अजय कुमार
उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर राज्य की सियासत का पारा लगातार चढ़ता जा रहा है और 403 सीटों वाली इस विधानसभा में सत्ता की चाबी हासिल करने के लिए सभी प्रमुख दल अपनी रणनीति को अंतिम रूप देने में जुटे हैं। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी का पूरा जोर कानून-व्यवस्था, डबल इंजन सरकार के विकास कार्यों और लाभार्थी योजनाओं के जरिए अपनी जमीन को और मजबूत करने पर है, हालांकि लोकसभा चुनावों के बाद पार्टी के सामने अपने संगठनात्मक ढांचे को दुरुस्त करने तथा गैर-यादव ओबीसी और दलित मतदाताओं को एक बार फिर पूरी ताकत से अपने पाले में लाने की बड़ी चुनौती खड़ी है। वहीं दूसरी ओर, समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव अपने पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के सहारे बीजेपी को कड़ी टक्कर देने की जुगत में हैं, लेकिन पिछले कुछ दिनों में पीडीए की अलग-अलग और कई बार बदली हुई परिभाषाओं के कारण मतदाताओं के बीच असमंजस की स्थिति भी पैदा हुई है। इसके अलावा, सपा द्वारा ब्राह्मण मतदाताओं को साधने की कोशिशों के बीच जब सवर्णों ने आरक्षण के मसले पर नाराजगी जाहिर की और अखिलेश यादव ने इसे बीजेपी की साजिश करार दिया, तो अगड़े वोटर खासे नाराज नजर आए, जिसका नुकसान पार्टी को उठाना पड़ सकता है।
इन तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद समाजवादी पार्टी टिकट वितरण और जमीनी स्तर पर खुद को मुख्य विपक्षी विकल्प के रूप में पेश करते हुए कई लोकलुभावन वादे कर रही है, लेकिन कांग्रेस पार्टी की तरफ से लगातार बढ़ रहे दबाव के चलते अखिलेश यादव के लिए इस पीडीए गठबंधन को अंत तक बचाए रखना और सीटों के तालमेल को संभालना एक बड़ी अग्निपरीक्षा साबित हो रहा है। इन सबके बीच बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती भी अपने कोर जाटव वोट बैंक और बूथ स्तर के व्यापक बदलावों के दम पर 2007 के पुराने सोशल इंजीनियरिंग फॉर्मूले (दलित-ब्राह्मण-मुस्लिम) को पुनर्जीवित करने की कोशिश में जुटी हैं, जिससे मुकाबला त्रिकोणीय होने पर विपक्ष के वोटों में बड़ी सेंध लग सकती है। इस पूरे राजनीतिक घटनाक्रम में कांग्रेस पार्टी और खासकर राहुल गांधी तथा प्रियंका गांधी वाड्रा की उत्तर प्रदेश को लेकर बनाई जा रही रणनीति बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती नजर आ रही है। कांग्रेस पार्टी ने पिछले लोकसभा चुनावों के बाद मिले सकारात्मक संकेतों को आधार बनाते हुए यूपी में अपनी संगठनात्मक क्षमता को जमीन पर उतारने का जो ताना-बाना बुना है, उसमें राहुल गांधी की राष्ट्रीय स्तर की सामाजिक न्याय की मुखर राजनीति और प्रियंका गांधी वाड्रा का जमीनी स्तर पर महिलाओं व युवाओं को सीधे जोड़ने वाला लड़की हूं, लड़ सकती हूं जैसी प्राथमिकताओं वाला एंगिल प्रमुख रूप से शामिल है।
कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व इस बार केवल कागजी गठजोड़ तक सीमित रहने के बजाय ब्लॉक और बूथ स्तर तक संगठन सृजन अभियान चलाकर अपनी पुरानी खोई हुई जमीन वापस पाने की फिराक में है। प्रियंका गांधी की यूपी की राजनीति में सक्रिय भूमिका और पर्दे के पीछे चल रही बैठकों के संकेत यह बताते हैं कि कांग्रेस इस बार विधानसभा चुनाव में खुद को महज एक पिछलग्गू दल के रूप में पेश करने के बजाय सम्मानजनक सीटों और मजबूत हिस्सेदारी के साथ मैदान में उतरना चाहती है। राहुल गांधी के संविधान बचाओ और पीडीए समर्थित जनादेश वाले मुद्दों को कांग्रेस कार्यकर्ता यूपी के गांव-गांव तक पहुंचाने की योजना बना रहे हैं, जिससे समाजवादी पार्टी पर भी लगातार यह दबाव बना हुआ है कि वह गांधी परिवार और कांग्रेस को साथ लेकर चले ताकि विपक्षी मतों का बिखराव रोका जा सके। हालांकि, 202 सीटों के जादुई आंकड़े को पार कर बहुमत हासिल करने के लिए जहां एक तरफ बीजेपी अपनी चुनावी मशीनरी को धार दे रही है, वहीं विपक्ष के खेमे में खासकर कांग्रेस और सपा के बीच सीट शेयरिंग का यह पेंच और राहुल-प्रियंका की जोड़ी का यूपी में आक्रामक प्रचार अभियान तय करेगा कि 2027 का यह दंगल वास्तव में किस करवट बैठेगा।





