नेपाल संकट में भारत की सदाशयता: हालिया प्रलय और ‘पड़ोसी पहले’ की नीति का एक अनुकरणीय अध्याय

India's Goodwill During the Nepal Crisis: An Exemplary Chapter of the Recent Catastrophe and the 'Neighbourhood First' Policy

अशोक भाटिया

अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के आधुनिक सिद्धांतों में ‘पड़ोसी पहले’ की नीति को साझा सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और आर्थिक नियति का प्रतिबिंब माना जाता है। इतिहास गवाह है कि जब भी नेपाल पर कोई विपत्ति आई है, भारत ने हमेशा ‘प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता’ के रूप में अपनी भूमिका निभाई है। भारत का यह दृष्टिकोण केवल राजनीतिक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह उस ‘रोटी-बेटी के रिश्ते’ और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना से प्रेरित है, जो दोनों देशों के जनमानस के दिलों में सदियों से रची-बसी है।

नेपाल के संदर्भ में भारत की यह सहायता नीति किसी रणनीतिक लाभ या भू-राजनीतिक सौदेबाज़ी पर आधारित नहीं है। इसके विपरीत, यह एक बड़े भाई के उस दायित्व जैसी है जो बिना किसी शर्त के अपने छोटे भाई की संप्रभुता, समृद्धि और सुरक्षा के लिए तत्पर रहता है। संकट की घड़ियों में भारत ने जिस तत्परता और निस्वार्थ भाव से नेपाल का हाथ थामा है, उसने वैश्विक कूटनीति में आपदा प्रबंधन और मानवीय सहायता का एक नया प्रतिमान स्थापित किया है।

हाल ही में (26 अगस्त 2026) नेपाल-तिब्बत सीमा पर स्थित भोटेकोशी और त्रिशूली नदी घाटियों में एक अभूतपूर्व और प्रलयकारी प्राकृतिक आपदा देखने को मिली है। यह अचानक आई भयानक बाढ़ हिमालयी क्षेत्र के नाजुक पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के गंभीर खतरों का साक्षात प्रमाण है। प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, पहाड़ों के उच्च शिखर पर एक विशाल ग्लेशियर के टूटने और उसके कारण हुए तीव्र भूस्खलन ने भोटेकोशी नदी के मार्ग को अवरुद्ध कर दिया था। यह भूस्खलन इतना शक्तिशाली था कि भूकंपीय तरंगों ने इसे स्थानीय स्तर पर रिक्टर स्केल पर 5.2 तीव्रता के रूप में दर्ज किया।

जैसे ही मलबे का यह प्राकृतिक बांध टूटा, पानी और भारी कीचड़ का एक भयावह रेला 30 फीट ऊंची लहरों के रूप में निचले इलाकों की तरफ बढ़ा। इस प्रलय ने उत्तरी नेपाल के रसुवा, नुवाकोट और धादिंग जिलों में भीषण तबाही मचाई है। चीन के तिब्बत क्षेत्र स्थित जाइरोंग पोर्ट से लेकर नेपाल के सीमावर्ती बस्तियों तक पूरा इलाका कीचड़ और मलबे में दफन हो गया है। इस त्रासदी में अब तक 160 से अधिक लोगों की मौत की आधिकारिक पुष्टि हो चुकी है और 750 से अधिक लोग लापता हैं, जिनमें स्थानीय पनबिजली परियोजनाओं के कर्मचारी, सुरक्षाकर्मी और बड़ी संख्या में विदेशी नागरिक शामिल हैं। विशेष रूप से, पवित्र कैलाश मानसरोवर यात्रा के मार्ग पर होने के कारण वहां करीब 133 भारतीय तीर्थयात्री और पर्यटक भी लापता या फंसे हुए हैं, जिनकी सुरक्षा को लेकर दोनों देशों की चिंताएं चरम पर हैं। बाढ़ का वेग इतना भीषण था कि इसने नेपाल-चीन व्यापार की लाइफलाइन माने जाने वाले कई प्रमुख पुलों, रणनीतिक राजमार्गों, दर्जनों गांवों और कम से कम 12 निर्माणाधीन व संचालित जलविद्युत परियोजनाओं को पूरी तरह से मलबे के ढेर में तब्दील कर दिया है।

