राजस्थान की अस्मिता, सांस्कृतिक विरासत और करोड़ों लोगों की मातृभाषा को संवैधानिक पहचान दिलाने की मांग फिर चर्चा में
एन जी भट्ट
राजस्थानी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल करने की दशकों पुरानी मांग एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 17 अक्टूबर को जोधपुर सर्किट हाउस में मीडिया से बातचीत के दौरान राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता देने के सवाल पर सकारात्मक संकेत दिए। उन्होंने बताया कि इस विषय पर केंद्र सरकार के स्तर पर विचार-विमर्श जारी है और उम्मीद जताई कि इस दिशा में जल्द निर्णय हो सकता है। हालांकि, उन्होंने किसी निश्चित समयसीमा की घोषणा नहीं की।
राजस्थानी भाषा का सवाल केवल भाषाई मान्यता तक सीमित नहीं है। यह राजस्थान की ऐतिहासिक चेतना, लोकसंस्कृति, साहित्य, लोकगीतों, लोकनाट्य और सामाजिक पहचान से जुड़ा हुआ है। मरुस्थल से लेकर मेवाड़, हाड़ौती, ढूंढाड़, वागड़ और शेखावाटी तक राजस्थानी की विविध बोलियां जनजीवन में रची-बसी हैं। लोकदेवताओं की कथाओं, संतों की वाणी, वीरगाथाओं और लोकसंगीत ने इस भाषा को पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवंत बनाए रखा है।
शेखावत ने बातचीत में कहा कि वे वर्ष 1991 से राजस्थानी भाषा को मान्यता देने की मांग के समर्थन में खड़े हैं। उनके अनुसार, विभिन्न भाषाओं को संवैधानिक मान्यता देने से संबंधित अनेक प्रस्ताव लंबित हैं और गृह मंत्रालय का संबंधित विभाग इस दिशा में काम कर रहा है। उनका यह बयान भाषा समर्थकों के लिए उम्मीद बढ़ाने वाला है, लेकिन वास्तविक प्रगति का आकलन किसी आधिकारिक निर्णय के बाद ही किया जा सकेगा। <
आठवीं अनुसूची में शामिल होने का महत्व
संविधान की आठवीं अनुसूची में राजस्थानी को शामिल करने से भाषा की संवैधानिक पहचान को मजबूती मिलेगी। इससे साहित्य, भाषा-अध्ययन, शैक्षणिक अवसरों और सांस्कृतिक संरक्षण के लिए नए रास्ते खुलने की संभावनाएं बढ़ेंगी। हालांकि, आठवीं अनुसूची में शामिल होना अपने आप में प्रशासनिक या शैक्षणिक क्षेत्र में हर प्रकार के बदलाव की स्वतः गारंटी नहीं है। इसके लिए संबंधित नीतियों और नियमों के अनुरूप अलग-अलग कदम उठाने होंगे।
राजस्थानी भाषा की मान्यता का प्रश्न लंबे समय से संसद, राजस्थान विधानसभा, साहित्यिक संस्थाओं और भाषा आंदोलनों में उठता रहा है। भाषा समर्थकों का कहना है कि राजस्थानी की समृद्ध साहित्यिक परंपरा और व्यापक सामाजिक प्रयोग को देखते हुए इसे संवैधानिक पहचान मिलनी चाहिए। इस मांग के समर्थन में भाषा के संरक्षण, शिक्षण और नई पीढ़ी तक इसके हस्तांतरण को महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
मांग के साथ अब ठोस पहल भी जरूरी
राजस्थानी भाषा को मान्यता दिलाने के लिए केंद्र और राज्य सरकारों के बीच समन्वय, भाषाई तथ्यों का सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण तथा आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया निर्णायक होंगे। राज्य सरकार राजस्थानी को विद्यालयों और उच्च शिक्षा में प्रोत्साहित करने, साहित्यिक गतिविधियों को समर्थन देने तथा डिजिटल माध्यमों पर इसके उपयोग का विस्तार करने जैसे कदम भी उठा सकती है।
राजस्थान की सांस्कृतिक पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित करने की दिशा में भाषा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। गजेन्द्र सिंह शेखावत के सकारात्मक संकेतों से इस लंबे समय से चली आ रही मांग को नया राजनीतिक और सार्वजनिक महत्व मिला है। अब निगाहें इस बात पर रहेंगी कि केंद्र सरकार विचार-विमर्श को आगे बढ़ाकर कोई ठोस निर्णय कब लेती है।
राजस्थानी भाषा को संवैधानिक मान्यता मिलना केवल एक भाषा की उपलब्धि नहीं, बल्कि राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत, लोकस्मृति और भाषाई विविधता के सम्मान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।





