भारत सहित 56 देशों क़ी 190 साल की गुलामी, ब्रिटेन की ऐतिहासिक माफ़ी की दस्तक!

190 years of slavery of 56 countries including India, Britain's historic apology knocks!

एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

वैश्विक स्तरपर भारत ने बचपन से अपनी पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा है कि अंग्रेजों ने हमारे देश पर शासन किया,हमारी संपत्ति का दोहन किया औरस्वतंत्रता के लिए लंबे संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ।लेकिन आज इतिहास का एक ऐसाअध्याय फिर अंतरराष्ट्रीय चर्चा के केंद्र में है,जिसमें ब्रिटेन की ओर से गुलामी और औपनिवेशिक अत्याचारों के लिए औपचारिक माफ़ी की संभावना सामने आई है, जबकि आर्थिक मुआवजे की मांग को सिरे से ख़ारिज किया जा रहा है।मीडिया में आई रिपोर्टिंग़ के अनुसार 1 से 4 नवंबर 2026 तक एंटीगुआ और बारबुडा में आयोजित राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन के दौरान यह सवाल और तीखा हो गया है कि क्या केवल दुख़ जताना ऐतिहासिक अन्याय का सटीकता से पर्याप्त समाधान है?

साथियों बात अगर हम राष्ट्रमंडल शिखर सम्मेलन : इतिहास, कूटनीति और भविष्य को समझने की करें तो 1 से 4 नवंबर 2026 तक सेंट जॉन्स,एंटीगुआ और बारबुडा में आयोजित 28वें राष्ट्रमंडल शासनाध्यक्ष सम्मेलन में 56 देशों के नेता एकत्र हुए। सम्मेलन का आधिकारिक विषय साझेदारी और निवेश के माध्यम से समृद्ध राष्ट्रमंडल का निर्माण है,लेकिन गुलामी की विरासत, क्षतिपूर्ति,ऋण राहत और जलवायु न्याय भी चर्चा के महत्वपूर्ण मुद्दे बन गए हैं। यह बहस भारत के लिए भी महत्वपूर्ण है। भारत ने लगभग 190 वर्षों के औपनिवेशिक शासन के बाद स्वतंत्रता प्राप्त की और औपनिवेशिक इतिहास की स्मृति आज भी उसकी राष्ट्रीय चेतना का हिस्सा है। हालांकि भारत की औपनिवेशिक विरासत और कैरेबियाई देशों की दासता की विरासत अलग-अलग हैं, दोनों ही इतिहास यह प्रश्न उठाते हैं कि साम्राज्यवादी शोषण के दीर्घकालिक प्रभावों का सामना आधुनिक राष्ट्र कैसे करें।

साथियों बात अगर हम भारत पर अंग्रेजी शासन: 1757 से 1947 तक का ऐतिहासिक सफ़र को समझने की करें तो,भारत में अंग्रेजी राजनीतिक प्रभुत्व की शुरुआत सामान्यतः 23 जून 1757 को प्लासी के युद्ध से मानी जाती है। ईस्ट इंडिया कंपनी ने बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला को पराजित कर भारतीय राजनीति में निर्णायक हस्तक्षेप की शुरुआत की। इसके बाद कंपनी ने व्यापारिक शक्ति से शासनकारी शक्ति बनने की दिशा में कदम बढ़ाए। 1857 के विद्रोह के बाद 1858 में भारत का शासन सीधे ब्रिटिश क्राउन के अधीन चला गया। इस प्रकार 1757 से 1947 तक लगभग 190 वर्षों का ब्रिटिश प्रभुत्व रहा,जिसमें 1858 से 1947 तक लगभग 89 वर्ष प्रत्यक्ष ब्रिटिश राजशाही का शासन था। यहां एक ऐतिहासिक अंतर समझना आवश्यक है: भारत पर औपनिवेशिक शासन और अटलांटिक पार अफ्रीकीलोगों की दासता एक ही कानूनी व्यवस्था नहीं थीं। भारत में अंग्रेजों ने राजनीतिक अधीनता आर्थिक शोषण, संसाधनों के दोहन और औपनिवेशिक प्रशासन के माध्यम से शासन किया, जबकि ट्रांस-अटलांटिक दास व्यापार में लाखों अफ्रीकी लोगों को जबरन पकड़कर, बेचकर और पीढ़ियों तक संपत्ति की तरह रखकर गुलाम बनाया गया। दोनों इतिहासों में अत्याचार और शोषण के गंभीर अध्याय हैं,लेकिन उनकी ऐतिहासिक परिस्थितियां और कानूनी स्वरूप सटीकता से अलग-अलग थे।

