सत्ता नहीं, छवि की दौड़ का नया दौर
सत्य भूषण शर्मा
राजनीति कभी विचारों की प्रयोगशाला हुआ करती थी। चुनाव घोषणापत्रों पर बहस होती थी, सिद्धांतों पर मतभेद होते थे और जनहित सर्वोपरि माना जाता था। किंतु बदलते समय के साथ राजनीति का मंच भी बदल गया है। अब लगता है मानो लोकतंत्र का नया चुनावी कार्यालय जनता के बीच नहीं, बल्कि मोबाइल की स्क्रीन पर खुल गया हो।
आज राजनीति में भाषण से अधिक “बाइट” की कीमत है, विचार से अधिक “वायरल” होने का महत्व है और तर्क से अधिक “ट्रेंड” बनने की होड़ दिखाई देती है। ऐसा प्रतीत होता है कि जनसेवा की लंबी यात्रा की तुलना में कुछ सेकंड की रील कहीं अधिक प्रभावशाली मानी जाने लगी है।
नई पीढ़ी का आत्मविश्वास, तकनीकी दक्षता और अभिव्यक्ति का साहस स्वागतयोग्य है। लेकिन चिंता तब होती है जब राजनीति भी उसी गति से चलने लगती है, जिस गति से सोशल मीडिया का एल्गोरिद्म बदलता है। आज का नायक कल का ट्रेंड बनता है और परसों कोई नया चेहरा सुर्खियाँ बटोर लेता है। ऐसे में स्थायी नीतियाँ और दीर्घकालिक विकास कई बार तात्कालिक लोकप्रियता की भीड़ में दब जाते हैं।
राजनीतिक दल भी अब केवल मंचों पर ही नहीं, बल्कि कैमरे के कोण, पृष्ठभूमि, संगीत और डिजिटल प्रस्तुति पर भी उतना ही ध्यान देने लगे हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि चुनावी रणनीति से अधिक महत्व वीडियो एडिटिंग और सोशल मीडिया प्रबंधन को मिलने लगा है। लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए, लेकिन यदि संवाद केवल दृश्य प्रभाव तक सीमित रह जाए तो लोकतंत्र का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
व्यंग्य यह है कि अब कई बार मुद्दे जनता तय नहीं करती, बल्कि ट्रेंड तय करते हैं। जो विषय सबसे अधिक साझा हो जाए, वही सबसे बड़ा राष्ट्रीय विमर्श बन जाता है। बेरोज़गारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यावरण और कृषि जैसे गंभीर प्रश्न कभी-कभी कुछ घंटों के डिजिटल शोर में ओझल हो जाते हैं। लोकतंत्र को लाइक्स की नहीं, लोकविश्वास की आवश्यकता होती है।
यह भी सत्य है कि तकनीक स्वयं दोषी नहीं है। वही तकनीक पारदर्शिता बढ़ा सकती है, जनता को जागरूक बना सकती है और शासन को अधिक उत्तरदायी भी बना सकती है। प्रश्न केवल इतना है कि उसका उपयोग जनहित के लिए हो या केवल जनधारणा गढ़ने के लिए।
भारत का लोकतंत्र जितना विशाल है, उतनी ही बड़ी उसकी अपेक्षाएँ भी हैं। यहाँ जनता केवल अच्छे वक्ता नहीं, बल्कि अच्छे कर्मयोगी भी चाहती है। प्रभावशाली व्यक्तित्व आवश्यक है, पर उससे कहीं अधिक आवश्यक है ईमानदारी, संवेदनशीलता, दूरदृष्टि और उत्तरदायित्व।
आज आवश्यकता इस बात की है कि राजनीति कैमरे की चमक से आगे बढ़कर समाज की वास्तविक समस्याओं तक पहुँचे। लोकतंत्र तब मजबूत होगा जब नेता जनता को प्रभावित करने से पहले उसकी पीड़ा को समझेंगे और मतदाता आकर्षक नारों से पहले ठोस कार्यों का मूल्यांकन करेंगे।
आख़िरकार लोकतंत्र में सबसे बड़ा “इन्फ्लुएंसर” कोई रील नहीं, बल्कि जागरूक मतदाता होता है। वही तय करता है कि इतिहास किसके पक्ष में लिखा जाएगा।





