अशोक भाटिया
मई २०२३ से निरंतर सुलग रही जातीय हिंसा की आग में झुलस रहा पूर्वोत्तर का सीमांत राज्य मणिपुर एक बार फिर भीषण जन-आक्रोश के मुहाने पर खड़ा हो गया है। ३१ अक्टूबर २०२६ को राजधानी इंफाल की सड़कों पर उमड़ा अभूतपूर्व जनसैलाब केवल एक आम विरोध प्रदर्शन नहीं था, बल्कि यह राज्य में साढ़े तीन साल से अधिक समय से जारी अस्थिरता, सामूहिक असुरक्षा और प्रशासनिक शून्यता के खिलाफ फूटा एक ऐतिहासिक जनाक्रोश था। ‘कोऑर्डिनेटिंग कमेटी ऑन मणिपुर इंटीग्रिटी’ द्वारा आयोजित और विभिन्न नागा नागरिक निकायों द्वारा समर्थित इस ‘महा-रैली’ ने मणिपुर के जटिल संघर्ष परिदृश्य में एक अभूतपूर्व नए सामाजिक संरेखण को जन्म दिया है। हाल ही में उग्रवादियों द्वारा १४ मैतेई पुरुषों पर घात लगाकर किए गए हमले और उसमें तीन ग्रामीणों की निर्मम हत्या ने इस नए उबाल को भड़काने में बारूद का काम किया। इस ऐतिहासिक जन-एकजुटता ने सीधे तौर पर नई दिल्ली की नीतियों, केंद्रीय सुरक्षा व्यवस्था की संदिग्ध तटस्थता, स्थानीय शासन की अक्षमता और कुकी-ज़ो उग्रवादी समूहों के साथ हुए ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ समझौते को देश के सबसे बड़े लोकतांत्रिक कटघरे में ला खड़ा किया है।
मणिपुर का यह संकट मूल रूप से घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मैतेई समुदाय, जो राज्य की लगभग ६० प्रतिशत आबादी होने के बावजूद मात्र १० प्रतिशत भूभाग पर सिमटे हैं, और पहाड़ी क्षेत्रों में सदियों से निवास करने वाले कुकी-ज़ो एवं नागा समुदायों के बीच एक गहरी अविश्वास की खाई का परिणाम है। मई २०२३ में जब मैतेई समुदाय द्वारा अनुसूचित जनजाति दर्जे की मांग की गई और कुकी समूहों द्वारा इसका प्रतिवाद किया गया, तब भड़की जातीय चिंगारी ने समूचे सूबे के सामाजिक ताने-बाने को राख में तब्दील कर दिया। इस निरंतर जारी संघर्ष ने ३०० से अधिक जानें ली हैं और लगभग ६०,००० से अधिक नागरिकों को आंतरिक रूप से विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया है, जो आज भी राहत शिविरों में अपनी पहचान की भीख मांग रहे हैं। परंतु, वर्ष २०२६ का उत्तरार्ध आते-आते सुरक्षात्मक और सामाजिक मोर्चे पर एक गहरा बदलाव आया है। केंद्रीय व्यवस्था के बाद, लोकतांत्रिक प्रक्रिया को पटरी पर लाने के लिए फरवरी २०२६ में भाजपा नेता युमनम खेमचंद सिंह को नया मुख्यमंत्री नियुक्त किया गया।
लेकिन यह सत्ता परिवर्तन भी राज्य में स्थाई शांति लाने में विफल रहा। नए राजनीतिक नेतृत्व के आते ही पहाड़ी इलाकों में कुकी और नागा समुदायों के बीच नए सिरे से हिंसक झड़पें शुरू हो गईं, जिसमें देखते ही देखते लगभग ५० लोगों की जान चली गई। इस नए हिंसक मोड़ ने नागा समाज को अपनी सुरक्षा के प्रति अत्यधिक चिंतित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप ३१ अक्टूबर की रैली में इतिहास में पहली बार मैतेई, नागा, पांगल और अन्य स्वदेशी समुदाय म्यांमार सीमा से सटे पहाड़ी और घाटी क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए एक साझा मंच पर कंधे से कंधा मिलाकर खड़े नजर आए। यह उभरता हुआ गठबंधन घाटी और पहाड़ों के एक बड़े हिस्से को एक सूत्र में पिरोता है, जो वर्तमान में कुकी सशस्त्र समूहों की आक्रामक गतिविधियों को अपनी अस्मिता और क्षेत्रीय अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा मान रहे हैं। इंफाल के ऐतिहासिक कांग्ला फोर्ट से लेकर चंदेल और सेनापति जिलों के सुदूर पहाड़ी रास्तों तक गूंज रही इन नागरिक मांगों के केंद्र में तीन ऐसे बिंदु हैं, जो भारत की आंतरिक सुरक्षा नीति पर गहरे सवालिया निशान खड़े करते हैं। प्रदर्शनकारियों की सबसे पहली और मुखर मांग त्रिपक्षीय ‘सस्पेंशन ऑफ ऑपरेशंस’ समझौते को तत्काल प्रभाव से रद्द करने की है।
