रामलीला मैदान की हुंकार, चुनावी शुचिता और लोकतंत्र की साख का सवाल

The roar of Ramlila Maidan, the question of electoral purity and credibility of democracy.

अशोक भाटिया

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में रामलीला मैदान मात्र एक भौगोलिक स्थल नहीं, बल्कि जन-आकांक्षाओं, ऐतिहासिक आंदोलनों और सत्ता को चुनौती देने वाली बुलंद आवाज़ों का प्रतीक रहा है। एक बार फिर, देश की राजधानी का यह ऐतिहासिक मैदान एक अभूतपूर्व और अत्यंत गंभीर राजनीतिक विमर्श का केंद्र बन गया है। विपक्षी दलों के साझा गठबंधन द्वारा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, विशेष रूप से मतदाता सूचियों के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ के खिलाफ आयोजित की जा रही ‘चलो दिल्ली महारैली’ और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ ‘पब्लिक इंपीचमेंट’ की घोषणा ने देश की राजनीतिक सरगर्मी को चरम पर पहुंचा दिया है। विपक्ष का यह सीधा आरोप कि प्रशासनिक व तकनीकी सुधारों की आड़ में बड़े पैमाने पर ‘वोट चोरी’ की जा रही है और देश भर से करोड़ों वैध मतदाताओं को जानबूझकर लोकतांत्रिक प्रक्रिया से बाहर धकेला जा रहा है, भारतीय निर्वाचन प्रणाली की शुचिता पर एक ऐसा प्रश्नचिह्न है जिसे किसी भी स्थिति में हल्के में नहीं लिया जा सकता।

लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा लगाए गए ये आरोप कि मतदाता सूचियों से सुनियोजित तरीके से नाम हटाकर जनता के बुनियादी संवैधानिक अधिकारों का हनन किया जा रहा है, केवल एक राजनीतिक दल का विलाप नहीं है, बल्कि यह उन करोड़ों मतदाताओं की आशंकाओं का सीधा प्रतिनिधित्व करता है जो इस देश के असली भाग्यविधाता हैं। लोकतंत्र की पूरी इमारत इस बुनियादी सिद्धांत पर टिकी है कि प्रत्येक नागरिक को ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ का अधिकार प्राप्त हो और वह अधिकार पूरी तरह से पारदर्शी व निष्पक्ष हो। जब इस अधिकार के क्रियान्वयन की नीयत और प्रक्रिया पर ही गहरे सवाल उठने लगें, तो वह स्थिति किसी भी जीवंत और परिपक्व लोकतंत्र के लिए बेहद चिंताजनक हो जाती है।

विपक्ष का आरोप है कि चुनाव आयोग द्वारा चलाए जा रहे SIR अभियान के तहत प्रशासनिक लापरवाही या फिर राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित त्रुटियों के कारण हाशिए के समुदायों, अल्पसंख्यकों और गरीब तबके के मतदाताओं के नाम बड़े पैमाने पर मतदाता सूची से गायब किए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से लगातार ऐसी गंभीर शिकायतें सामने आ रही हैं, जहां लाखों की संख्या में नाम हटाए जाने पर सवाल उठाए जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश जैसे विशाल राज्य में तो यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला बताया जा रहा है, जहां कथित रूप से पुनरीक्षण की जटिल प्रक्रियाओं के नाम पर जमीनी स्तर पर विसंगतियां देखी गईं। लोकतंत्र में यदि किसी एक भी वैध नागरिक का नाम प्रशासनिक शिथिलता या किसी छिपाए गए एजेंडे के तहत मतदाता सूची से कटता है, तो इसे केवल एक क्लैरिकल गलती मानकर खारिज नहीं किया जा सकता, बल्कि यह उस नागरिक के लोकतांत्रिक अस्तित्व को ही मिटाने जैसा है। यही कारण है कि विपक्ष ने इसे ‘वोट चोरी’ का नाम देकर एक व्यापक जन-आंदोलन का रूप दे दिया है और देश भर के युवाओं, छात्रों तथा नागरिक समाज के सदस्यों को इस प्रतिवाद में शामिल होने का खुला आह्वान किया है।

