बेटियों के सपनों को मिला क्रिकेट का अपना आंगन

Cricket is the home of daughters' dreams

प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

भारत को पहली महिला चैंपियंस ट्रॉफी की मेजबानी मिलना महज खेल-जगत की खबर नहीं, महिला क्रिकेट के बदलते दौर का संकेत है। दशकों तक पुरुष क्रिकेट की तेज धारा के किनारे बहने वाला महिला क्रिकेट अब अपनी राह बना रहा है। श्रीलंका से आयोजन छिनकर भारत को मिलना इसी बदलाव को रेखांकित करता है। एक ओर श्रीलंका क्रिकेट संस्था में सरकारी हस्तक्षेप के कारण विश्व मंच पर पीछे हुआ, दूसरी ओर भारत अपनी व्यवस्थागत क्षमता और बढ़ते प्रभाव से आगे आया। फरवरी 2027 (14 से 28 फरवरी) में मुंबई के क्रिकेट क्लब ऑफ इंडिया और वडोदरा इंटरनेशनल क्रिकेट स्टेडियम में होने वाला छह टीमों का यह टूर्नामेंट इसलिए महत्वपूर्ण है कि महिला क्रिकेट अब पुरुष क्रिकेट की छाया नहीं रहा; उसने अपनी पहचान बना ली है और क्रिकेट की दिशा प्रभावित करने की ताकत भी अर्जित कर ली है।

इस कहानी की नींव 1978 में पड़ी थी, जब भारत ने दूसरी महिला विश्व कप प्रतियोगिता की मेजबानी की, जो उसका पहला अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट टूर्नामेंट भी था। तब महिला क्रिकेट के पास न भरे स्टेडियम थे, न बड़े प्रसारण और न प्रायोजकों की कतार। फिर भी उस आयोजन ने भारतीय जमीन पर बीज बो दिया। करीब पांच दशक बाद वही बीज मजबूत वृक्ष बन चुका है। आईसीसी के सामने बांग्लादेश, दक्षिण अफ्रीका और भारत विकल्प थे, लेकिन मेजबानी भारत को मिली। यह फैसला केवल सुविधाओं और आयोजन-अनुभव का परिणाम नहीं, भारतीय महिला क्रिकेट पर बढ़े भरोसे की मुहर है। हालिया विश्व कप की सफलता और घरेलू लीग की लोकप्रियता ने साबित किया है कि भारतीय दर्शकों की क्रिकेट-दीवानगी अब पुरुष और महिला के खांचे में बंटी नहीं है।

श्रीलंका से आयोजन हटना इस कहानी का दूसरा और अधिक गंभीर पहलू है। खेल का मैदान राजनीति से अलग दिख सकता है, लेकिन खेल संस्थाएं उससे अछूती नहीं रह सकतीं। क्रिकेट संस्था की स्वतंत्रता पर सरकारी हस्तक्षेप का साया पड़े तो मामला केवल प्रशासन का नहीं, अंतरराष्ट्रीय विश्वसनीयता का बन जाता है। श्रीलंका इसी संकट की कीमत चुका रहा है। भारत को मेजबानी मिलना इसलिए उपलब्धि के साथ जिम्मेदारी भी है। मुंबई और वडोदरा का चयन इस जिम्मेदारी के दो रंग सामने रखता है—मुंबई की समृद्ध क्रिकेट परंपरा और वडोदरा की उभरती खेल-ऊर्जा। अब ये मैदान सिर्फ चौकों-छक्कों के गवाह नहीं होंगे; यहां उन लड़कियों के सपनों को भी आकार मिलेगा, जो गांवों और छोटे शहरों में बल्ला थामकर बड़े मंच का सपना देख रही हैं।

टी-20 प्रारूप इस टूर्नामेंट को और धार देगा। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, भारत, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और श्रीलंका की छह टीमें राउंड-रॉबिन चरण में भिड़ेंगी और शीर्ष दो टीमें फाइनल में पहुंचेंगी। टीमें भले छह हों, लेकिन हर मुकाबला निर्णायक होगा। टी-20 में एक खराब पारी, कुछ गलत गेंदें या चंद क्षणों की हड़बड़ी पूरा अभियान पलट सकती है। भारत जैसे विशाल क्रिकेट बाजार में इसका असर मैदान से बाहर भी दिखेगा। प्रायोजन और मीडिया की दिलचस्पी बढ़ेगी, दर्शक जुड़ेंगे और महिला क्रिकेट की आर्थिक ताकत मजबूत होगी। इसका लाभ केवल भारतीय टीम को नहीं, पूरे एशिया की महिला क्रिकेट को मिल सकता है।