इस महासंकट के सामने आते ही भारत ने पलक झपकते ही अपनी ‘फर्स्ट रेस्पॉन्डर’ की भूमिका को धरातल पर उतारा। आपदा के कुछ ही घंटों के भीतर भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेंद्र शाह से सीधी बात की और भारत की ओर से बिना शर्त पूर्ण सहयोग का आश्वासन दिया। कूटनीतिक औपचारिकताओं से परे हटकर भारतीय वायुसेना ने तुरंत अपने विशेष सी-130जे सुपर हरक्यूलिस मालवाहक विमान को काठमांडू के लिए रवाना किया, जो 10 टन से अधिक आपातकालीन मानवीय सहायता और चिकित्सा सामग्री की पहली खेप लेकर पहुंचा। इस राहत सामग्री में प्रभावित परिवारों के लिए तिरपाल, वाटरप्रूफ टेंट, स्लीपिंग बैग, कंबल, जल शोधन के लिए क्लोरीन की गोलियां और भारी मात्रा में जीवन रक्षक दवाएं शामिल थे ।

इसके समानांतर, काठमांडू स्थित भारतीय दूतावास ने नेपाल के गृह मंत्रालय और नेपाली सेना के साथ मिलकर एक 24×7 विशेष समन्वय केंद्र और हेल्पलाइन की शुरुआत की है। दुर्गम पहाड़ी घाटियों में फंसे भारतीय नागरिकों, तीर्थयात्रियों और नेपाली भाइयों को सुरक्षित निकालने के लिए भारतीय खोजी टीमों और नेपाली सेना के हेलीकॉप्टरों द्वारा संयुक्त रेस्क्यू ऑपरेशन चलाया जा रहा है। मलबे के कारण संचार और बिजली व्यवस्था पूरी तरह ठप हो जाने के कारण, भारत ने नेपाल को सैटेलाइट फोन और तकनीकी सहायता भी प्रदान की है ताकि दुर्गम इलाकों से संपर्क बहाल किया जा सके।

भारत का यह आपदा प्रबंधन केवल नेपाल की भौगोलिक सीमा के भीतर राहत पहुंचाने तक सीमित नहीं है। चूंकि नेपाल की यह उफनती नदियां अंततः भारत के मैदानी इलाकों में प्रवेश करती हैं, इसलिए भारत सरकार इस प्राकृतिक आपदा को एक साझा संकट के रूप में देख रही है। भोटेकोशी और त्रिशूली का यह पानी बिहार की गंडक (नारायणी) और उत्तर प्रदेश की नदियों में भारी मात्रा में मलबा और पानी ला रहा है, जिससे भारत के सीमावर्ती जिलों में बाढ़ का खतरा बढ़ गया है।

इस आसन्न खतरे को देखते हुए केंद्रीय गृह मंत्रालय के समन्वय से उत्तर प्रदेश और बिहार सरकारों ने अपनी सीमा पर हाई-लेवल अलर्ट जारी कर दिया है। वाल्मीकिनगर बराज सहित सभी प्रमुख तटबंधों पर जलस्तर की निगरानी के लिए विशेषज्ञों और इंजीनियरों की टीमें तैनात की गई हैं। इस कठिन समय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दोनों देशों का स्थानीय प्रशासन वास्तविक समय के डेटा को आपस में साझा कर रहा है। ऊपरी क्षेत्रों से आने वाले पानी के वेग की सटीक जानकारी भारत को मिल रही है, जिससे भारत अपने निचले इलाकों में जान-माल के नुकसान को रोकने के लिए पूर्व-तैयारी कर पा रहा है। यह आपसी तालमेल दिखाता है कि संकट के समय दोनों देश राजनीतिक सीमाओं को भूलकर एक ही परिवार की तरह काम करते हैं।

