डॉ. प्रियंका सौरभ
जन्माष्टमी भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक चेतना में गहराई से रचा-बसा ऐसा पर्व है, जो केवल एक तिथि नहीं, बल्कि हमारी भावनाओं, स्मृतियों और जीवन-मूल्यों का उत्सव है। भाद्रपद मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी की रात्रि जब मंदिरों में शंखनाद गूंजता है और ‘नंद के घर आनंद भयो’ की ध्वनि वातावरण को भक्तिमय कर देती है, तब मानो समय कुछ क्षणों के लिए ठहर जाता है। घरों, मंदिरों और गलियों में सजी झांकियों के बीच झूले में विराजमान नन्हे कान्हा श्रद्धा, प्रेम और उल्लास का केंद्र बन जाते हैं।
जन्माष्टमी पर छोटे-छोटे बच्चों को कृष्ण का रूप देने की परंपरा विशेष आकर्षण का केंद्र होती है। मोरपंख, पीतांबर, मुकुट, बांसुरी और नटखट मुस्कान से सजे बच्चे जब सामने आते हैं, तो वातावरण में सहज ही आनंद भर जाता है। लेकिन प्रश्न यह है कि क्या कान्हा बनाना केवल इतना ही है? क्या मुकुट पहनाने और बांसुरी थमाने से हमारी जिम्मेदारी पूरी हो जाती है?
वास्तव में, बच्चे को कान्हा बनाना केवल उसकी बाहरी सज्जा नहीं, बल्कि उसके भीतर जीवन-मूल्यों के बीज बोने का अवसर है। यह अवसर हमें बताता है कि कृष्ण केवल एक धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि प्रेम, मित्रता, करुणा, साहस, विवेक और कर्मशीलता के भी प्रतीक हैं। जब कोई बच्चा कान्हा का रूप धारण करता है, तो उसके साथ कृष्ण के चरित्र और उनके जीवन-संदेश को समझाना भी उतना ही आवश्यक हो जाता है।
कृष्ण का बाल-रूप भारतीय जनमानस में सदियों से विशेष प्रिय रहा है। उनकी नटखटता में जीवन का उल्लास है, उनकी बांसुरी में प्रेम और संवाद की मधुरता है, उनकी मित्रता में आत्मीयता है और कंस के विरुद्ध संघर्ष में अन्याय के सामने खड़े होने का साहस। यही कारण है कि कृष्ण की कथाएँ बच्चों को सहज रूप से आकर्षित करती हैं। इन कथाओं में मनोरंजन भी है और जीवन की गहरी सीख भी।
आज के समय में इस सीख की आवश्यकता और बढ़ गई है। आज का बचपन बदल चुका है। आंगन, चौपाल और खुले मैदानों की जगह मोबाइल, कंप्यूटर, वीडियो गेम और सोशल मीडिया ने ले ली है। तकनीक ने बच्चों के लिए ज्ञान और संभावनाओं के नए द्वार खोले हैं, लेकिन उसके साथ एक चुनौती भी आई है—बच्चों का अपनी सांस्कृतिक जड़ों और वास्तविक सामाजिक संबंधों से दूर होना।
ऐसे समय में जन्माष्टमी जैसे पर्व बच्चों को अपनी संस्कृति से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम बन सकते हैं। किंतु हमें सावधान रहना होगा कि त्योहार केवल फोटो खिंचवाने, आकर्षक वेशभूषा पहनाने और सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने तक सीमित न हो जाए। यदि बच्चा कान्हा की वेशभूषा तो पहन ले, लेकिन प्रेम, सत्य, करुणा और साहस को अपने व्यवहार में न उतारे, तो त्योहार का वास्तविक उद्देश्य अधूरा रह जाएगा।
कृष्ण की कथाओं में बच्चों के लिए अनेक जीवन-पाठ छिपे हैं। माखन-चोरी की बाल-लीलाएँ जीवन में सहजता और आनंद का संदेश देती हैं। गोवर्धन पर्वत की कथा सामूहिकता, नेतृत्व, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की सीख देती है। सुदामा और कृष्ण की मित्रता बताती है कि सच्चे संबंध धन-दौलत या सामाजिक स्थिति के आधार पर नहीं, बल्कि प्रेम और आत्मीयता पर टिके होते हैं। कुरुक्षेत्र में कृष्ण का संदेश यह सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिए।
इन्हीं मूल्यों को आज के संदर्भ में बच्चों के जीवन से जोड़ने की जरूरत है। आधुनिक कान्हा वह बच्चा नहीं है जो केवल स्मार्टफोन चलाना जानता हो, बल्कि वह है जो तकनीक का विवेकपूर्ण और जिम्मेदार उपयोग करना जानता हो। वह इंटरनेट से ज्ञान प्राप्त करे, लेकिन गलत सूचना और नकारात्मक सामग्री से स्वयं को बचाना भी सीखे। वह सोशल मीडिया पर सक्रिय हो, लेकिन किसी का उपहास या अपमान न करे। वह साइबर बुलिंग का हिस्सा बनने के बजाय उसके विरुद्ध खड़ा हो।
