बिहार विधानसभा उपचुनाव:- बांकिपुर बदल सकता है बिहार का समीकरण ?

Bihar Assembly By-election: Could Bankipur alter Bihar's political equation?

बिहार बांकिपुर विधानसभा उपचुनाव के नतीजे आ गए हैं। जनसुराज जनता

अमित कुमार अम्बष्ट आमिली’

पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर ने भारतीय जनता पार्टी के अभेद किले को ध्वस्त करते हुए चुनाव जीत लिया है, भारतीय जनता पार्टी के लिए यह सबसे बड़ा झटका इसलिए भी है कि यह सीट भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन द्वारा राष्ट्रीय अध्यक्ष पद संभालने के बाद खाली हुई थी और यह सीट नितिन नवीन के पिता जी के समय से यानी तीन दशक से भाजपा के पास ही थी l प्रशांत किशोर ने सिर्फ इस सीट को जीता ही नहीं है, जीत और हार का अन्तर इतना बड़ा है कि बिहार सरकार और भाजपा के शीर्ष नेतृत्व को भी झकझोर दे l चुनाव में जहाँ प्रशांत किशोर को 64,161 मत मिले वही भाजपा के उम्मीदवार नीरज कुमार को महज 44,827 मत प्राप्त हुआ । 11,800 मत पाकर राजद की रेखा गुप्ता तीसरे नंबर पर रही l प्रशांत किशोर 19, 324 मतों के अन्तर से विजयी घोषित किए गए l ऐसे में प्रश्न उठाता है कि ऐसे कौन-कौन से कारक रहे जिसने बांकिपुर की हवा बदल दी और भाजपा को अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के गढ में हार का सामना करना पड़ l इसे समझने के लिए सबसे पहले बांकिपुर के मतदाताओं के जातीय समीकरण को समझते हैं l बांकिपुर में सवर्ण मतदाता जो कि भाजपा के कोर वोटर माना जाते हैं , उनका प्रतिशत लगभग 33–35% है जिसमें कायस्थ: 14–15%, भूमिहार: 7–8% ब्राह्मण: 7% और राजपूत: 5% हैं l कुर्मी और कुशवाहा भी तकरीबन 8 % हैं, जो भाजपा के ही वोटर माने जाते हैं, तकरीबन 26 % वोट यादव एवं मुस्लिम समुदाय के हैं और 9% दलित वोट भी है, ये वोटर राजद के माने जाते हैं। कह सकते हैं कि बांकिपुर सवर्ण मतदाताओं का दबदबा है, जिसमें कायस्थ मतदाताओं की संख्या सबसे अधिक है, भाजपा प्रत्याशी नीरज कुमार कायस्थ जाति से ही आते हैं । बाबजूद इसके जीत हार के अन्तर से बहुत अस्पष्ट है कि इसबार भाजपा को सवर्णों का पूरा साथ नहीं मिला l लेकिन सवाल फिर वही का वही है कि आखिर इस उपचुनाव में क्यों भाजपा सवर्ण समाज का साथ नहीं पा सकी और नीरज कुमार को हार का सामना करना पड़ा। ?

भरत तिवारी का कथित तौर पर जिस तरह आत्मसमर्पण करने और हथियार सौंप देने के बावजूद इनकाउंटर हुआ , ब्राह्मण और भूमिहार मतदाताओं की नाराजगी किसी से छुपी नहीं थी, प्रशांत किशोर ब्राह्मण समाज से आते हैं , ऐसे में ब्राह्मण और भूमिहार वोट प्रशांत किशोर की तरफ मुड़ गया l शायद नाराजगी के कारण कुछ सवर्ण मतदाता उदासीन भी रहे ,जिसके कारण कुल मतों का प्रतिशत भी काफी कम रहा l
प्रशांत किशोर ने इसे प्रतिष्ठा का चुनाव बनाया। न सिर्फ़ पलायन , रोजगार और महंगाई जैसे स्थानीय मुद्दों पर अभियान चलाया है अपितु मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी के प्रति लोगों की नाराजगी भांपते हुए यह समझाने में सफल रहे कि चुनाव यह संदेश देगा कि सम्राट चौधरी मुख्यमंत्री के योग्य हैं कि नहीं ? चुनाव का नतीजा भाजपा पर मुख्यमंत्री बदलने का दबाब बना सकता है l इतना ही नहीं प्रशांत किशोर की घर-घर जाकर वोट मांगने और चाय पर चर्चा की रणनीति भी कारगर साबित हुई l

इतना ही नहीं जब से केंद्र सरकार UGC बिल लेके आयी है, सवर्ण समाज इसका विरोध करता रहा है, हालांकि व्यापक विरोध प्रदर्शनों और सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं के बाद, भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने जनवरी 2026 के अंत में इन नियमों के कार्यान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी है। अदालत ने इसके प्रावधानों की अस्पष्टता और संभावित दुरुपयोग को लेकर चिंता व्यक्त की है, जिसके कारण फिलहाल उच्च शिक्षण संस्थान पुराने नियमों के तहत ही काम कर रहे हैं,लेकिन सवर्ण समाज इस बिल के लाने भर से ही खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है इसमें कोई संदेह नहीं है l

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या बांकिपुर बिहार का राजनीतिक समीकरण बदल सकता है ? इसमें कोई संदेह नहीं कि विगत विधानसभा चुनाव में यह लगने लगा था कि जनसुराज जनता पार्टी और उनके मुखिया प्रशांत किशोर अपनी छाप छोड़ेंगे और शायद उसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़े, लेकिन, नीतीश कुमार की नेतृत्व क्षमता और जनता का उनपर विश्वास ने अपने मतदाताओं को एकजुट रखा, भाजपा पुनः सत्ता में आ गई और जनसुराज जनता पार्टी अपना खाता भी नहीं खोल सकी, लेकिन, अब बिहार में भाजपा सरकार है, मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी है ,जिनकी शिक्षा पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, सम्राट चौधरी की छवि दबंग वाली है और वो जनता का विश्वास जीतने से पहले ही खुद को योगी आदित्य नाथ साबित करने में लगे हैं, ऐसे में जब प्रशांत किशोर भी सवर्ण समाज से आते हैं, वो लगातार पांच वर्षों तक पैदल यात्रा करके मतदाताओं में अपनी पहचान बना चुके हैं, रोजगार, पलायन, अपराध, मँहगाई जैसे जमीन से जुड़े मुद्दे उठाकर बिहारियों के मन को टटोलने और छूने में सफल हो रहे हैं, बांकिपुर चुनाव का ऐसा नतीजा जन सुराज जनता पार्टी को बिहार में एक प्रतिस्पर्धी राजनीतिक शक्ति बना सकता है, इतना ही नहीं ऐसे में भाजपा वोट के बिखराव का राजनीति लाभ केवल राजद को ही नहीं मिलेगा। जन सुराज विपक्षी राजनीति में नई चुनौती के रूप में निश्चित रूप से उभर सकती है। आने वाले चुनावों में यदि जन सुराज इस प्रदर्शन को अन्य सीटों पर दोहरा पाती है, तो बिहार में मुकाबला पहले की तुलना में अधिक बहुकोणीय हो जाएगा l

कुल मिलाकर बांकिपुर उपचुनाव महज एक सीट का परिणाम नहीं, बल्कि बिहार की बदलती राजनीतिक दिशा का संकेत भी हो सकता है। हालाकि उपचुनावों के परिणाम हमेशा पूरे राज्य के विधानसभा चुनावों की भविष्यवाणी नहीं करते, इसलिए इसके प्रभाव का अंतिम आकलन आगामी चुनावों में ही स्पष्ट होगा।