वडोदरा की विरासत से विकास की डबल-डेकर रेल तक की यात्रा

The journey from Vadodara's heritage to the double-decker train of development

वड़ोदरा-गायकवाड़ों की ऐतिहासिक नगरी में भारतीय रेल की सौजन्य से एक ऐसी यात्रा,जहाँ इतिहास,प्रकृति, आस्था और आधुनिक विकास एक साथ दिखाई दिए

विनोद सिंह ‘तकियावाला’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गृह राज्य गुजरात की धरती अपने भीतर इतिहास, संस्कृति,व्यापार, उद्योग,आध्यात्मिकता और आधुनिक विकास की अनेक कहानियाँ समेटे हुए है।इसी गुजरात की ऐतिहासिक नगरी वडोदरा की यात्रा मेरे लिए केवल एक शहर की यात्रा नहीं रही, बल्कि अतीत से वर्तमान और वर्तमान से भविष्य तक की एक ऐसी यात्रा बन गई,जिसमें राजसी विरासत के साथ भारतीय रेल के बदलते स्वरूप को भी करीब से देखने और समझने का अवसर मिला।भारतीय रेल की सौजन्य से डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और डबल-डेकर कंटेनर से जुड़ी मीडिया कवरेज के दौरान हमें वडोदरा को अपेक्षाकृत नजदीक से देखने का अवसर मिला।रेल के आधुनिक विकास की तस्वीर को कैमरे और पत्रकार की नजर से देखने निकले थे,लेकिन इस यात्रा ने शहर के उस दूसरे रूप से भी परिचित कराया,जिसे केवल इतिहास की किताबों में पढ़कर पूरी तरह महसूस नहीं किया जा सकता।वडोदरा को देखकर लगा कि यह शहर केवल विकास की रफ्तार का गवाह नहीं है,बल्कि सदियों की विरासत को अपने वर्तमान में जीवित रखने वाली एक धरोहर नगरी भी है।वडोदरा का इतिहास अत्यंत समृद्ध और बहुआयामी रहा है।विश्वामित्री नदी के किनारे बसा यह शहर अलग-अलग कालखंडों में अलग-अलग नामों और पहचान के साथ विकसित हुआ।मराठा गायकवाड़ शासकों के आगमन के बाद वडोदरा राजनीतिक और प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण केंद्र बना। गायकवाड़ों के शासन ने इस शहर को नई पहचान दी और विशेष रूप से महाराजा सयाजी राव गायकवाड़ तृतीय के शासनकाल में शिक्षा, कला, साहित्य,सामाजिक सुधार, पुस्तकालय,संग्रहालय और सार्वजनिक संस्थाओं के विकास ने वडोदरा को देश के अग्रणी प्रगतिशील रियासतों में स्थान दिलाया।शहर में प्रवेश करते ही कहीं न कहीं उस राजसी अतीत की छाप दिखाई देती है।ऐसा लगता है कि समय आगे बढ़ गया,राजशाही समाप्त हो गई, शासन व्यवस्था बदल गई,लेकिन इतिहास ने अपने पदचिह्न यहाँ छोड़े हैं।इन्हीं पदचिह्नों को सबसे भव्य रूप में देखने का अवसर गायकवाड़ों की ऐतिहासिक विरासत से जुड़ी स्थापत्य धरोहरों में मिलता है।लक्ष्मी विलास पैलेस वडोदरा की राजसी पहचान का सबसे प्रमुख प्रतीक है।विशाल परिसर में फैला यह महल भारतीय और यूरोपीय स्थापत्य शैलियों के अद्भुत मेल का उदाहरण है।महल की भव्यता केवल उसके आकार में नहीं, बल्कि उसकी कलात्मक संरचना, सजावट और स्थापत्य की बारीकियों में दिखाई देती है। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ तृतीय के समय निर्मित यह महल उस युग की दूरदर्शिता और वैभव की कहानी कहता है।महल को देखते हुए मन में सहज ही यह विचार आया कि उस समय के शासकों ने केवल राजसी सुख-सुविधाओं के लिए भवन नहीं बनवाए,बल्कि स्थापत्य और कला को भी अपनी शासन व्यवस्था और सांस्कृतिक दृष्टि का हिस्सा बनाया।