इस पूरे विवाद का सबसे संवेदनशील और गंभीर पहलू यह है कि यह मामला अब केवल चुनावी रैलियों या राजनीतिक बयानों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुंच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायपालिका ने इस मामले में जो तल्ख रुख अपनाया है, उसने इस मुद्दे की गंभीरता को कानूनी और संवैधानिक अमलीजामा पहना दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने विशेष रूप से निर्वाचन आयोग द्वारा दावे और आपत्तियां दर्ज करने की निर्धारित 30 अक्टूबर की समयसीमा पर सवाल उठाए और आयोग को सख्त निर्देश दिए कि वह इस अवधि को बढ़ाए ताकि पात्र नागरिकों को शामिल होने या अपनी त्रुटियों को सुधारने का पर्याप्त समय मिल सके। इसके अतिरिक्त, अदालत ने मतदाता पंजीकरण फॉर्म (फॉर्म-6, 7 और 8) में किए गए डिजिटल बदलावों और घोषणा पत्रों को लेकर भी आयोग से जवाब-तलब किया है। न्यायपालिका की यह सक्रियता साफ दर्शाती है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गिरती साख को बचाना और चुनावी प्रक्रियाओं में पारदर्शिता की गारंटी सुनिश्चित करना देश की आंतरिक स्थिरता के लिए कितना अपरिहार्य हो चुका है।

दूसरी तरफ, सत्ताधारी दल भारतीय जनता पार्टी और निर्वाचन आयोग इन तमाम आरोपों को मनगढ़ंत और राजनीति से प्रेरित बताकर सिरे से खारिज कर रहे हैं। आयोग का निरंतर यह तर्क रहा है कि ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ एक पूर्णतः नियमित, वैधानिक और आवश्यक प्रशासनिक प्रक्रिया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य मतदाता सूचियों को शुद्ध व त्रुटिहीन बनाना, दोहरे पंजीकरणों को हटाना और अपात्र या मृत व्यक्तियों के नामों को सूची से बाहर करना है ताकि चुनावी शुचिता बनी रहे। गृह मंत्री अमित शाह और सत्ता पक्ष के अन्य वरिष्ठ नेताओं का स्पष्ट कहना है कि विपक्ष अपनी संभावित चुनावी हार का ठीकरा पहले से ही संवैधानिक संस्थाओं पर फोड़ने की जमीन तैयार कर रहा है। उनके अनुसार, जब भी विपक्ष चुनाव हारता है या उसे अपनी जमीन खिसकती दिखती है, वह कभी ईवीएम को कटघरे में खड़ा करता है तो कभी चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर प्रहार करने लगता है। संसद के भीतर भी इस मुद्दे पर पूर्व में तीखी बहसें हो चुकी हैं, जहां सरकार ने कड़े शब्दों में स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग एक स्वतंत्र संवैधानिक निकाय है और उसकी स्वायत्तता पर किसी भी प्रकार का राजनीतिक दबाव स्वीकार्य नहीं किया जा सकता।

इस राजनीतिक रस्साकशी के बीच, विपक्ष द्वारा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ आयोजित ‘पब्लिक इंपीचमेंट’ का प्रतीकात्मक कार्यक्रम भारतीय संसदीय इतिहास में एक बिल्कुल नई और आक्रामक परिपाटी की शुरुआत है। यद्यपि संवैधानिक रूप से किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की वास्तविक प्रक्रिया बेहद जटिल है और उसके लिए संसद के दोनों सदनों में विशेष दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होती है—जो वर्तमान में विपक्ष के पास नहीं है—फिर भी जन-अदालत में इस तरह का ‘अविश्वास’ प्रकट करना जनता के बीच एक बड़ा विमर्श खड़ा करने का रणनीतिक प्रयास है। पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार की अध्यक्षता में आयोजित इस प्रतीकात्मक अभियोग और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे द्वारा लाए गए प्रस्ताव के माध्यम से विपक्ष यह संदेश देने की पुरज़ोर कोशिश कर रहा है कि वह संस्थाओं की जवाबदेही को अब सीधे जनता के दरबार में लेकर जा रहा है। इस समूचे घटनाक्रम में कल होने वाले ‘चलो दिल्ली’ मार्च ने तनाव को और बढ़ा दिया है। राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्षी नेता दिल्ली के मिंटो रोड-कनॉट प्लेस जंक्शन से रामलीला मैदान तक मार्च निकालने पर अड़े हैं, जबकि दिल्ली पुलिस ने सुरक्षा और कानून-व्यवस्था का हवाला देते हुए इस मार्च को अनुमति देने से इनकार कर दिया है। यह प्रशासनिक पाबंदी एक बड़े राजनीतिक टकराव और धरने का रूप ले सकती है, जो इस संपादकीय विमर्श को और अधिक तीखा बनाता है।

