महेन्द्र तिवारी
विकास किसी भी देश की प्रगति का आधार होता है, लेकिन विकास की राह में जब लोगों के घर, उनकी जमीन, संस्कृति और प्राकृतिक विरासत दाँव पर लगने लगें, तब यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास किसके लिए और किस कीमत पर किया जा रहा है। अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी पर प्रस्तावित विशाल जलविद्युत परियोजना को लेकर उठ रहा विरोध इसी सवाल को हमारे सामने रखता है। एक ओर सरकार इसे बिजली उत्पादन, जल सुरक्षा और राष्ट्रीय हितों से जुड़ी महत्त्वपूर्ण परियोजना मानती है, तो दूसरी ओर स्थानीय आदिवासी समुदायों को अपनी पुश्तैनी जमीन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान खोने का भय सता रहा है।
अरुणाचल प्रदेश के सियांग क्षेत्र में प्रस्तावित सियांग अपर बहुउद्देशीय परियोजना की क्षमता 11,200 मेगावाट बताई गई है। यह भारत की सबसे बड़ी प्रस्तावित जलविद्युत परियोजनाओं में से एक है। राष्ट्रीय जलविद्युत निगम को इससे संबंधित प्रारंभिक व्यवहार्यता अध्ययन की जिम्मेदारी दी गई है। सरकार का तर्क है कि इस परियोजना से बड़े पैमाने पर बिजली उत्पादन किया जा सकेगा। इसके अतिरिक्त, नदी के जल का भंडारण और प्रवाह का नियमन करने में भी सहायता मिल सकती है। देश की बढ़ती ऊर्जा आवश्यकताओं को देखते हुए ऐसी परियोजनाओं का महत्त्व नकारा नहीं जा सकता।
लेकिन किसी परियोजना की उपयोगिता केवल उससे मिलने वाली बिजली या आर्थिक लाभ से तय नहीं होती। यह भी देखना आवश्यक है कि उसके निर्माण से किन लोगों को लाभ मिलेगा और किन्हें उसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। सियांग घाटी में रहने वाले आदि समुदाय के लोगों की आशंकाएँ इसी बिंदु से जुड़ी हैं। स्थानीय संगठनों के अनुसार, प्रस्तावित जलाशय के कारण 27 गाँव डूब सकते हैं और अनेक अन्य गाँवों पर भी प्रभाव पड़ सकता है। प्रभावित होने वाले परिवारों के लिए यह केवल मकान बदलने का मामला नहीं है, बल्कि अपनी पूरी जीवनशैली से बिछुड़ने का संकट है।
आदिवासी समुदायों का प्रकृति के साथ संबंध सामान्य आर्थिक संबंधों से कहीं अधिक गहरा होता है। उनकी जमीन में केवल खेत और मकान नहीं होते, बल्कि पीढ़ियों की स्मृतियाँ, पूर्वजों की विरासत और सामाजिक परंपराएँ भी जुड़ी होती हैं। नदी उनके लिए पानी का स्रोत भर नहीं होती, बल्कि जीवन और संस्कृति का अभिन्न अंग होती है। सियांग नदी के आसपास रहने वाले अनेक लोगों की आजीविका खेती, बागवानी, पशुपालन और स्थानीय प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर है। यदि उन्हें अपनी जमीन छोड़नी पड़ी, तो उनके सामने रोजगार, भोजन, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक निरंतरता से जुड़े अनेक प्रश्न खड़े हो सकते हैं।
परियोजना को लेकर पर्यावरणीय चिंताएँ भी कम गंभीर नहीं हैं। हिमालय का यह क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से संवेदनशील है। इतने बड़े बाँध के निर्माण से पहले भूगर्भीय संरचना, भूकंपीय जोखिम, नदी के प्राकृतिक प्रवाह, वन्यजीवों और जैव विविधता पर पड़ने वाले प्रभावों का गहन वैज्ञानिक अध्ययन आवश्यक है। बड़े जलाशयों से स्थानीय पारिस्थितिकी में बदलाव आ सकता है। नदी के प्रवाह में परिवर्तन का असर मछलियों, वनस्पतियों, कृषि और नदी पर निर्भर समुदायों पर पड़ सकता है। हालाँकि, इन संभावित प्रभावों की वास्तविक सीमा का निर्धारण स्वतंत्र और विस्तृत वैज्ञानिक आकलन से ही किया जा सकता है।