वडोदरा की पहचान में आज भी उस सोच की झलक दिखाई देती है।गायकवाड़ों की विरासत का एक महत्वपूर्ण पक्ष शिक्षा और सामाजिक विकास भी रहा है। महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ को शिक्षा के विस्तार और सामाजिक सुधारों के लिए विशेष रूप से याद किया जाता है। वडोदरा की आधुनिक पहचान के पीछे उनकी दूरदृष्टि का बड़ा योगदान माना जाता है।यही कारण है कि इस शहर की यात्रा केवल महलों और राजसी इमारतों की यात्रा नहीं है,बल्कि उस विचारधारा की यात्रा भी है जिसने आधुनिक वडोदरा की नींव मजबूत की।वडोदरा के प्राकृतिक परिवेश ने इस यात्रा को एक अलग आयाम दिया।विश्वामित्री नदी और उसके आसपास का क्षेत्र शहर के इतिहास और प्रकृति दोनों से जुड़ा हुआ है।सबसे रोचक बात यह रही कि शहर के बीच से गुजरने वाली इस नदी में मगरमच्छों की मौजूदगी के बारे में जानने और उन्हें देखने का अवसर मिला।आम तौर पर किसी बड़े शहर के बीचोंबीच वन्यजीवन की ऐसी उपस्थिति की कल्पना कम ही की जाती है।मगर वडोदरा में प्रकृति और शहरी जीवन का यह अनोखा मेल दिखाई देता है।मगरमच्छों की उपस्थिति ने यह भी महसूस कराया कि विकास के साथ प्रकृति का संरक्षण कितना महत्वपूर्ण है।किसी शहर की पहचान केवल उसकी ऊँची इमारतों,सड़कों और परिवहन व्यवस्था से नहीं बनती।उसकी नदियाँ,तालाब,हरियाली और वन्यजीवन भी उसके व्यक्तित्व का हिस्सा होते हैं।वडोदरा इस दृष्टि से भी विशेष अनुभव देता है।दिनभर की भागदौड़ और रेल परियोजनाओं की कवरेज के बाद जब शाम ढलने लगी तो वडोदरा का एक और सुंदर रूप सामने आया।सुरसागर तालाब के आसपास पहुँचते ही वातावरण में एक अलग ही शांति और आकर्षण महसूस हुआ।शहर के मध्य स्थित यह ऐतिहासिक जलाशय वडोदरा की पहचान का महत्वपूर्ण हिस्सा है।तालाब के बीच स्थापित भगवान शिव की विशाल प्रतिमा ने पूरे दृश्य को आध्यात्मिक और भव्य स्वरूप प्रदान कर दिया।संध्या के समय जलराशि के बीच विशाल शिव प्रतिमा को देखना अपने आप में एक यादगार अनुभव था।सूर्य अस्त होने को था और धीरे-धीरे दिन का उजाला मंद पड़ रहा था।दूसरी ओर शहर की रोशनियाँ जलने लगी थीं।तालाब के शांत जल में रोशनी की चमक और उसके बीच भगवान शिव की विराट प्रतिमा ने वातावरण को एक अलग ही आध्यात्मिक छटा दे दी। एक स्वतंत्र पत्रकार व स्तम्भकार की नजर से देखा जाए तो यह एक सुंदर दृश्य था,लेकिन यात्री के मन से देखें तो यह उससे कहीं अधिक था।ऐसा लगा जैसे आधुनिक शहर के बीच इतिहास और आस्था दोनों एक साथ संवाद कर रहे हों।हमारी इस यात्रा में स्वामीनारायण परंपरा से जुड़े भव्य और दिव्य मंदिर परिसर का दर्शन भी एक अविस्मरणीय अनुभव रहा।संध्या के समय मंदिर की भव्य रोशनी, स्थापत्य की सुंदरता और भक्तिमय वातावरण ने पूरे दिन की यात्रा को जैसे पूर्णता प्रदान कर दी।रेल की रफ्तार और विकास की चर्चा के बीच जब मंदिर के शांत और आध्यात्मिक वातावरण में कुछ समय बिताने का अवसर मिला तो भारत की विविधता का वास्तविक अर्थ और गहराई से महसूस हुआ।एक ही दिन में एक ओर डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर दौड़ती आधुनिक मालगाड़ी और डबल-डेकर कंटेनर की तस्वीर सामने थी तो दूसरी ओर गायकवाड़ों की राजसी विरासत,ऐतिहासिक महल,विश्वामित्री नदी,मगरमच्छ, सुरसागर तालाब में विराजमान विशाल शिव प्रतिमा और स्वामीनारायण मंदिर की दिव्य आभा।यह विरोधाभास नहीं, बल्कि भारत की विकास यात्रा की खूबसूरत तस्वीर है।

डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और डबल-डेकर कंटेनर भारतीय रेल के उस बदलते स्वरूप का प्रतीक हैं,जहाँ माल परिवहन को अधिक तेज,सक्षम और आधुनिक बनाने की दिशा में निरंतर काम हो रहा है।कभी बैलगाड़ियों और पारंपरिक व्यापारिक मार्गों से माल एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचता था।आज वही भारत समर्पित माल गलियारों और ऊँची क्षमता वाले कंटेनर परिवहन की ओर बढ़ रहा है।रेल की यह बदलती तस्वीर भारत की आर्थिक गति से भी जुड़ी हुई है।वडोदरा में इन दोनों युगों को एक साथ देखना मेरे लिए इस यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण अनुभव रहा। एक तरफ इतिहास की वह विरासत थी,जिसे गायकवाड़ शासकों ने संजोया और विकसित किया।दूसरी ओर आधुनिक भारत की वह रेल थी,जो देश की अर्थव्यवस्था और माल परिवहन को नई गति देने के लिए आगे बढ़ रही है।वडोदरा की यात्रा ने एक और बात स्पष्ट की कि भारत की वास्तविक शक्ति उसकी निरंतरता में है।यहाँ अतीत समाप्त नहीं होता और भविष्य अतीत को मिटाकर आगे नहीं बढ़ता।बल्कि दोनों एक-दूसरे के साथ चलते हैं। महल अपनी कहानी कहते हैं, मंदिर आस्था जगाते हैं,नदी और मगरमच्छ प्रकृति की याद दिलाते हैं और आधुनिक रेल विकास की नई दिशा दिखाती है।गायकवाड़ों की राजसी विरासत से लेकर डबल-डेकर कंटेनर तक की यह यात्रा मेरे लिए इसलिए भी विशेष रही कि इसमें पत्रकारिता के पेशेवर दायित्व के साथ एक यात्री की अनुभूति भी जुड़ गई।भारतीय रेल की सौजन्य से मिली इस मीडिया कवरेज यात्रा ने रेल विकास को करीब से देखने का अवसर तो दिया ही,साथ ही वडोदरा को उसके ऐतिहासिक और सांस्कृतिक परिवेश में समझने का अवसर भी दिया।जब वडोदरा से लौटने का समय आया तो मन में महल की भव्यता, विश्वामित्री की धारा,मगरमच्छों की मौजूदगी,सुरसागर का शांत जल,विशाल शिव प्रतिमा की आध्यात्मिक छटा और स्वामीनारायण मंदिर की संध्या रोशनी-सब एक साथ तैर रहे थे। साथ ही आँखों के सामने डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर पर दौड़ती डबल-डेकर कंटेनर रेल भी थी।शायद यही वडोदरा की असली खूबसूरती है।यह केवल राजाओं की विरासत का शहर नहीं है।यह परंपरा और आधुनिकता के मिलन का शहर है।यहाँ इतिहास साँस लेता है, प्रकृति अपनी उपस्थिति दर्ज कराती है,आस्था मन को छूती है और विकास की रेल भविष्य की ओर दौड़ती दिखाई देती है।वडोदरा से लौटते हुए यही अनुभूति मन में रही कि भारत को समझना हो तो केवल उसके महानगरों और आधुनिक परियोजनाओं को देखना पर्याप्त नहीं।उन शहरों को भी देखना होगा जहाँ इतिहास की नींव पर आधुनिक भारत की नई इमारत खड़ी हो रही है।वडोदरा ऐसी ही एक ऐतिहासिक नगरी है,जहाँ गायकवाड़ों की विरासत और भारतीय रेल की नई रफ्तार एक साथ दिखाई देती है।यही यात्रा की सबसे बड़ी स्मृति है।यही वडोदरा की पहचान है।यही उस भारत की तस्वीर भी है,जो अपनी विरासत को सँजोते हुए विकास की नई पटरी पर निरंतर आगे बढ़ रहा है।