देखा जाए तो इस पूरे परिदृश्य में असली चिंता किसी राजनीतिक दल की तात्कालिक हार या जीत की नहीं है, बल्कि उन संस्थाओं की साख की है जिन पर देश के लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखने की ऐतिहासिक ज़िम्मेदारी है। निर्वाचन आयोग को न केवल निष्पक्ष होना चाहिए, बल्कि उसकी निष्पक्षता और तटस्थता देश के हर नागरिक और सभी राजनीतिक दलों को स्पष्ट रूप से दिखाई भी देनी चाहिए। जब निर्वाचन आयोग के भीतर ही कुछ आंतरिक मतभेदों या निर्णयों पर अपारदर्शिता की खबरें सार्वजनिक होने लगती हैं, तो जनता का भरोसा डगमगाता है। हाल के दिनों में मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की नई प्रक्रिया को लेकर बने कानूनों पर भी जो सवाल उठे हैं, उसने आयोग की स्वतंत्रता को लेकर संदेह के बादलों को और गहरा किया है।

भारत का लोकतंत्र विश्व का सबसे बड़ा और सबसे विविधतापूर्ण लोकतंत्र है। यहाँ हर चुनाव एक महापर्व की तरह होता है, जहाँ एक आम और निर्धन नागरिक भी यह गर्व से महसूस करता है कि उसके हाथ में सत्ता बदलने या बनाए रखने की वास्तविक ताकत है। इस ताकत का एकमात्र और सबसे पवित्र जरिया उसका वोट है। यदि मतदाता सूची के पुनरीक्षण जैसी विशुद्ध प्रशासनिक प्रक्रियाओं में थोड़ी भी अपारदर्शिता, विसंगति या जल्दबाजी पाई जाती है, तो वह सीधे तौर पर इस सामूहिक लोकतांत्रिक भरोसे पर आघात करती है। चुनाव आयोग को चाहिए कि वह विपक्ष के आरोपों को केवल एक राजनीतिक हमला मानकर खारिज करने के बजाय, सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करते हुए हर एक शिकायत का बिंदुवार, पारदर्शी और त्वरित निवारण करे। मतदाता सूचियों से नाम हटाने या जोड़ने की प्रक्रिया को इतना सार्वजनिक, सरल और सुलभ बनाया जाना चाहिए कि देश के किसी भी हिस्से में किसी भी नागरिक को यह महसूस न हो कि उसका सबसे बड़ा संवैधानिक अधिकार उससे चुपके से छीन लिया गया है।

वहीं दूसरी ओर, राजनीतिक दलों को भी यह आत्ममंथन करना होगा कि संवैधानिक संस्थाओं पर चौतरफा और तीखे हमले करते समय संस्था की बुनियादी गरिमा पूरी तरह मटियामेट न हो जाए। लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराने का अधिकार सर्वोपरि है, और रामलीला मैदान में जुटने वाली जनमेदिनी इस अधिकार का एक सशक्त प्रकटीकरण है। लेकिन इस विरोध का अंतिम उद्देश्य संस्थाओं को ध्वस्त करना नहीं, बल्कि उन्हें अधिक पारदर्शी, जवाबदेह, निष्पक्ष और सुदृढ़ बनाना होना चाहिए।