साथियों बात अगर हम ब्रिटेन की माफी की पेशकश: अचानक क्यों बदला रुख?को समझने की करें तो,30 अक्टूबर 2026 को ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने द गार्जियन में प्रकाशित अपने लेख में कहा कि ब्रिटेन ट्रांस- अटलांटिक दास व्यापार से प्रभावित देशों के साथ संरचित संवाद शुरू करने के लिए तैयार है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ब्रिटिश राज्य की ओर से औपचारिक माफी की मांगों को सुनना इस संवाद का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा और वे इसके लिए खुले हैं।उन्होंने लाखों लोगों के दर्द और पीड़ा के प्रति दुख और खेद भी व्यक्त किया। यह बयान ब्रिटेन की पुरानी नीति से महत्वपूर्ण बदलाव है।इससे पहले ब्रिटिश सरकारें ऐतिहासिक अत्याचारों पर अफसोस तो जताती रही थीं, लेकिन औपचारिक माफी और क्षतिपूर्ति की मांगों पर आगे बढ़ने से बचती रही थीं। अब 56 सदस्यीय राष्ट्रमंडल के नेताओं के सम्मेलन से पहले ब्रिटेन ने बातचीत का रास्ता खोला है। हालांकि, यह अभी औपचारिक माफी नहीं है, बल्कि माफी की मांगों पर विचार और संवाद के लिए सहमति है।

साथियों बात अगर हम गुलामी का कानून: 1833 का अधिनियम और उसके पीछे का विरोधाभास को समझने की करें तो ब्रिटेन की संसद ने 28 अगस्त 1833 को स्लैवेरी अबोलीशन एक्ट 1833 पारित किया।यह कानून 1 अगस्त 1834 से प्रभावी हुआ और ब्रिटिश साम्राज्य के अधिकांश उपनिवेशों में गुलामी की कानूनी व्यवस्था समाप्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। लेकिन कानून के अंतर्गत स्वतंत्रता तत्काल और पूर्ण नहीं थी। पूर्व गुलामों को एक संक्रमण कालीन व्यवस्था में रखा गया, जिसे ‘अप्रेंटिसशिप’ कहा गया। इसके तहत उन्हें अपने पूर्व मालिकों के लिए बिना उचित पारिश्रमिक के काम करना पड़ता था। यह व्यवस्था 1838 में समाप्त हुई। इस कानून का सबसे बड़ा विरोधाभास यह था कि गुलामी से पीड़ित लोगों को मुआवजा देने के बजाय गुलामों के मालिकों को 2 करोड़ पाउंड की राशि दी गई। यह उस समय ब्रिटिश सरकार के लिए अत्यंत विशाल वित्तीय प्रतिबद्धता थी।आज के मूल्य में इसकी राशि अरबों पाउंड के बराबर बैठती है।गुलामी से लाभ कमाने वालों को आर्थिक राहत और पीड़ितों को केवल सीमित स्वतंत्रता मिलने का यह ऐतिहासिक अन्याय आज की क्षतिपूर्ति बहस की प्रमुख वजह है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि 1833 का कानून भारत पर सीधे लागू नहीं हुआ था। ईस्ट इंडिया कंपनी के अधीन भारतीय क्षेत्रों को इसके दायरे से बाहर रखा गया था। भारत में 7 अप्रैल 1843 को इंडियन स्लैवेरी एक्ट 1843 पारित हुआ। इसने अदालतों को किसी व्यक्ति को गुलाम मानकर बेचने या उसके श्रम पर मालिकाना अधिकार लागू करने से रोका। हालांकि, इस कानून का प्रभाव मुख्यतः कानूनी मान्यता और न्यायिक प्रवर्तन पर था; सामाजिक और आर्थिक शोषण की सभी परिस्थितियां इससे समाप्त नहीं हुईं।

