एन जी भट्ट
राज्य निर्वाचन आयोग, राज्य में वन स्टेट वन इलेक्शन (एक राज्य एक चुनाव) के अन्तर्गत नगरीय निकायों के चुनाव संपन्न करा रहा हैं। राज्य के 309 नगरीय निकायों (10 नगर निगम, 47 नगर परिषद एवं 252 नगरपालिका) के चुनाव दो चरणों में हुए हैं। राजस्थान के 309 नगरीय निकायों में कुल 10,245 वार्ड हैं।
शुक्रवार को दूसरे चरण का मतदान पूरा होने के साथ ही राजस्थान के 309 नगरीय निकायों के चुनाव में मतदान का कार्य अब पूरा हो गया है। राज्य के 10,245 वार्ड में से 77 पार्षद पहले ही निर्विरोध निर्वाचित हो चुके हैं । शेष 10,168 वार्ड्स में दो चरणों में चुनाव हुए हैं । 9 सितंबर को 162 निकायों में पहले चरण और 11 सितंबर को 147 निकायों में दूसरे एवं अंतिम चरण के मतदान हुए। इसके साथ ही प्रदेश की शहरी राजनीति का सबसे बड़ा चुनावी अभ्यास अपने निर्णायक पड़ाव पर पहुंच गया है। अब 14 सितंबर को मतगणना होगी और उसी दिन यह स्पष्ट हो जायेगा कि प्रदेश की शहरी सरकारों पर जनता ने किस राजनीतिक दल और किस नेतृत्व पर भरोसा जताया है।
शुक्रवार को दूसरे चरण में 147 नगरीय निकायों के 4,774 वार्डों में मतदान सम्पन्न हुआ। इनमें 6 नगर निगम, 24 नगर परिषद और 117 नगरपालिकाएँ शामिल थी जिनमें 87.60 लाख से अधिक मतदाताओं ने 9,758 मतदान केंद्रों पर 18,266 प्रत्याशियों के राजनीतिक भाग्य का फैसला ईवीएम मशीनों में कैद किया। पहले चरण में 9 सितंबर को मतदान हुआ था। पहले चरण में 76.41 प्रतिशत मतदान हुआ था जिसमें प्रतापगढ जिले की नगरपालिका अरनोद में सर्वाधिक 91.98 प्रतिशत मतदान हुआ तथा भीलवाडा जिले के नगर निगम भीलवाड़ा में सबसे न्यूनतम 63.84 प्रतिशत मतदान हुआ।मतदान का प्रतिशत कुल मिला कर चुनाव में मतदाताओं की उल्लेखनीय भागीदारी को दर्शाता है। दूसरे चरण में टिपण्णी लिखें जाने तक 70 प्रतिशत से अधिक मतदान होने की जानकारी मिली है। इस चरण में जयपुर, जोधपुर, कोटा, उदयपुर, अजमेर और पाली जैसे प्रमुख शहरों में हुए मतदान का अपना एक अलग राजनीतिक महत्व है । इसमें 40 नवगठित नगरीय निकाय भी शामिल हैं जिनमे पहली बार पार्षदों को चुनने के लिए निर्वाचन हुआ हैं।
इन चुनावों में मतदान का उल्लेखनीय प्रतिशत अपने आप में महत्वपूर्ण है, लेकिन उससे भी यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अधिक मतदान का लाभ किस राजनीतिक दल को मिलता है। सामान्यतः स्थानीय निकाय चुनावों में मतदाता का निर्णय विधानसभा अथवा लोकसभा चुनावों की तुलना में स्थानीय मुद्दों पर केंद्रित होता है। सड़क, नाली, सफाई, पेयजल, पार्क, स्ट्रीट लाइट, यातायात, अतिक्रमण और स्थानीय विकास जैसे मुद्दे मतदाता के रोजमर्रा के अनुभव से जुड़े होते हैं। इसीलिए इस चुनाव को केवल भाजपा बनाम कांग्रेस की लड़ाई के रूप में देखना पर्याप्त नहीं होगा। अनेक वार्डों में उम्मीदवार की व्यक्तिगत छवि, स्थानीय सामाजिक समीकरण, जातीय-सामुदायिक प्रभाव, पारिवारिक संपर्क और पिछले पार्षद के काम का मूल्यांकन भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है।
राजस्थान में भाजपा सरकार के गठन के बाद यह पहला बड़ा राज्यव्यापी नगरीय चुनाव है। इसलिए इसके परिणाम मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के नेतृत्व वाली सरकार के लिए भी एक राजनीतिक परीक्षा है। भाजपा ने चुनाव प्रचार में राज्य सरकार की योजनाओं और विकास कार्यों को प्रमुखता दी। अंतिम चरण के प्रचार में मुख्यमंत्री भजनलाल की सक्रियता और जयपुर सहित विभिन्न जिलों में रोड शो ने चुनाव के राजनीतिक महत्व को रेखांकित किया। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि यदि भाजपा बड़ी संख्या में नगर निकायों में मजबूत स्थिति बनाती है तो इसे राज्य सरकार के प्रति शहरी मतदाता के विश्वास के संकेत के रूप में देखा जाएगा। इसके विपरीत यदि कांग्रेस,अन्य दल अथवा निर्दलीय उम्मीदवार अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन करते हैं तो उसे स्थानीय प्रशासन के प्रति असंतोष के रूप में पढ़ा जा सकता है। हालाँकि कांग्रेस के लिए यह चुनाव केवल पार्षदों का चुनाव नहीं है। यह उसके शहरी संगठन की जमीन पर वास्तविक स्थिति जानने का अवसर भी है। कांग्रेस यदि पर्याप्त संख्या में शहरी सीटें जीतती है तो उसे राज्य में विपक्ष के रूप में नई राजनीतिक ऊर्जा मिल सकती है।