इस विवाद का एक महत्त्वपूर्ण पहलू राष्ट्रीय सुरक्षा भी है। तिब्बत में चीन यारलुंग त्सांगपो नदी पर विशाल जलविद्युत परियोजना विकसित कर रहा है। यही नदी भारत में प्रवेश करने के बाद सियांग कहलाती है और आगे चलकर ब्रह्मपुत्र नदी प्रणाली का हिस्सा बनती है। चीन की परियोजना को लेकर भारत में नदी के प्रवाह, जल प्रबंधन और संभावित रणनीतिक जोखिमों पर चिंता व्यक्त की जाती रही है। ऐसे में सियांग पर जल भंडारण की भारतीय परियोजना को राष्ट्रीय सुरक्षा के दृष्टिकोण से भी देखा जा रहा है।
फिर भी राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय लोगों के अधिकारों को एक-दूसरे के विरोध में खड़ा करना उचित नहीं होगा। देश की सीमाओं की सुरक्षा जितनी आवश्यक है, उतना ही जरूरी उन नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना भी है जो सीमावर्ती क्षेत्रों में रहते हैं। किसी परियोजना का रणनीतिक महत्त्व अपने आप में स्थानीय समुदायों की आशंकाओं को समाप्त नहीं कर देता। सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि परियोजना से होने वाले संभावित लाभों के साथ-साथ उसके सामाजिक और पर्यावरणीय जोखिमों का समाधान किस प्रकार किया जाएगा।
अक्टूबर 2026 में इस परियोजना के विरोध ने व्यापक रूप ले लिया है। स्थानीय संगठनों और युवाओं ने सर्वेक्षण रोकने, गिरफ्तार कार्यकर्ताओं को रिहा करने तथा प्रभावित समुदायों से सार्थक बातचीत करने की माँग उठाई है। 23 अक्टूबर को पासीघाट में विरोध प्रदर्शन के दौरान हिंसा और संपत्ति को नुकसान पहुँचने की घटनाएँ भी सामने आईं। हिंसा किसी समस्या का समाधान नहीं है और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना उचित नहीं ठहराया जा सकता। लेकिन विरोध के दौरान हुई हिंसा के कारण उन मूल सवालों को भी नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए, जिनके कारण स्थानीय लोगों में असंतोष पैदा हुआ है।
सरकार का कहना है कि फिलहाल परियोजना की व्यवहार्यता का अध्ययन किया जा रहा है। सर्वेक्षण का अर्थ अंतिम निर्माण स्वीकृति नहीं है। तकनीकी दृष्टि से यह अंतर महत्त्वपूर्ण है, लेकिन स्थानीय लोगों की आशंका को भी समझना होगा। उनके लिए जमीन पर सर्वेक्षण और ड्रिलिंग की शुरुआत भविष्य में होने वाले बड़े बदलावों की आशंका पैदा करती है। इसलिए केवल यह कह देना पर्याप्त नहीं होगा कि अभी निर्माण शुरू नहीं हुआ है। सरकार को पारदर्शिता के साथ जानकारी साझा करनी चाहिए और स्थानीय लोगों के प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर देना चाहिए।
इस समस्या का समाधान संवाद, विश्वास और न्यायपूर्ण प्रक्रिया में छिपा है। परियोजना से प्रभावित होने वाले प्रत्येक गाँव और परिवार की स्थिति का निष्पक्ष आकलन किया जाना चाहिए। पर्यावरणीय अध्ययन स्वतंत्र विशेषज्ञों की निगरानी में हों और उनके निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएँ। स्थानीय समुदायों की सार्थक भागीदारी सुनिश्चित की जाए। यदि परियोजना आगे बढ़ती है, तो पुनर्वास और मुआवजे की व्यवस्था केवल आर्थिक भुगतान तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि प्रभावित परिवारों की आजीविका, सामाजिक संबंधों और सांस्कृतिक आवश्यकताओं को भी ध्यान में रखना चाहिए।
विकास का वास्तविक अर्थ केवल बाँध बनाना, बिजली पैदा करना या आर्थिक आँकड़े बढ़ाना नहीं है। विकास वह है जो लोगों के जीवन को बेहतर बनाए, उनकी गरिमा की रक्षा करे और प्रकृति के साथ संतुलन स्थापित करे। सियांग परियोजना के सामने चुनौती यही है कि राष्ट्रीय हितों और स्थानीय अधिकारों के बीच ऐसा रास्ता निकाला जाए जिसमें किसी एक की कीमत पर दूसरे को लाभ न मिले। नदी की धारा को नियंत्रित करने से पहले उससे जुड़े लोगों की आवाज सुनना जरूरी है। आखिर किसी भी लोकतंत्र की सफलता केवल उसकी बड़ी परियोजनाओं से नहीं, बल्कि इस बात से तय होती है कि वह अपने सबसे दूरस्थ क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों की चिंताओं को कितनी गंभीरता से सुनता है।





