वपूर्ण कदम है। इसका उद्देश्य घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता बढ़ाना और कीमतों पर नियंत्रण स्थापित करना है। सरकार ने यह कदम त्योहारों के मौसम से पहले उठाया है ताकि आपूर्ति की कमी का असर उपभोक्ताओं पर कम किया जा सके।
फिर भी एथेनॉल को पूरी तरह चर्चा से बाहर कर देना भी सही नहीं होगा। दीर्घकाल में गन्ने के उपयोग को लेकर संतुलन बनाए रखना आवश्यक है। भारत को एक ओर पेट्रोल में एथेनॉल का मिश्रण बढ़ाकर पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करनी है, किसानों के लिए गन्ने की मांग बनाए रखनी है और ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करनी है। दूसरी ओर देश में चीनी की पर्याप्त उपलब्धता और उचित कीमत भी सुनिश्चित करनी है। यदि भविष्य में एथेनॉल के लिए गन्ने के रस का उपयोग बहुत अधिक बढ़ता है तो चीनी उत्पादन पर उसका प्रभाव पड़ सकता है। इसलिए सरकार को हर वर्ष उत्पादन, भंडार, घरेलू मांग और एथेनॉल की आवश्यकता को ध्यान में रखकर नीति बनानी होगी।
दरअसल एथेनॉल नीति अपने आप में समस्या नहीं है। इससे गन्ना किसानों को अतिरिक्त बाजार मिलता है, चीनी मिलों को आय का एक अन्य स्रोत मिलता है और देश को आयातित पेट्रोलियम पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलती है। समस्या तब पैदा हो सकती है जब किसी एक उद्देश्य को इतना अधिक महत्व दे दिया जाए कि दूसरे आवश्यक उद्देश्य प्रभावित होने लगें। खाद्य सुरक्षा और ऊर्जा सुरक्षा दोनों राष्ट्रीय प्राथमिकताएं हैं। इनके बीच संतुलन बनाना ही दूरदर्शी नीति की पहचान होगी।
चीनी की वर्तमान महंगाई को देखते हुए सबसे उचित निष्कर्ष यही है कि एथेनॉल और चीनी के बीच संबंध जरूर है, लेकिन अगस्त 2026 में चीनी के दाम बढ़ने का मुख्य कारण एथेनॉल नहीं दिखाई देता। घरेलू उत्पादन में अपेक्षा से बड़ी कमी, प्रतिकूल मौसम, त्योहारों से पहले बढ़ी मांग, अंतरराष्ट्रीय कीमतों में वृद्धि और बाजार में भंडारण जैसी परिस्थितियां अधिक महत्वपूर्ण कारण हैं। सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि एथेनॉल के लिए चीनी के उपयोग का हिस्सा पिछले वर्षों की तुलना में घटा है। इसलिए वर्तमान मूल्य वृद्धि का पूरा दोष एथेनॉल नीति पर डालना उचित नहीं होगा।
लेकिन इस विवाद ने एक महत्वपूर्ण प्रश्न अवश्य सामने ला दिया है। भारत को गन्ने से मिलने वाले हर उत्पाद के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। किसान को उचित मूल्य मिले, चीनी मिलें आर्थिक रूप से सक्षम रहें, उपभोक्ता को उचित कीमत पर चीनी मिले और देश को स्वदेशी ईंधन का लाभ भी प्राप्त हो, इन सभी लक्ष्यों को एक साथ साधना होगा। आने वाले वर्षों में यही संतुलन भारत की गन्ना नीति की सबसे बड़ी परीक्षा होगा। वर्तमान स्थिति का संदेश भी यही है कि चीनी की कीमतों को समझने के लिए केवल एथेनॉल को देखना पर्याप्त नहीं है। खेत से बाजार तक पूरी आपूर्ति व्यवस्था को एक साथ समझना होगा।