अगस्त 2026 की यह बाढ़ पहली घटना नहीं है जब भारत ने नेपाल की ढाल बनकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाई हो। वर्ष 2015 का नेपाल भूकंप इसका एक ऐतिहासिक उदाहरण है, जब भीषण भूकंप ने नेपाल के बुनियादी ढांचे को तोड़ दिया था। तब भारत ने कुछ ही घंटों के भीतर ‘ऑपरेशन मैत्री’ शुरू किया था, जो किसी भी विदेशी भूमि पर भारत का सबसे बड़ा नागरिक राहत अभियान था। भारतीय जवानों ने मलबे से जिंदगियां निकाली थीं और भारत ने नेपाल के दीर्घकालिक पुनर्निर्माण के लिए एक अरब डॉलर की आर्थिक सहायता दी थी।

इसी तरह, कोविड-19 महामारी के दौरान जब दुनिया स्वार्थी ‘वैक्सीन राष्ट्रवाद’ से घिरी थी, तब भारत ने ‘वैक्सीन मैत्री’ पहल के तहत कोविशील्ड टीकों की लाखों खुराकें मुफ्त अनुदान के रूप में नेपाल भेजी थीं। नेपाल में ऑक्सीजन का संकट गहराने पर भारत ने घरेलू किल्लत के बावजूद सीमाओं को खुला रखा और टैंकरों के माध्यम से लिक्विड मेडिकल ऑक्सीजन की निर्बाध आपूर्ति सुनिश्चित की थी।

एक भू-आबद्ध देश होने के कारण नेपाल की आर्थिक प्रगति काफी हद तक भारत के पारगमन मार्गों पर निर्भर है। भारत ने नेपाल को हमेशा एक संप्रभु और सक्षम राष्ट्र बनाने के लिए अपने बुनियादी ढांचे के द्वार खोले हैं। भारत-नेपाल सीमा पर एकीकृत जांच चौकियां और जयनगर-बर्दीबास जैसी सीमा पार रेल लिंक दोनों देशों के बीच व्यापार को आधुनिक बना रहे हैं। दक्षिण एशिया की पहली सीमा पार पेट्रोलियम पाइपलाइन (मोतिहारी-अमलेखगंज पाइपलाइन) भारत की ही देन है, जिसने नेपाल की ईंधन सुरक्षा को हमेशा के लिए सुनिश्चित कर दिया है। इसके अलावा, ऊर्जा क्षेत्र में अरुण-3 जलविद्युत परियोजना जैसी विशाल पहलों के जरिए भारत ने नेपाल को बिजली के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया है। वर्तमान में नेपाल अपनी अतिरिक्त बिजली भारत को बेचकर अरबों रुपये का राजस्व कमा रहा है। हाल ही में भारत के डिजिटल भुगतान सिस्टम को नेपाल में लागू किया गया है, जिसने सीमा पार वित्तीय लेनदेन और पर्यटन को बेहद सुगम बना दिया है।

संक्षेप में, नेपाल के प्रति भारत की नीतियां और हालिया बाढ़ आपदा में उसकी त्वरित प्रतिक्रिया यह साबित करती है कि भारत केवल एक बड़ा पड़ोसी देश नहीं, बल्कि सुख-दुख का एक विश्वसनीय साथी है। भू-राजनीतिक समीकरणों में उतार-चढ़ाव आ सकते हैं, और बाहरी ताकतें (जैसे चीन का ऋण-जाल आधारित बीआरआई निवेश) नेपाल को लुभाने की कोशिश कर सकती हैं, लेकिन भारत का मानवीय और निस्वार्थ सहयोग किसी रणनीतिक सौदेबाजी पर निर्भर नहीं है। अगस्त 2026 की इस त्रासदी ने पशुपतिनाथ से काशी विश्वनाथ तक फैले सांस्कृतिक ताने-बाने और दोनों देशों के बीच की खुली सीमा की प्रासंगिकता को और गहरा कर दिया है। वैश्विक पटल पर जब भी पड़ोसियों के प्रति उदारता, सह-अस्तित्व और जिम्मेदारी की बात होगी, संकट की इस घड़ी में नेपाल की ढाल बनकर खड़ा रहने का भारत का यह संकल्प हमेशा एक बेमिसाल अध्याय के रूप में याद किया जाएगा।