सबसे बड़ा बदलाव शायद क्रिकेट में नहीं, समाज की नजर में आया है। कभी महिला क्रिकेट को गंभीर खेल के बजाय मनोरंजन या अतिरिक्त गतिविधि माना जाता था। आज वही खेल करियर, सम्मान, आर्थिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव का रास्ता बन चुका है। हरमनप्रीत कौर जैसी खिलाड़ियों ने सिर्फ गेंद को सीमा पार नहीं पहुंचाया, बल्कि लड़कियों के सपनों के सामने खड़ी मानसिक दीवार भी तोड़ी है। अब सवाल यह नहीं कि लड़की क्रिकेट क्यों खेले, सवाल यह होना चाहिए कि उसकी प्रतिभा को अवसर क्यों न मिले। 2027 का यह आयोजन नई पीढ़ी को यही संदेश देगा कि मैदान पर खिलाड़ी की पहचान उसका लिंग नहीं, उसकी क्षमता और खेल तय करते हैं।

लेकिन मेजबानी की असली परीक्षा स्टेडियमों की रोशनी बुझने के बाद होगी। सफल आयोजन जरूरी है, पर पर्याप्त नहीं। ग्रामीण इलाकों में मैदानों की कमी, प्रशिक्षित कोचों का अभाव, सीमित सुविधाएं और सामाजिक पूर्वाग्रह आज भी अनगिनत प्रतिभाओं का रास्ता रोकते हैं। यदि चैंपियंस ट्रॉफी की चमक मुंबई और वडोदरा तक सिमट गई तो भारत इस अवसर का आधा ही लाभ उठा पाएगा। इसे स्कूलों, कॉलेजों, जिलों और छोटे कस्बों तक पहुंचाना होगा। हरमनप्रीत जैसी सितारों के साथ हजारों नई खिलाड़ियों के लिए रास्ते खोलने होंगे; तभी महिला क्रिकेट सचमुच व्यापक होगा।

भारत के सामने सवाल यह नहीं कि वह चैंपियंस ट्रॉफी कितनी अच्छी तरह आयोजित करेगा, बल्कि यह है कि आयोजन के बाद क्या बचाएगा। बेहतर घरेलू ढांचा, अधिक प्रशिक्षण सुविधाएं, महिला कोचों की बढ़ती संख्या और लड़कियों में खेल को करियर मानने का आत्मविश्वास—यदि ये इसकी देन बनें, तभी मेजबानी सार्थक होगी। अंतरराष्ट्रीय टूर्नामेंट तभी सामाजिक बदलाव की सीढ़ी बनेगा, जब उसकी गूंज स्टेडियमों से निकलकर उस स्कूल के मैदान तक पहुंचे, जहां कोई किशोरी पहली बार क्रिकेट की गेंद थाम रही है। यही विस्तार एक आयोजन को घटना से आंदोलन बना सकता है।

श्रीलंका से भारत तक चैंपियंस ट्रॉफी का पहुंचना महज मेजबान बदलने की खबर नहीं, महिला क्रिकेट की बदलती हैसियत का ऐलान है। भारत को सम्मान मिला है तो परीक्षा भी—वह इसे सिर्फ सफल आयोजन तक रखता है या महिला क्रिकेट के भविष्य की नींव बनाता है, फैसला अब उसके हाथ में है। असली जीत ट्रॉफी या वाहवाही में नहीं, उस विश्वास में होगी कि अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट का मैदान गांव की बेटी के लिए भी खुला है। 2027 में मुंबई या वडोदरा में खेलती किसी भारतीय खिलाड़ी को देखकर यदि किसी गांव की लड़की यह सपना देखे कि वह भी वहां पहुंच सकती है, तो यही मेजबानी की बड़ी सफलता होगी। जिस दिन यह विश्वास घर-घर पहुंचेगा, उसी दिन भारत सिर्फ चैंपियंस ट्रॉफी का मेजबान नहीं, महिला क्रिकेट का नया घर कहलाएगा।