भागवत कथा मनुष्य को भगवत बना देती है।

The narration of the Bhagavata transforms a human being into a divine being

जीवन का व्यवहार सत्य पर ही आधारित है तथा सत्ता उसी माध्यम से प्रमाणित होती है, जिससे वह प्राप्त होती है। – अतुल कृष्ण भारद्वाज

दीपक कुमार त्यागी

गाजियाबाद : श्रीलक्ष्मी नारायण मंदिर मोदीनगर में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास अतुल कृष्ण भारद्वाज महाराज ने श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ के दौरान श्रद्धालुजनों को ज्ञान की महिमा बताते हुए कहा कि भागवत कथा मनुष्य को भगवत बना देती है।

श्रीमद् भागवत कथा में ऐसी अद्भुत शक्ति है, जो भटके हुए को सही मार्ग दिखाती है, बिगड़े हुए को सुधार देती है और दुष्टों का उद्धार कर देती है।

उन्होंने कहा कि गीता ज्ञान है और यह ज्ञान कैसा होना चाहिए, इसका वर्णन भगवान ने भागवत में किया है। जब बुद्धि भगवान में लग जाए अथवा भगवान स्वयं बुद्धि का वरण कर लें, तो समझ लेना चाहिए कि मनुष्य को सच्चे ज्ञान की प्राप्ति हो गई है।

क्योंकि यही बुद्धि है, जो मनुष्य के विचारों एवं आचरण को अपने आदेश पर चलाती है और मन को दिशा प्रदान करती है। यदि बुद्धि भगवान में लग जाए तो उसमें ऐसे विचार कभी उत्पन्न ही नहीं होंगे, जिनसे किसी का अहित या नुकसान हो।

जो भगवान के सामने रोता है, उसे संसार के सामने रोने की आवश्यकता नहीं रहती। भगवान अपने भक्तों के लिए दौड़े चले आते हैं और उन्हें अपने पास रख लेते हैं। जिसे पूरी दुनिया घूमने पर भी शांति नहीं मिलती, उसे भगवान की गोदी में आकर वास्तविक शांति प्राप्त होती है।

अतुल कृष्ण भारद्वाज ने बताया कि भगवान ने अपना विराट स्वरूप केवल एक बार और केवल एक ही व्यक्ति को दिखाया था — महाभारत के युद्ध में अर्जुन को। इसके अतिरिक्त भगवान ने किसी को भी अपने विराट स्वरूप का दर्शन नहीं कराया।

कथा व्यास ने कहा कि भगवान के अपने धाम लौटने के साथ ही कलयुग का प्रारंभ हो गया और कलयुग ने अत्याचार करना शुरू कर दिया। कलयुग ने बैल रूपी धर्म पर प्रहार किया, जिससे धर्म के तीन पैर टूट गए, लेकिन सत्य पर जो पैर था, वह नहीं टूटा और वही आज भी स्थापित है।

जीवन का व्यवहार भी सत्य पर ही चलता है। उन्होंने कहा कि लोगों ने धर्म की परिभाषा ही बदल डाली है। धर्म के चार स्तंभ हैं – तप, सत्य, दया एवं पवित्रता। कलयुग में मनुष्य न तो तप कर सकता है और न ही भगवान की तरह दयालु हो सकता है। रही पवित्रता की बात, तो वह भी धीरे-धीरे नष्ट होती जा रही है। केवल सत्य ही ऐसा है, जो पहले भी स्थापित था, आज भी है और कल भी रहेगा।

अतुल कृष्ण भारद्वाज ने कहा कि हमारे देश की संस्कृति की वर्तमान स्थिति चिंता का विषय है। दृष्टि, मन, मोबाइल, टीवी, फिल्म जैसे अनेक साधन सहज उपलब्ध हैं, जिनके दुष्परिणाम आने वाले समय में और अधिक देखने को मिलेंगे। आज से सौ वर्ष पूर्व हमारी संस्कृति कैसी थी और आज कैसी है — इसका तुलना करना ही पर्याप्त है। आज अखबारों के प्रत्येक पृष्ठ पर अपराध की खबरें छपी रहती हैं। क्या बीस वर्ष पहले भी ऐसी स्थिति थी? आज पूरे समाज के लगभग प्रत्येक क्षेत्र में यह स्थिति देखी जा सकती है।

आज मुकेश खांडेकर क्षेत्रीय संगठन मंत्री विश्व हिंदू परिषद, ईश्वर दयाल वरिष्ठ प्रचारक, आज के यजमान दीपक गर्ग, मोहित सिंघल, अनुज सिंघल, वैभव सिंघल, मुकेश सिंघल, शिवम सिंघल, मुकेश गैस वाले, शलभ गुप्ता, जीवन ऋषि महाराज, देव मुनि महाराज पूरा महादेव, आरोग्य देव महाराज भानु शिशोदिया आदि उपस्थित रहे।