आधुनिक कान्हा वह भी है जो अन्याय को देखकर चुप न रहे। वह लैंगिक भेदभाव का विरोध करे, कमजोर साथी का साथ दे और जरूरतमंद की सहायता करे। उसमें प्रश्न पूछने का साहस हो, लेकिन दूसरों के विचारों का सम्मान करने की विनम्रता भी हो। वह प्रतिस्पर्धा करे, लेकिन संवेदनशीलता न खोए।
बच्चों को कान्हा के गुण सिखाने की शुरुआत घर से हो सकती है। जन्माष्टमी पर वेशभूषा पहनाने के साथ माता-पिता उन्हें कृष्ण की कोई छोटी-सी कथा सुनाएँ और उसका अर्थ समझाएँ। बांसुरी को केवल सजावट की वस्तु न मानकर प्रेम, संगीत और संवाद का प्रतीक बताया जा सकता है। मुकुट को केवल राजसी वैभव नहीं, बल्कि जिम्मेदारी का प्रतीक समझाया जा सकता है। मोरपंख हमें प्रकृति और सौंदर्य से जोड़ सकता है, जबकि पीतांबर सादगी और पवित्रता की याद दिला सकता है।
जन्माष्टमी प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता का संदेश देने का भी अवसर है। कृष्ण का जीवन गोवर्धन, गौवंश, यमुना और वृंदावन की प्राकृतिक दुनिया से जुड़ा हुआ है। बच्चों को समझाया जा सकता है कि प्रकृति केवल उपयोग की वस्तु नहीं, बल्कि हमारे जीवन का आधार है। त्योहारों में प्लास्टिक और अनावश्यक कृत्रिम सजावट के स्थान पर मिट्टी, कपड़े, कागज और अन्य पर्यावरण-अनुकूल सामग्री का उपयोग किया जाए। छोटी-सी पहल भी बच्चे के भीतर बड़ी पर्यावरणीय चेतना विकसित कर सकती है।
हमें यह भी समझना होगा कि संस्कार उपदेशों से कम और व्यवहार से अधिक आते हैं। यदि हम बच्चों को कृष्ण की मित्रता की कथा सुनाएँ, लेकिन स्वयं उनके सामने रिश्तों में स्वार्थ और कटुता का व्यवहार करें, तो संदेश कमजोर पड़ जाएगा। यदि हम सत्य का महत्व बताएं, लेकिन अपने आचरण में उससे समझौता करें, तो बच्चे शब्दों के बजाय व्यवहार से सीखेंगे। इसलिए ‘मेरे कान्हा’ बनाने की पहली जिम्मेदारी परिवार और समाज की है।
मेरे लिए ‘मेरे कान्हा’ केवल वह बच्चा नहीं है जिसके सिर पर मोरपंख और मुकुट सजा हो। मेरा कान्हा वह बच्चा है जिसके मन में मासूमियत हो, हृदय में करुणा हो, व्यवहार में विनम्रता हो और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस हो। वह अपने सपनों को पूरा करने के लिए मेहनत करे, असफलता में टूटे नहीं और सफलता में अहंकार न करे। वह अपनी संस्कृति से जुड़े, लेकिन दूसरे की संस्कृति और विचारों का सम्मान भी करे।
कान्हा का अर्थ जीवन से प्रेम करना भी है और जीवन की कठिनाइयों का सामना करना भी। उनकी बांसुरी हमें मधुरता देती है, लेकिन उनका संदेश हमें कर्म का साहस भी देता है। इसलिए बच्चों को कृष्ण के केवल मनमोहक बाल-रूप से परिचित कराना पर्याप्त नहीं; उन्हें कृष्ण के विचारों और जीवन-दृष्टि से भी परिचित कराना होगा।
इस जन्माष्टमी पर आइए, हम बच्चों को केवल मोरपंख, मुकुट और बांसुरी न पहनाएँ। उन्हें प्रेम का आभूषण, करुणा का हृदय, सत्य का आधार और साहस का मुकुट भी दें। उन्हें सिखाएँ कि तकनीक उनके हाथ में हो, लेकिन विवेक उनके मन में; सफलता उनके सामने हो, लेकिन संवेदना उनके भीतर; और अधिकार उनके पास हों, लेकिन जिम्मेदारी का बोध भी उतना ही गहरा हो।
क्योंकि सच्चा कान्हा वही है जो अपने आसपास के संसार को थोड़ा और सुंदर, संवेदनशील और न्यायपूर्ण बनाने का प्रयास करे। जब हमारे बच्चों की मुस्कान में मासूमियत, व्यवहार में करुणा, विचारों में विवेक और कर्म में साहस होगा, तभी जन्माष्टमी का उत्सव अपने वास्तविक अर्थ को प्राप्त करेगा।
इस जन्माष्टमी आइए, बच्चों को केवल कान्हा का रूप नहीं, कान्हा के गुण दें। शायद यही संस्कार आने वाले कल के उस समाज की नींव बनेंगे, जहाँ प्रेम होगा, सौहार्द होगा, प्रकृति के प्रति सम्मान होगा और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस भी होगा। तभी हमारा समाज सच्चे अर्थों में एक सुंदर वृंदावन बन सकेगा।