साथियों बात अगर हम मुआवजे की मांग: केवल पैसा नहीं, ऐतिहासिक न्याय को समझने की करें तो कैरेबियाई देशों की मांग केवल एकमुश्त धनराशि प्राप्त करने तक सीमित नहीं है। कैरेबियन समुदाय की क्षतिपूर्ति योजना में औपचारिक माफी, सांस्कृतिक धरोहरों की वापसी,शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में निवेश,स्वदेशी समुदायों का विकास, मानसिक स्वास्थ्य सहायता तकनीकी हस्तांतरण और कर्ज माफी जैसे उपाय शामिल हैं।इसके पीछे तर्क है कि गुलामी औरऔपनिवेशिक शोषण ने केवल पिछली पीढ़ियों को नुकसान नहीं पहुंचाया, बल्कि उसके प्रभाव आज भी गरीबी,असमानता और विकास की बाधाओं के रूप में दिखाई देते हैं। ब्रिटेन का तर्क है कि वर्तमान पीढ़ी को उन ऐतिहासिक अपराधों के लिए व्यक्तिगत रूप से जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता जिनमें उसका प्रत्यक्ष योगदान नहीं था। प्रधानमंत्री बर्नहम ने वित्तीय क्षतिपूर्ति को अस्वीकार करते हुए गरीब राष्ट्रमंडल देशों के ऋण पुनर्गठन, लंबी भुगतान अवधि और बेहतर ब्याज दरों की दिशा में पहल का प्रस्ताव रखा है। पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन को इस पहल में भूमिका निभाने के लिए कहा गया है। लेकिन कैरेबियाई नेताओं का कहना है कि कर्ज राहत और विकास सहायता, ऐतिहासिक क्षतिपूर्ति का पूर्ण विकल्प सटीकता से नहीं हो सकते।

साथियों बात अगर हम किंग चार्ल्स तृतीय:दुख की स्वीकारोक्ति लेकिन औपचारिक माफी नहीं इसको समझने की करें तो,ब्रिटेन के किंग चार्ल्स तृतीय ने कैरेबियाई दौरे के दौरान बहामास में अतीत की गंभीर पीड़ा और अन्याय को स्वीकार किया।उन्होंने ऐतिहासिक अन्याय को पहचानने और भविष्य की ओर देखने की आवश्यकता पर जोर दिया। हालांकि, बकिंघम पैलेस ने स्पष्ट किया कि राजा की ओर से औपचारिक माफी की घोषणा नहीं की जा रही है। संवैधानिक व्यवस्था में सरकार की नीतिगत जिम्मेदारी प्रधानमंत्री और मंत्रिमंडल की होती है;राजा राष्ट्रमंडल के प्रमुख के रूप में बोलते हैं, न कि सरकार की ओर से नीतिगत निर्णय घोषित करते हैं।

अतः अगर हम उपरोक्त पूरे विवरण का अध्ययन कर इसका विश्लेषण करें तो हम पाएंगे क़ि ब्रिटेन का औपचारिक माफी के लिए खुलापन एक महत्वपूर्ण कूटनीतिक बदलाव है,लेकिन ऐतिहासिक न्याय की बहस अभी समाप्त नहीं हुई है।माफी,मुआवजा,विकास सहायता और ऋण राहत के बीच संतुलन कैसे बनेगा,यह आने वाले संवादों से तय होगा।इतिहास की सच्ची स्वीकारोक्ति तभी सार्थक होगी जब वह वर्तमान और भविष्य में समानता, गरिमा तथा न्याय को मजबूत करने वाले ठोस कदमों में परिवर्तित हो।