नागरिक संगठनों का आरोप है कि इस युद्धविराम समझौते की आड़ में उग्रवादी शिविरों से बाहर आ रहे हैं और अत्याधुनिक हथियारों का खुलेआम प्रदर्शन कर आम बस्तियों और राजमार्गों पर हमलों को अंजाम दे रहे हैं। यद्यपि हाल के दिनों में सेना और केंद्रीय सुरक्षा बलों ने कुछ उग्रवादी शिविरों का नियंत्रण हाथ में लेकर भौतिक ऑडिट की योजना प्रस्तुत की है, परंतु निरंतर भय के साए में जी रही जनता के लिए यह कदम अपर्याप्त और लीपापोती जैसा प्रतीत होता है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि इस आंदोलन के माध्यम से जनता ने सीधे भारत सरकार पर मणिपुर में एक छद्म युद्ध चलाने का आरोप लगाया है। विशेष रूप से असम राइफल्स की भूमिका को लेकर मैतेई और नागा नागरिक समाजों में तीव्र रोष व्याप्त है। उन पर पक्षपात करने और उग्रवादी गतिविधियों पर मूकदर्शक बने रहने के आरोप लगाते हुए प्रदर्शनकारियों ने उन्हें संवेदनशील अंतरराष्ट्रीय सीमावर्ती क्षेत्रों से हटाने और उनकी जगह सीमा सुरक्षा बल या अन्य निष्पक्ष केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती की मांग की है।
इन सुरक्षात्मक मांगों के समानांतर, पिछले साढ़े तीन वर्षों से भीषण अमानवीय परिस्थितियों में जी रहे हजारों आंतरिक रूप से विस्थापित व्यक्तियों की सुरक्षित और गरिमापूर्ण वापसी का मुद्दा भी अब एक जन-आंदोलन का रूप ले चुका है। इसके साथ ही, पड़ोसी देश म्यांमार में जारी गृहयुद्ध के कारण हो रहे अनियंत्रित अवैध प्रवासन को रोकने के लिए वर्ष १९५१ को आधार वर्ष मानकर राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर को राज्य में तुरंत प्रभाव से लागू करने की मांग स्वदेशी संगठनों के लिए एक गैर-परक्राम्य अस्मिता की लड़ाई बन चुकी है। मणिपुर की यह अंतहीन त्रासदी महज एक कानून-व्यवस्था की समस्या या दो समुदायों का आपसी विवाद नहीं है, बल्कि यह स्वतंत्र भारत के इतिहास की सबसे बड़ी राजनीतिक और प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता स्मारक है। नई दिल्ली और इंफाल की सरकारों ने संकट के शुरुआती दौर में जिस वैचारिक ढुलमुलपन और रणनीतिक उदासीनता का परिचय दिया, उसी का खामियाजा आज पूरा पूर्वोत्तर भुगत रहा है। यह प्रशासनिक गतिरोध साफ तौर पर बयां करता है कि मणिपुर की चुनी हुई सत्ता और उसकी पीड़ित जनता के बीच संवाद के तमाम पुल पूरी तरह से ध्वस्त हो चुके हैं।
जब तक व्यवस्था में गहरे पैठ चुके राजनीतिक नेतृत्व के संकट को दूर नहीं किया जाएगा और सभी पक्षों को एक मेज पर लाने की ईमानदार कोशिश नहीं होगी, तब तक बंदूक की नोक पर थोपी गई शांति अस्थाई ही साबित होगी। मणिपुर आज भारत की अखंडता, संप्रभुता और विविध संस्कृतियों के सह-अस्तित्व के सिद्धांत की सबसे कठिन अग्निपरीक्षा ले रहा है। मैतेई और नागा नागरिक समाजों का यह नया जुड़ाव जहां एक तरफ स्वदेशी सुरक्षा चिंताओं को वैश्विक पटल पर लाता है, वहीं दूसरी तरफ केंद्र सरकार को यह अंतिम चेतावनी भी देता है कि यदि समय रहते न्यायपूर्ण और कठोर कदम नहीं उठाए गए, तो आगामी २०२७ के मणिपुर विधानसभा चुनावों से पहले समूचा राज्य एक ऐसे व्यापक हिंसक संघर्ष की चपेट में आ सकता है जिसे संभालना सुरक्षा बलों के वश में भी नहीं रहेगा। शांति का वास्तविक मार्ग उग्रवादी तत्वों को राजनीतिक संरक्षण देने या केवल सैन्य बल के क्रूर प्रदर्शन से कभी नहीं निकल सकता। केंद्र सरकार को SoO समझौते के जमीनी नियमों का कड़ाई से पालन सुनिश्चित कराना होगा और जो भी सशस्त्र समूह इस देश के कानून को चुनौती देकर हिंसा में लिप्त हैं, उनके खिलाफ निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। इसके साथ ही, विस्थापितों को उनके मानवाधिकार, गरिमापूर्ण जीवन और सुरक्षा की संवैधानिक गारंटी देकर पुनर्वास को सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होगी। मणिपुर की ऐतिहासिक धरती को रक्तपात से बचाने के लिए देश के शीर्ष नेतृत्व को अपनी उदासीनता का परित्याग करना होगा। नई दिल्ली को दिल्ली के कमरों से बाहर निकलकर सभी समुदायों के दिलों में विश्वास की नई अलख जगानी होगी और एक ऐसी दीर्घकालिक, पारदर्शी और न्यायसंगत शांति नीति का निर्माण करना होगा, जिसमें किसी भी स्वदेशी नागरिक को अपनी ही पैतृक जमीन पर बेगाना महसूस न करना पड़े।