भाजपा ने मुख्यमंत्री भजन लाल शर्मा और प्रदेश अध्यक्ष मदन राठौड़ के नेतृत्व में इस बार सामूहिक ढंग से आक्रामक चुनाव प्रचार और कई रोड भी किए,वहीं कांग्रेस का चुनाव प्रचार बिखरा हुआ सा दिखा। हालाँकि कांग्रेस ने सरकार पर महंगाई, बेरोजगारी, स्थानीय समस्याओं और विकास कार्यों की गति को लेकर सवाल उठाए। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, प्रतिपक्ष के नेता टीकाराम जूली और प्रदेश अध्यक्ष गोविन्द सिंह डोटासरा सहित पार्टी के अन्य नेताओं ने अपने स्तर पर चुनाव को व्यापक राजनीतिक मुद्दों से जोड़ने का प्रयास किया लेकिन नगर निकाय चुनावों की सबसे बड़ी चुनौती यह है कि राष्ट्रीय एवं राज्य स्तरीय मुद्दों को वार्ड स्तर की लड़ाई में बदलना आसान नहीं होता। इस चुनाव की एक महत्वपूर्ण विशेषता बड़ी संख्या में स्थानीय स्तर के प्रभावशाली उम्मीदवारों की मौजूदगी भी रही है। टिकट वितरण से असंतुष्ट दलों के बागी उम्मीदवार तथा स्थानीय सामाजिक आधार वाले निर्दलीय प्रत्याशी कई वार्डों में परिणाम बदलने की क्षमता रखते हैं।पहले चरण में कुछ स्थानों पर भाजपा और कांग्रेस समर्थकों के बीच विवाद, झड़प, फर्जी मतदान के आरोप तथा ईवीएम संबंधी शिकायतें भी सामने आईं। इससे स्पष्ट है कि कई क्षेत्रों में मुकाबला बेहद करीबी रहा। मतदान से पहले ही 77 उम्मीदवार निर्विरोध निर्वाचित हो चुके थे। इनमें भाजपा के 44 और कांग्रेस के 16 उम्मीदवार शामिल थे तथा 37 निर्विरोध विजेताओं में महिलाएँ थीं। यह आंकड़ा बताता है कि अनेक स्थानीय निकायों में दलों के बीच मुकाबला मतदान से पहले ही समाप्त हो गया था। दूसरे चरण में हुए चुनावो का सबसे बड़ा राजनीतिक केंद्र जयपुर रहा। राजधानी के नगर निगम चुनाव में सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने पूरी ताकत झोंकी। जयपुर में 150 वार्डों का चुनाव होने के कारण यहां का परिणाम प्रदेश की राजनीतिक चर्चा का केंद्र रहेगा।जयपुर का परिणाम केवल नगर निगम की सत्ता तय नहीं करेगा, बल्कि राजधानी के शहरी मतदाता का रुख भी बताएगा। इसी कारण भाजपा और कांग्रेस दोनों के लिए जयपुर विशेष महत्व रखता है।
मतदान समाप्त होने के साथ ही राजनीतिक दलों की रणनीति अब मतगणना की ओर केंद्रित हो गई है। 14 सितंबर को परिणाम आने के बाद तीन स्तरों पर राजनीतिक आकलन होगा। कितने पार्षद किस दल के चुने गए, कितने निकायों में किस दल को बढ़त मिली और महापौर,सभापति,अध्यक्ष के चुनाव में किस दल की स्थिति मजबूत बनी।सबसे महत्वपूर्ण बात यह होगी कि मतदान प्रतिशत का भूगोल और चुनाव परिणाम का भूगोल एक-दूसरे से कितना मेल खाते हैं। राजस्थान का 2026 नगर निकाय चुनाव केवल स्थानीय सरकार चुनने का चुनाव नहीं है। यह अगले विधानसभा चुनावों से पहले प्रदेश की शहरी राजनीतिक मनोदशा को समझने का महत्वपूर्ण अवसर है।पहले चरण का 76.41 प्रतिशत मतदान जनता की मजबूत भागीदारी का संकेत दे चुका है। दूसरे चरण में भी मतदान ऊंचा रहा है । इसका अर्थ यह है कि शहरी मतदाता ने स्थानीय निकाय के चुनाव को गंभीरता से लिया है। मतगणना 14 सितंबर को होगी। अब वास्तविक परीक्षा राजनीतिक दलों की है। किसने मतदान को अपने पक्ष में परिवर्तित किया, किसका संगठन बूथ तक मजबूत रहा और किस उम्मीदवार ने स्थानीय विश्वास हासिल किया और किन निकायों में बहुमत का बोर्ड बनता है। आगामी 14 सितंबर की मतगणना इन सभी सवालों का उत्तर देगी। इसके बाद 21 सितंबर को चेयरपर्सन या अध्यक्ष पद के लिए चुनाव होगा तथा 22 सितंबर डिप्टी या उपाध्यक्ष का चुनाव होगा। अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के चुनाव होने के साथ प्रदेश की 309 नगर निकायों में आदर्श आचार संहिता भी समाप्त हो जाएगी।





