जंतर-मंतर की आवाज़: छात्रों का संघर्ष और सरकार की जिम्मेदारी

The Voice of Jantar Mantar: The Students' Struggle and the Government's Responsibility

गंगा पाण्डेय

दिल्ली का जंतर-मंतर एक बार फिर लोकतंत्र की उस तस्वीर को सामने ला रहा है, जहाँ देश के हजारों छात्र अपने भविष्य, शिक्षा व्यवस्था में सुधार और न्याय की मांग को लेकर शांतिपूर्वक एकत्र हुए हैं। उनके साथ समाजसेवी सोनम वांगचुक भी खड़े हैं, जिन्होंने हमेशा शिक्षा, पर्यावरण और समाज के मुद्दों को अहिंसक तरीके से उठाने की कोशिश की है। आज यह आंदोलन केवल कुछ छात्रों का विरोध नहीं, बल्कि उन लाखों युवाओं की आवाज़ है जो वर्षों की मेहनत के बाद भी व्यवस्था से निराश महसूस कर रहे हैं।

किसी भी प्रतियोगी परीक्षा, विशेषकर NEET जैसी परीक्षा, के पीछे केवल एक प्रश्नपत्र नहीं होता। उसके पीछे एक विद्यार्थी की कई वर्षों की तपस्या, माता-पिता की कमाई, परिवार के सपने और अनगिनत त्याग छिपे होते हैं। लाखों छात्र सुबह से रात तक पढ़ाई करते हैं, त्योहार छोड़ते हैं, दोस्तों से दूरी बनाते हैं और केवल एक लक्ष्य लेकर आगे बढ़ते हैं कि एक दिन डॉक्टर बनकर समाज की सेवा करेंगे। जब ऐसी परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल उठते हैं या छात्रों का भरोसा कमजोर होता है, तो यह केवल परीक्षा का मुद्दा नहीं रह जाता, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता का प्रश्न बन जाता है।

आज जंतर-मंतर पर बैठे छात्रों की सबसे बड़ी मांग किसी विशेष सुविधा की नहीं, बल्कि न्याय की है। वे चाहते हैं कि उनकी मेहनत का मूल्य सुरक्षित रहे, परीक्षा प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी हो, किसी भी प्रकार की अनियमितता की निष्पक्ष जांच हो और भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो। ये मांगें किसी भी लोकतांत्रिक समाज में असामान्य नहीं हैं।

लोकतंत्र की खूबसूरती यही है कि नागरिक अपनी बात शांतिपूर्ण ढंग से रख सकते हैं। संविधान प्रत्येक नागरिक को अपनी बात कहने और शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने का अधिकार देता है। इसलिए जब छात्र अनुशासन के साथ अपनी मांग रखते हैं, तो उनका विरोध लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए। किसी भी सरकार की मजबूती इस बात से नहीं मापी जाती कि वह विरोध को कितना रोकती है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह विरोध को कितनी गंभीरता से सुनती है और उसका समाधान कैसे खोजती है।

सोनम वांगचुक का छात्रों के साथ खड़ा होना इस बात का संदेश देता है कि शिक्षा केवल डिग्री का विषय नहीं, बल्कि देश के भविष्य का सवाल है। यदि समाज के प्रतिष्ठित लोग छात्रों की आवाज़ को आगे बढ़ाते हैं, तो इसे टकराव नहीं बल्कि संवाद का अवसर माना जाना चाहिए। सरकार और छात्रों के बीच बातचीत जितनी जल्दी होगी, समाधान उतना ही बेहतर निकलेगा।
NEET और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का संघर्ष अक्सर किताबों तक सीमित नहीं रहता। कई छात्र छोटे कस्बों और गांवों से आते हैं। उनके माता-पिता खेती, मजदूरी या छोटी नौकरियों से पैसा जुटाकर उन्हें पढ़ाते हैं। कई परिवार अपनी जमा-पूंजी तक खर्च कर देते हैं ताकि उनका बेटा या बेटी अपने सपनों को पूरा कर सके। ऐसे में यदि छात्रों को यह महसूस हो कि उनकी मेहनत के साथ न्याय नहीं हुआ, तो उनकी पीड़ा को समझना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है।

ऐसे आंदोलनों का उद्देश्य केवल विरोध करना नहीं होना चाहिए, बल्कि शिक्षा व्यवस्था को और अधिक मजबूत बनाना भी होना चाहिए। यदि परीक्षा प्रणाली में कहीं कमजोरी है, तो उसे स्वीकार कर सुधार करना ही लोकतंत्र की परिपक्वता का प्रमाण है। पारदर्शी परीक्षा व्यवस्था, समयबद्ध जांच, दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई और छात्रों के साथ खुला संवाद—ये सभी कदम भविष्य में विश्वास बहाल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

सरकार को यह भी समझना होगा कि युवा केवल नौकरी नहीं मांग रहे हैं, बल्कि निष्पक्ष अवसर मांग रहे हैं। वे चाहते हैं कि सफलता का आधार केवल उनकी मेहनत हो, न कि किसी अनियमितता या व्यवस्था की कमजोरी का प्रभाव। जब लाखों युवाओं का विश्वास मजबूत होगा, तभी देश का भविष्य भी मजबूत होगा।

आज आवश्यकता किसी की हार या जीत की नहीं, बल्कि न्याय, संवेदनशीलता और संवाद की है। यदि छात्रों की मांगें तथ्यों और निष्पक्षता पर आधारित हैं, तो उन्हें सम्मानपूर्वक सुना जाना चाहिए। शांतिपूर्ण आंदोलन को लोकतंत्र की शक्ति के रूप में देखना चाहिए, कमजोरी के रूप में नहीं।

जंतर-मंतर का यह आंदोलन हमें याद दिलाता है कि शिक्षा केवल व्यक्तिगत सफलता का माध्यम नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण की नींव है। यदि इस नींव को मजबूत रखना है, तो छात्रों का विश्वास बनाए रखना होगा। सरकार, न्याय व्यवस्था, परीक्षा एजेंसियों और समाज—सभी की साझा जिम्मेदारी है कि हर विद्यार्थी को यह भरोसा मिले कि उसकी मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाएगी।

एक मजबूत राष्ट्र वही होता है जहाँ सरकार आलोचना से नहीं डरती, संस्थाएँ पारदर्शी होती हैं और छात्र बिना भय के अपनी बात रख सकते हैं। यदि आज छात्रों की आवाज़ सुनी जाती है और शिक्षा व्यवस्था को और अधिक निष्पक्ष तथा विश्वसनीय बनाया जाता है, तो यह केवल छात्रों की नहीं, बल्कि पूरे भारत के लोकतंत्र और भविष्य की जीत होगी।